Friday, 12 February 2016

0-544 मुगाल्ते में जब होता हूँ,

मुगाल्ते में जब होता हूँ, तो हंस लेता हूँ,
समझ आती है हकीकत तो रो लेता हूँ,
दुनियां अच्छी लगती है सिर्फ ख्वाबों में,
इसीलिए रात को मैं कुछ देर सो लेता हूँ..(वीरेंद्र)/0544

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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