Monday, 8 February 2016

0-541 तू ग़लतफ़हमी में न चल,

तू ग़फ़लतों में ना चल, गुमराह न हो,
नेकी संग चल, बदी का हमराह न हो,
फकीरी है तो फकीरी ही सही जान ले
वो भी खुश रहता है जो शहंशाह न हो..(वीरेंद्र)/0541


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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