Friday, 5 February 2016

0-540 गर्दिशों ने ज़िंदगी को मेरी

गर्दिशों ने ज़िंदगी को मेरी रुला रक्खा है,
अपनों ने ही मुझे दिल से भुला रक्खा है,
मशकूर क्यों न हूँ मैं अंधेरों का जिन्होंने,
मुफलिसी को मेरी बखूबी छुपा रक्खा है..(वीरेंद्र)/0-540


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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