Monday, 29 February 2016

2-384 गद्दारी की मानसिकता

गद्दारी की मानसिकता या देशद्रोहिता,
कभी भी हो नहीं सकती बुद्धिजीविता,


जिस दिन सहिष्णुता क्रांति कर बैठी,
कुचल देगी ये विचारों की विकलांगता,


सभी अपराध क्षमा कर देंगे देशभक्त,
कभी भंग न होने देंगे राष्ट्र की एकता,

उल्टे-मार्गियों और देश-लुटेरों सावधान,
देख रहा है देश तुम्हारी नंगी उद्दंडता,

अभिवयक्ति की आड़ में सहन न करेगी,
भारत माँ का अपमान भारत की जनता (वीरेंद्र)/2-384


रचना:.वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-751 गैरों के हज्जूम में

गैरों के हज्जूम में अजनबी का कोई हमराह नहीं,
बंजारा मन है उसका, मंज़िल की कोई चाह नहीं..(वीरेंद्र)/1-751


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-750 कौनसी तन्हाई खुदा ने

कौनसी तन्हाई खुदा ने मुझे अता फ़रमाई है,
यहाँ मैं हूँ या तू है, और तन्हाई ही तन्हाई है..(वीरेंद्र)/1-750


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 27 February 2016

2-379 हम वो नहीं जो इन्तेकाल

हम वो नहीं जो इंतेक़ाल पर मुंह ज़मीन में छुपा लेते हैं,
हम तो वो हैं जो मर कर भी आग को गले लगा लेते हैं,
भारत माँ के टुकड़े और बर्बादी की तमन्ना रखने वालों,
हम वतन के बाग़ी गद्दारों को मौत की नींद सुला देते हैं..(वीरेंद्र)/2-379

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

3-91 तू है तो नहीं छोड़ रहा

तू है तो नहीं छोड़ रहा मैं इस दुनिया को,
वरना तो इसे भूल जाने में रक्खा क्या है,


बस तेरी मुहब्बत एक हकीकत है यहाँ,
वरना तो मसनवी ज़माने में रक्खा क्या है,


तेरी मेरी मुहब्बत में है कुछ ख़ास बात,
वरना तो इश्क के फ़साने में रक्खा क्या है,


तू ही है मेरी असली ख़ुशी इस दुनियां में,
वरना तो खुशियाँ मनाने में रक्खा क्या है,

तू बना है गर हमसफ़र तो सब हासिल है,
वरना तो मंज़िल को पाने में रक्खा क्या है,

तेरे ही वास्ते किया है मैंने घर को रौशन,
वरना तो वीरानों को सजाने में रक्खा क्या है..(वीरेंद्र)/3-91



रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"


0-546 मै जानता हूँ, तू मुझे

मैं जानता हूँ, तू मुझे भला कैसे चाह सकता है,
मगर कैसा है तू, कभी यह तो बता सकता है,
ज़रूरी नहीं तू करे ख़तो-खिताबत मुझसे, पर
वक्ते-ज़रुरत मुझको आवाज़ तो लगा सकता है..(वीरेंद्र)/0-546


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-749 दूसरों से ही सुना

दूसरों से ही सुना करते थे दर्दे-बेवफाई 
आज जब खुद झेली तो समझ में आई..(वीरेंद्र)/1-749


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 23 February 2016

1-748 जुबां छीन ली, वो क्या

जुबां छीन ली, वो क्या कम है,
जो अब खामोशी भी छीनने लगे हो..(वीरेंद्र)/1-748


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-747 रात जब हो जाती है

रात जब हो जाती है, कुछ देर तबियत बहल जाती है,
ज़िन्दगी कुछ देर तो हसीं ख्वाबों में निकल जाती है..(वीरेंद्र)/1-747


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"../1-747

0-545 बच्चे आजकल जल्दी

बच्चे आजकल जल्दी जवाँ हो रहे हैं, 
और जवान बेचारे जल्दी बूढ़े हो रहे हैं,
सम्बन्ध मज़बूत होने में लगते हैं वर्षों,
पर विच्छेद आनन्-फानन में हो रहे हैं..(वीरेंद्र)/0545


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"...

Monday, 22 February 2016

2-366 ज़िन्दगी भी उतनी ही

ज़िन्दगी भी उतनी ही अनिश्चित है जितने कि 'अपने'.
और "अपने" भी उतने ही लुभावने हैं जितने कि सपने..(वीरेंद्र)/2-366

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 21 February 2016

2-365 किसी का माई-बाप

किसी का माई-बाप बहुत दूर चायना है,
तो किसी का आका पडोसी पकिस्तान है,
दे कर सबको रोज़ी-रोटी-कपडा-मकान,
बेचारा भारत फिर भी जैसे निस्संतान है..(वीरेंद्र)/2-365

राचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-364 दुआ है मेरी दुनियां की

दुआ है मेरी दुनियां की हर ख़ुशी तुम्हे मिल जाये, 
मांगो जो भी तुम भगवान् से, वो तुम्हे मिल जाए,
राहें हों तुम्हारी आसान और बिखरे हो फूल उनमे, 
सुहाने सफ़र में मंजिल खुद बखुद तुम्हे मिल जाये..(वीरेंद्र)/2-364


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 17 February 2016

1-746 मुस्कुरा के हम जितना

मुस्कुरा के हम जितना दर्द-ऐ-दिल छुपाते हैं
आंसू हर बार कोशिशों पर पानी फेर जाते हैं..(वीरेंद्र)/1-746


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"....

Tuesday, 16 February 2016

2-377 बस कुछ जांबाज़ जवानों

बस कुछ जांबाज जवानों, सैनिकों, ने बचा रक्खा है देश को,
वरना गद्दारों ने तो अपनी करनी में कोई कसर रखी नहीं थी.(वीरेंद्र)/2-377


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 15 February 2016

1-745 न जाने किस चीज़ को

न जाने किस चीज़ को लोग रूहानी कहने लगे हैं,
जो मामूली ठसक से भी रिश्ते रूहानी टूटने लगे हैं..(वीरेंद्र)/1-745


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"...

2-376 दोस्तों की तलाश में क्यों

दोस्तों की तलाश में क्यों फिर रहे हैं हम,
क्यों न अब दुश्मनों को ही आजमा लें हम..(वीरेंद्र)/2-376

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-375 अलविदा महफिलों की शान

अलविदा महफ़िलों की शान, "निदा", 
हम न कभी भूलेंगे तेरी शायरी की अदा..( वीरेंद्र)/2-375

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-374 तू भी हो गया "निदा"

तू भी हो गया "निदा" उधर का
रुख हवाओं का था जिधर का..(वीरेंद्र)/2-374


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-373 यूनिवर्सिटियों में गद्दारी के

युनिवर्सिटियों में गद्दारी के जश्न आम हुए,
फिर मदरसे बेचारे क्यूँ इतने बदनाम हुए..(वीरेंद्र)/2-373


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 12 February 2016

0-544 मुगाल्ते में जब होता हूँ,

मुगाल्ते में जब होता हूँ, तो हंस लेता हूँ,
समझ आती है हकीकत तो रो लेता हूँ,
दुनियां अच्छी लगती है सिर्फ ख्वाबों में,
इसीलिए रात को मैं कुछ देर सो लेता हूँ..(वीरेंद्र)/0544

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-543 शिकवा किसी बेवफा से

शिकवा किसी बेवफा से ना होता,
गिला भी बेदर्द ज़माने से ना होता,
कोई भी इंसा मुगालते में न जीता,
गर आँखों में सबकी आइना होता..(वीरेंद्र)/0-543


रचना:वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 11 February 2016

1-744 रूप छुपा कर रखती हूँ

रूप छुपा कर रखती हूँ, न जाने तू कब बहक जाये,
बादल जैसी आदत तेरी, कौन जाने कब बरस जाये..(वीरेंद्र)/1-744


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 9 February 2016

2-372 इश्क का कातिल बड़ी

इश्क का कातिल बड़ी हडबडाहट में था.
मक्तूल बोला आला-ऐ-क़त्ल तो मत भूल यहाँ..(वीरेंद्र)/2-372


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-542 तुम्हारी "ज़मीं" तुम्हारा "आसमां"

••निदा फ़ाज़ली साहब के इंतकाल पर••
तुम्हारी "ज़मीं" तुम्हारा "आसमाँ" यहाँ पड़ा है,
तुम्हारा  दिलकश अदबी कहकशां यहाँ पड़ा है,
तुम तो तलाशे-"मुकम्मल जहाँ" में निकल पड़े,
तुम्हारा हर चाहने वाला तिशनगा यहाँ पड़ा है..(वीरेंद्र)/0-542

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 8 February 2016

1-743 आई है तू मेरी ज़िन्दगी में

आई है तू मेरी ज़िन्दगी में, मेरे ख्वाबों से निकल के,
जैसे आ गया हो कोई फूल जूड़े में, चमन से निकल के..(वीरेंद्र)/1-743
रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-541 तू ग़लतफ़हमी में न चल,

तू ग़फ़लतों में ना चल, गुमराह न हो,
नेकी संग चल, बदी का हमराह न हो,
फकीरी है तो फकीरी ही सही जान ले
वो भी खुश रहता है जो शहंशाह न हो..(वीरेंद्र)/0541


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 7 February 2016

2-378 प्यारे-प्यारे न्यारे-न्यारे फूल

प्यारे-प्यारे न्यारे-न्यारे फूल बेचारे फूल हैं,
भेंट दिए जाते हैं, कभी चढ़ा दिए जाते हैं,
कभी ये प्रेम के प्रतीक, कभी श्रद्धांजलि के,
ईश्वर की भक्ति में भी अर्पित किये जाते हैं,
स्वागत में,वंदन में,या फिर अभिनंदन में,
हार बना कर, गले में पहना दिए जाते हैं,
इनका कोई धर्म नहीं, और कोई जात नहीं,
सबके द्वारा ये इस्तमाल कर लिए जाते हैं,
लाल गुलाब बने प्रेम-प्रस्ताव का माध्यम,
चाहे न चाहे हाथों में पकड़ा दिए जाते हैं,
राहों में बिछते और बरसते हैं फूल बेचारे,
सुहागरात की सेजों पर सजा दिए जाते हैं,
बड़े कोमल, निर्मल, निश्छल होते हैं फूल,
शायद इसीलिए बेचारे तोड़ लिए जाते हैं,
छीनकर उनकी ताजगी,चहक,महक को,
अक्सर निर्ममता से वे कुचल दिए जाते हैं...(वीरेंद्र)/2-378
रचना; वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 6 February 2016

3-90 वीरान कर जाते हैं घोंसले

वीरान कर जाते हैं घोंसले को,
ज़रा से परिंदे सयाने क्या हुए।
रहते थे कभी सब साथ हम,
कौन जाने वो ज़माने क्या हुए।
पाने लगते हैं हम नए ज़ख्म,
ज़रा से ज़ख्म पुराने क्या हुए।
ढा रहे सितम सिर्फ अपने ही,
शहर के तमाम बेगाने क्या हुए।
नहीं भूल पा रहा मैं दर्द अपने,
इन गलियों के मैखाने क्या हुए।
ग़मज़दाओं की यहीं थी आमद,
उनके अब वो ठिकाने क्या हुए।
सूरज-चाँद वही,आसमान वही,
पर वो लम्हे वो नज़ारे क्या हुए।
दिलों को जाने के रास्ते है गायब,
रूहानी से वो गलियारे क्या हुए।..(वीरेंद्र)/3-90

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" 

Friday, 5 February 2016

2-371 ज़हर घुली ज़िन्दगी

ज़हर घुली ज़िंदगी को घूँट-घूँट कर जीना पड़ता है
ग़म को ही खाना और ग़म को ही पीना पड़ता है..(वीरेंद्र)/2-371


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-370 अब आ भी जाओ, गमे-जुदाई

अब आ भी जाओ, गमे-जुदाई के सिवा कुछ लिखा जाता नहीं,
ढूँढता हूँ किताबों में खुशियों के नुस्खे पर कुछ नज़र आता नहीं..(वीरेंद्र)/2-370


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-361 औरत को तूने ये कौनसी

औरत को तूने ये कौनसी इज़्ज़त अताह फ़रमा दी ऐ खुदा,
वो बच्चा जनती रह जाए और बाप परिंदा बनके उड़ जाये..(वीरेंद्र)/2-361

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-363 इंसान से क्या रिश्ता

इंसान से तेरा क्या रिश्ता बन्दे,
जब इंसानियत ही नहीं तुझमे।
मुहब्बत भी क्या ख़ाक करेगा,
भरी है जब नफरत ही तुझमे।।.(वीरेंद्र)/2-363


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी".

0-540 गर्दिशों ने ज़िंदगी को मेरी

गर्दिशों ने ज़िंदगी को मेरी रुला रक्खा है,
अपनों ने ही मुझे दिल से भुला रक्खा है,
मशकूर क्यों न हूँ मैं अंधेरों का जिन्होंने,
मुफलिसी को मेरी बखूबी छुपा रक्खा है..(वीरेंद्र)/0-540


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-742 ओरत को ये कौनसी इज्ज़त

औरत को ये कौनसी इज़्ज़त अताह फ़रमा दी तूने ऐ खुदा,
वो बच्चा जनती रह जाए और बाप परिंदा बनके उड़ जाये.(वीरेंद्र)/1-742
रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 4 February 2016

2-360 बुनियाद मज़बूत भी हो

बुनियाद मज़बूत भी हो तो, इमारत को खतरा दरारों से है 
रिश्तों को खतरा ज़माने से नहीं, दिलों में खड़ी दीवारों से है,.(वीरेंद्र)/2-360

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-359 ये पार्टी उस पार्टी को

ये पार्टी उस पार्टी को, और वो पार्टी इस पार्टी को मुद्दा देती है,
वोटों-नोटों की सियासत मुल्क में गन्दगी को खूब हवा देती है,.(वीरेंद्र)/2-359


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 3 February 2016

0-539 शायरी ही शायरी लिखी

शायरी ही शायरी लिखी जाती है,
डायरी पर डायरी भरती जाती है,
तुम चाहे खुश हो चाहे हो नाराज़,
ग़ज़ल पर ग़ज़ल लिखी जाती है..(वीरेंद्र)/0-539
रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-741 मसरूफ हो गया हूँ इश्क में

मसरूफ़ हो गया हूँ इश्क में तेरे इतना,
सोता भी हूँ तो तेरे ख्वाब देखने के लिए..(वीरेंद्र)/1-741


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-740 तुमने जैसा भी चाहा अपनी

तुमने जैसा भी चाहा, अपनी मर्ज़ी चला ली,
पर ये रिश्ते अपनी-अपनी करने के नहीं होते..(वीरेंद्र)/1-740


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 2 February 2016

1-739 पहले तो सुरमे की तराह

पहले तो सुरमे की तराह आँखों में लगाया हमें,
फिर क्यूं पानी की तराह आँखों से बहाया हमें..(वीरेंद्र)/1-739

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 1 February 2016

2-358 मेरी फालतू शायरी में

मेरी फालतू शायरी में गहराई नहीं, बस तुकबंदी होती है,
जैसे मियां-बीवी में लड़ाई नहीं, सिर्फ जुगलबंदी होती है।.(वीरेंद्र)/2-358

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"..

1-738 अपनों ने तो तमाम

अपनों ने तो तमाम उम्र दिए रंजो-गम बेपनाह,
साँसों को पनाह मिली, तो अजनबियों के यहाँ..(वीरेंद्र)/1-738
रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-737 वाह, ज़िन्दगी पर भी और मौत

वाह, ज़िन्दगी पर भी और मौत पर भी सियासत आप की,
जीते जी कीमत दो कौड़ी भी नहीं, मरने पर पचास लाख की..(वीरेंद्र)/1-737
रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-538 तेरा शेर मेरा शेर मिलकर

तेरा शेर मेरा शेर मिलकर क़ता हो जाय,
हमारे इश्क का ज़माने को पता हो जाय,
मतला मैं लिखूँ, और मक़्ता तू लिख दे,
चल आज एक ग़ज़ल मुश्तरका हो जाय..(वीरेंद्र)/0-538


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"