Sunday, 17 January 2016

1-720 लफ़्ज़ों में ही ढूंढते

लफ़्ज़ों में ही ढूंढते रहे मेरे प्या को तुम,
कभी ख़ामोशी की ज़ुबान भी समझ लेते..(वीरेंद्र)/1-720 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" 


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