Thursday, 7 January 2016

3-88 उसकी हमदर्दियाँ हासिल

उसकी हमदर्दियाँ हासिल हुईं मुझे,
मगर एक मुक़र्रर वक्त तक के लिए,

उसने मुझे जिंदा तो रक्खा ज़रूर, 
फ़क्त मेरे एक दस्तखत के लिए,

मेरा हक उसी ने छीन लिया,
जो लड़ रहा थे मेरे हक के लिए,

उसे ईनाम और मुझे सज़ा मिली,
मेरी मजबूरी, मेरे ज़ब्त के लिए...(वीरेंद्र)/3-88

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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