Saturday, 30 January 2016

2-357 अविस्मर्णीय हो जाते हैं

अविस्मर्णीय हो जाते हैं जीवन के वो कुछ पल-छिन,
तुम संग जब मिल जाते हैं फुरसत के कुछ रात-दिन..(वीरेंद्र)/2-357


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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