Sunday, 17 January 2016

2-342 कर दिया था उमीदों का

कर दिया था उमीदों का दरवाजा बंद,
आज क्यों थोडा सा खुला रख दिया मैंने,
पड़े पड़े मुरझा रहे थे कई दिन से जो फूल,
आज क्यों उन्हें गुलदान में रख दिया मैंने...(वीरेंद्र)/2-342 

राचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"


No comments:

Post a Comment