Sunday, 17 January 2016

0-529 हम गुज़रते हैं रोज़ उनकी

 हम गुज़रते हैं रोज़ उनकी गली से इस उम्मीद में,
शायद हमे भूलने का उनका इरादा बदल जाए,
पर पत्थर हैं उनके फैसले पत्थर दिल की तरह,
क्या मजाल किसी कोशिश से पत्थर पिंघल जाए..(वीरेंद्र)/0529

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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