Tuesday, 5 January 2016

0-527 खुशनुमा नहीं मगर

खुशनुमा नहीं मगर कट रही है ज़िन्दगी,
यादों के सहारे बस खिसक रही है ज़िन्दगी,
यादें भी बेचारी कहाँ तक देंगी साथ मेरा,
धीमी सी लौ में जैसे जल रही है ज़िन्दगी..(वीरेंद्र)/0527

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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