Sunday, 31 January 2016

1-736 ये मेरी किस्मत थी

ये मेरी किस्मत थी, वो आकर मेरे कांधे पर झुक गए,
वो शरमा रहे थे, उनकी किस्मत कि चिराग बुझ गए।(वीरेंद्र)/1-736


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-735 वो शेर दिल में उतरते नहीं

वो शेर दिल में उतरते नही जिनमे कोई गहराई न हो.
मै कैसे सुनाऊँ वो ग़ज़ल जिसमे ज़िक्र-ऐ-तन्हाई न हो..(वीरेंद्र)/1-735


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी".,

0-537 तमन्नाओं पर जब पानी

तमन्नाओं पर पानी जब फिर जाता है,
सैलाब में उसके इंसान जब गिर जाता है,
अरमानों की लाश की तलाश होती नहीं,,
गुमनामी के अंधेरों में वो घिर जाता है।(वीरेंद्र)/0537


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी".

Saturday, 30 January 2016

0-536 रिश्ते हवा में तामीर

रिश्ते हवा में तामीर नहीं होते ये याद रखें,
इनको बनाने से पहले इनकी बुनियाद रखें,
रिश्ते बैठ जाते हैं जब दीवारें खड़ी होती हैं,
दिलों की हवेली में एतमाद को आबाद रखें..(वीरेंद्र)/0536

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-357 अविस्मर्णीय हो जाते हैं

अविस्मर्णीय हो जाते हैं जीवन के वो कुछ पल-छिन,
तुम संग जब मिल जाते हैं फुरसत के कुछ रात-दिन..(वीरेंद्र)/2-357


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-734 फूल को भी शाख

फूल को भी शाख से टूटने पर दर्द होता होगा,
मैं इंसान हूँ, मुझे तोड़ो तो तोड़के कुचल न देना..(वीरेंद्र)/1-734


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-733 ज़माना चाहे तो क़तर दे पंख

ज़माना चाहे तो कतर दे पंख हमारी मुहब्बत के
हम इश्क के परिंदे ख्वाबों में ही परवाज़ कर लेंगे..(वीरेंद्र)/1-733


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-732 मेरे प्यार के अंदाज़ हैं

मेरे प्यार के अंदाज़ हैं वो जिन्हें तुम कहते हो सितम,
कब तुम ढहाओगे हम पर उन्हें, इंतज़ार में बैठे हैं हम,.(वीरेंद्र)/1-732


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 28 January 2016

3-89 बड़ी साफ़ सुथरी पड़ी हैं

बड़ी साफ़ सुथरी पड़ी हैं सड़कें मेरे शहर की,
खून खराबे का कोई नमो-निशां यहाँ नहीं है,

दूर रहो मज़हबी ठेकेदारों अमन की इस बस्ती से, 
हमें तकसीम न करो तुम्हारा कोई काम यहाँ नहीं है,

जूझ रहा है मेरा मुल्क  बाहरी दह्शतगर्दों से,
पहले ही खो रहा है हर रोज़, जानो-माल अपना,

मेरे शहर के बन्दे खुदा के बन्दे हैं, याद रखो,
तुम्हारे उकसाए में आने वाला कोई यहाँ नहीं है,

हमें मुबारक हमारी मेहनत, हमारी तकदीरें,
अपने तक ही महदूद रखो तुम तुम्हारी तकरीरें,

हम खुद हल कर लेंगे मुश्तरका मसाइल शहर के,
किसी बाहरी पैरोकार की दरकार यहाँ नहीं है..(वीरेंद्र)/3-89

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-535 आइना किस्तों में रोज़

आइना किस्तों में रोज़ हकीकत बताता है,
हर रोज़ हमें बदलती हुई सूरत दिखाता है,
भांप न पाते हम उसके किसी इशारे को,
समझ में आता है तभी जब वक्त आता है।.(वीरेंद्र)/0-535


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-534 दूर ही जाना है तो पास

दूर ही जाना है तो पास आना ज़रूरी तो नहीं,
बिछड़ ही जाना है  तो लड़ना ज़रूरी तो नहीं,
कतै-ताल्लुक करना हो तो यूँ भी हो जाता है,
चंद तोहमतें आपस में लगाना ज़रूरी तो नहीं..(वीरेंद्र)/0-534


रचना; वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"...

Wednesday, 27 January 2016

1-731 अजब तासीर है इश्क की

अजब तासीर है इश्क की,
दूर रहकर भी हुआ जाता है..(वीरेंद्र)/1-731

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-728 हम वो नहीं जो खामोश

हम वो नहीं जो खामोश हो जाएँ क़त्ल होकर,
मरने के बाद भी तेरी बेगुनाही की गवाही देंगे।/(वीरेंद्र)/1-728


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-727 खुशियों की मंजिल की तलाश

खुशियों की मंज़िल की तलाश में न निकल
जहाँ से सफ़र शुरू उसी को मंज़िल समझ ले।(वीरेंद्र)/1-727


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-726 उसे मुहब्बत जताने की

उसे मुहब्बत जताने की आदत है,
मुझे खुशफहमियों में रहने की आदत है।(वीरेंद्र)/1-726


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-725 मुझे छोडके जो शख्स

मुझे छोड़के जो शख्स चला गया वो बुरा कहाँ था,
ये तो बुरा वक्त था मेरा, और उसका इम्तिहाँ था। (वीरेंद्र)/1-725


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-724 ये धुंध नहीं जो

ये धुंध नहीं जो धूप की गर्मी से छट जायेगी,
ये मेरे दिल की तारीकी है,चराग़े-वस्ल से हट जायेगी..(वीरेंद्र)/1-724


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-723 आज इस दिल की ज़रा सी

आज इस दिल की ज़रा सी बात क्या मान ली हमने,
यूं समझो आपसे मुस्तकिल दुश्मनी पाल ली हमने..(वीरेंद्र)/1-723

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-369 शाम भी हुई नहीं,

शाम भी हुई नहीं
इंतज़ार है रात की
हकीकत में जिओ
सोचो न ख्वाब की
पत्थर का है दिल
बातें जज़्बात की
प्यार की बूँद नहीं
चाहत बरसात की
रिश्तों में ठन्डक
मांग करें ताप की
नए निराले आप
क्या बात आपकी..(वीरेंद्र)/2-369

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-362 हर आत्महत्या अति दुखद

हर आत्महत्या अति दुखद 'आत्म-हत्या' है,
चाहे किसान की हो या हो किसी परेशान की,
उसकी लाश को धर्म जाति का नाम मत दो,
मौत तो मौत है हिंदू दलित या मुसलमान की..(वीरेंद्र)/2-362

.
.रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"...

2-367 जागो मेरे देश के सेक्युलर

जागो, मेरे देश के सेक्युलर साहित्यकार,
उठा लो कलम की जगह अपने पुरूस्कार,
देश में धर्म-निरपेक्षता घटती जा रही है,
'असहिष्णुता' फिर अपने फन उठा रही है,
मालदा और पूर्णिया पर तो तुम चूक गए, 
पंजाब, बंगाल में तुम्हे वो ललकार रही है,
मुस्लिम हत्या के बाद दलित हत्या हुई है,
जाती-आत्महत्या है,आम हत्या नहीं हुई है,
देश को अपनी निष्ठाओं का प्रमाण बता दो,
बिहार-चुनाव वाले शौर्य फिर से दिखा दो,
जागो, अबकी बार पुरूस्कार फिर लौटा दो..(वीरेंद्र)/2-367


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-368 चुनाव जीतने के तरीके

चुनाव जीतने के तरीके हुए हिट,

कभी अख़लाक़ तो कभी रोहित,


सत्ता सुख प्राप्ति के मार्ग में चाहे,


अल्प-संख्यक मरे, या मरे दलित.


सेक्युलरिज्म की रट लगती रहे,


भले दर-बदर फिरे कश्मीरी पंडित.
.(वीरेंद्र)/2-368 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-533 कभी खुशियों में उदासियों


कभी खुशियों में उदासियों की झलक भी दिखाई देती है,

डबडबाई आँखों में हल्की मुस्कराहट सी दिखाई देती है,

अजीब सी नाकाबिले-बयां कैफियत हो जाती है दिल की, 

दिल में कभी रौशनी तो कभी तारीकी भी दिखाई देती है..(वीरेंद्र)


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 26 January 2016

2-356 वोट-बेंक को वोट-बेंक ही

वोट-बेंक को वोट-बेंक ही मात देगा यारों, आपसी तू-तू मै-मै नहीं,
पिटे रहोगे गर बंटे रहोगे, जीत वोटबेंक में है, बहुसंख्यक होने में नहीं..(वीरेंद्र)/2-356

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-730 आया करो तो कुछ देर

आया करो तो कुछ देर ठहर भी जाया करो,
बस बुझे चराग जलाकर न चली जाया करो..(वीरेंद्र)/1-730

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-729 अभी तो डूबे रहने दो

अभी तो डूबे रहने दो मुझे इश्क के नशे में,
जब आएगी मौत, जब की जब देखी जाएगी..(वीरेंद्र)/1-729

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 25 January 2016

2-355 क्या करेंगे इसका वापस रखलो

क्या करेंगे इसका, वापस रख लो यह साहित्य-पुरूस्कार,
अब वो तलवे ही न रहे जिन्हें चाटकर पाया था ये उपहार..(वीरेंद्र)/2-355

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-354 आतंकी को कोई डर नहीं

आतंकी को अब डर नहीं, उसका धर्म बदनाम नहीं होता,
क्योंकि हमने मान लिया है उसका धर्म-ईमान नहीं होता..(वीरेंद्र)/2-354

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-353 बहुत फ़ेंक ली दूसरों पर

बहुत फ़ेंक ली दूसरों पर, सब व्यर्थ गया,
चलो आज खुद पर स्याही फ़ेंक कर देखें...(वीरेंद्र)/2-353

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-352मेरी किस्मत है मेरा

मेरी किस्मत है मेरा वक्त गुज़र रहा है, वर्ना,
कई गुज़र गए जिनका वक्त गया-गुज़रा था ..(वीरेंद्र)/2-352

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-351 हे प्रभु,मुझे भी

हे प्रभु मुझे भी दियो कोई अवार्ड दिलवाय,
मै भी प्रसिद्धि पाय सकूं देकर उसे लौटाय..(वीरेंद्र)/2-351

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-350 एक वक्त आता है जब

एक वक्त आता है जब लोग रंग दिखाने लगते हैं,
ज़रा तरजीह मिली नहीं कि, भाव खाने लगते हैं..(वीरेंद्र)/2-350

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-349 भला कैसे छोड़ दें दुनियां

भला कैसे छोड़ दें हम दुनियां,
जब हमारी दुनियां तो आप हैं..(वीरेंद्र)/2-359

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-348 बे-नतीजा मुलाक़ात

बे-नतीजा ही मुलाक़ात रही,
बहुत मुख़्तसर सी रात रही..(वीरेंद्र)/2-348

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-347 हम तो छोड़ भी दें दुनियां

हम तो छोड़ भी दें दुनियां किसी के लिए,
मगर कौन है यहाँ जो छोड़ देगा हमारे लिए..(वीरेंद्र)/2-347

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-346 आज के दौर में जो जितना

आज के दौर में जो जितना ज़हर उगलता है,
उतना ही ज्यादा उसको सब यहाँ मिलता है,
सीमित साधनों में सेंध लगाई चंद लोगों ने,
बाकी लोगों का घर-बार भी कहाँ चलता है..(वीरेंद्र)/2-346

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-345 क्यों हो गई दुनियां इतनी

क्यों हो गई दुनियां इतनी तरक्कीयाफ्ता,
के इंसा अपना दर्द दिलमें ही दबाये बैठा है,
किसको जाकर बताये वो दुःख-दर्द अपना,
हर शख्स यहाँ अपना ही रोना लिए बैठा  है..(वीरेंद्र)/2-345

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 17 January 2016

2-344 मुझे एक शख्स का नाम

मुझे एक शख्स का नाम बता दो, राजा से रंक तक,
जिसने दुःख या दर्द न देखा हो, प्रारम्भ से अंत तक,
परमात्मा का न्याय सभी इंसानों पर समान लागू है, 
साधारण व्यक्ति से लेकर साधू, महात्मा, महंत तक ..(वीरेंद्र)/2-344

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-343 इंतज़ार ही इंतज़ार किया

इंतज़ार ही इंतज़ार किया तमाम उम्र,
अब दफनाये जाने का भी इंतज़ार है,
कोई तो पूछे उनसे इस देरी का सबब,
जो कहा करते थे हमारी कब्र तैयार है..(वीरेंद्र)/2-343

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-342 कर दिया था उमीदों का

कर दिया था उमीदों का दरवाजा बंद,
आज क्यों थोडा सा खुला रख दिया मैंने,
पड़े पड़े मुरझा रहे थे कई दिन से जो फूल,
आज क्यों उन्हें गुलदान में रख दिया मैंने...(वीरेंद्र)/2-342 

राचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"


0-531 मुझसे कहते हैं,

मुझसे कहते हैं, तौबा कर लो,
खुद नज़रों के जाम पिलाते हैं,
मुझसे कहते हैं ज़ब्त रखा करो,
खुद मगर कत्लेआम मचाते हैं..(वीरेंद्र)/0531

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-530 कभी धुप, कभी छाँव,

कभी धूप, कभी छाँव, कभी खुश्क, तो कभी पानी,
कभी बेहद तन्हा ये ज़िन्दगी, तो कभी शादमानी,
चल रहा सिलसिला कभी गिरने, कभी सँभलने का, 
कभी है नरम, कभी गरम, कभी ठंडी सी जिंदगानी..(वीरेंद्र)/0-530

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-529 हम गुज़रते हैं रोज़ उनकी

 हम गुज़रते हैं रोज़ उनकी गली से इस उम्मीद में,
शायद हमे भूलने का उनका इरादा बदल जाए,
पर पत्थर हैं उनके फैसले पत्थर दिल की तरह,
क्या मजाल किसी कोशिश से पत्थर पिंघल जाए..(वीरेंद्र)/0529

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-718 थोडा तो ज़ब्त पैदा

थोडा तो ज़ब्त पैदा करे इंसान अपना दर्द सहने में,
आखिर बेज़ुबान भी तो अपना दर्द बयां नहीं करते..(वीरेंद्र)/1-718.

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-717 बेवफा फिर से क्या मिले

बेवफा फिरसे क्या मिले, कुछ दर्द और मिल गए,
ज़ख्म जो भर चले थे मेरे, आज फिरसे छिल गए...(वीरेंद्र)/1-717

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-716 इश्क मुहब्बत में भी

इश्क मुहब्बत में भी अब आ  गई  है सियासत देखिये,
वो मांगते हैं सबूत कि क़त्ल उनकी आँखों ने किया है..(वीरेंद्र)/1-716

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-715 झूंट ही कह दिया था किसी ने

झूंठ ही कह दिया था किसी ने, ज़िन्दगी एक ख्वाब है,
सभी ख्वाब आये हमें, बस एक यही ख्वाब नहीं आया..(वीरेंद्र)/1-715

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-714 बड़े ही परोपकारी

बड़े ही परोपकारी इस ज़माने में लगते हैं लोग,
खुद देखें न देखें, हमें आइना दिखा देते हैं लोग..(वीरेंद्र)/1-714

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-711 टूट चुकी है दोस्ती

टूट चुकी है दोस्ती तो आओ कुछ रस्म भी निभा दें,
खो जाएँ भीड़ में, एकदूजे को फिर से अजनबी बना दें...(वीरेंद्र)/1-711

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-722 हर शाम जला देता हूँ

हर शाम जला देता हूँ उम्मीदों के चराग,
हवाओं के मिजाज़ से मुखालफत है मुझे..(वीरेंद्र)/1-722

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-721 डुबो कर भी कश्ती,

डुबो कर भी कश्ती, तुझे तसल्लियाँ मिली नहीं,
तू दरिया ज़रूर है, मगर तुझमे दरिया दिली नहीं..(वीरेंद्र)/1-721

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-720 लफ़्ज़ों में ही ढूंढते

लफ़्ज़ों में ही ढूंढते रहे मेरे प्या को तुम,
कभी ख़ामोशी की ज़ुबान भी समझ लेते..(वीरेंद्र)/1-720 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" 


1-719 बहुत लोग इश्क में

बहुत लोग इश्क में भी दिल बड़ा रखते हैं,
किसी भी वक्त भूलने का कलेजा रखते हैं..(वीरेंद्र)/1-719

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 7 January 2016

3-88 उसकी हमदर्दियाँ हासिल

उसकी हमदर्दियाँ हासिल हुईं मुझे,
मगर एक मुक़र्रर वक्त तक के लिए,

उसने मुझे जिंदा तो रक्खा ज़रूर, 
फ़क्त मेरे एक दस्तखत के लिए,

मेरा हक उसी ने छीन लिया,
जो लड़ रहा थे मेरे हक के लिए,

उसे ईनाम और मुझे सज़ा मिली,
मेरी मजबूरी, मेरे ज़ब्त के लिए...(वीरेंद्र)/3-88

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 6 January 2016

2-341 ऐ दर्द तू कभी भी आना

ऐ दर्द तू कभी भी आना,
मगर दबे पाँव न आना,
मेरा दिल बड़ा कमज़ोर है,
हो सके तो बता कर आना..(वीरेंद्र)/2-341

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 5 January 2016

2-340 मै तो रह जाता हूँ

मै तो रह जाता हूँ तेरे बिना,
मगर मानता नहीं यह दिल, 
मैंने तो जान ली तेरी मजबूरी,
मगर जानता नहीं यह दिल..(वीरेंद्र)/2-340

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-333 सामजिक संवेदनाएं

सामाजिक संवेदनाएं अभी तक मरी नहीं, जिंदा हैं,
ये और बात है कुछ दरिन्दे भी अभी मरे नहीं, जिंदा हैं..(वीरेंद्र)/2-333

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-332 गरीबों को भूख

गरीबों को भूख लगती है और मिट जाती है,
अमीरों को भी लगती है, मगर मिटती नहीं..(वीरेंद्र)/2-332

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-331 समझ गया मै

समझ गया मै उनकी बात यद्यपि वो मौन रहे,
शब्दों में दोहराने को अब भला उनसे कौन कहे..(वीरेंद्र)/2-331

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-528 नव-वर्ष का सवेरा,

नव-वर्ष का सवेरा, प्रफुल्लित सुनेहरा,
आ तो चुका है और किसे बुला रहे हो,
बाहर आने दो खुलके बिखर जाने दो,
मुस्कुराहटों को इतना क्यों दबा रहे हो..(वीरेंद्र)/0528

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-527 खुशनुमा नहीं मगर

खुशनुमा नहीं मगर कट रही है ज़िन्दगी,
यादों के सहारे बस खिसक रही है ज़िन्दगी,
यादें भी बेचारी कहाँ तक देंगी साथ मेरा,
धीमी सी लौ में जैसे जल रही है ज़िन्दगी..(वीरेंद्र)/0527

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-713 वो तो थीं उनकी

वो तो थीं उनकी तल्ख़ बेरुखियाँ,
हम जिन्हें उनकी मजबूरियां समझ बैठे..(वीरेंद्र)/1-713

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-712 खुश रहते हैं आप

खुश रहते हैं आप तो दिल तोड़कर,
काश यह मेरा भी शगल हो जाता..(वीरेंद्र)/1-712

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-710 अच्छा है ख़ामोशी अख्तियार

अच्छा है ख़ामोशी अख्तियार कर ली तुमने,
मुझे भी मुगालते में खुश रहने की आदत है..(वीरेंद्र)/1-710

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"