Saturday, 31 December 2016

1-860 तुम आए भी

तुम आए भी और चले भी गए बहारों की तराह,
तुम्हे क्या इल्म चंद शजर अब भी मुरझाए हुए हैं..(वीरेंद्र)/1-860

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 30 December 2016

1-861 कभी तो अपने बारे में भी

कभी तो अपने बारे में भी सोच, ऐ ज़िन्दगी,
या हमेशा यूँही दबी-भिंची गुज़रती जाएगी..(वीरेंद्र)/1-861

रचना: © वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 28 December 2016

1-859 मुरझाए पत्ते बैठे

मुरझाए पत्ते बैठे रह गए आस में बहारों की,
किसी झोंकें ने आके शजर को ही गिरा डाला..(वीरेंद्र)/1-859

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-858 नेक दिल इंसान

नेक दिल इंसान कभी मरा नहीं करते,
बस चले जाते हैं सबके दिलों में बसने को..(वीरेंद्र)/1-858

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 25 December 2016

1-857 पहले तो लुटा दीं

पहले तो लुटा दीं तमाम मुहब्बतें मैंने,
अब थोड़ी सी के लिए मै खुद तरस रहा हूँ..(वीरेंद्र)/1-857

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-856 क्या कहने आपके

क्या कहने आपके जो आप बहुआयामी लिखते हैं,
हमतो सिर्फ अपने रंजोगम और नाकामी लिखते है..(वीरेंद्र)/1-856

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

1-855 तेरा नाम

तेरा नाम लेना छोड़ दिया अब हमने,
अजनबी जुबां पर तेरा नाम भी क्यों आए..(वीरेंद्र)/1-855

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-581 बदल जाना तो है

बदल जाना तो है कुदरत का सिलसिला,
मौसम ही क्या, हालात भी बदल जाते हैं।
थोड़ा बहुत तो दुनियां ही बदल जाती है,
पर कुछ लोग तो ज़्यादा ही बदल जाते हैं..(वीरेंद्र)/0-581

रचना: वीरेंद्र सिन्हा © "अजनबी"

1-854 मै नहीं जानता

मै नहीं जानता शाम कोे मुझे क्या हो जाता है,
दिनभर का खामोश ज़ख्म शाम को हरा हो जाता है..(वीरेंद्र)/1-854

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-582 यह माना मै तेरे

यह माना मैं तेरे काबिल नहीं हूँ,
रंजो-ग़म में तेरे, शामिल नहीं हूँ,
पर तेरी कश्ती को डूबने न दूंगा,
जानता हूँ मैं तेरा साहिल नहीं हूँ..(वीरेंद्र)/0-582

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-853 मेरे महबूब

मेरे महबूब मुझे भी ये हुनर अपना सिखा दे,
रिश्ते कैसे तोड़े जाते हैं, मुझे इतना सिखा दे..(वीरेंद्र)/1-853

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-468 ज़मीं पर मिलें चार

ज़मीं पर मिलें चार, आसमाँ में बहत्तर,
चलो मर जाऐं, अट्ठारह गुना पाना है बेहतर..(वीरेंद्र)/2-468

रचना:वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-580 मेरे दुश्मन ही मेरे

मेरे दुश्मन ही मेरे सबसे बड़े कद्रदान हैं,
मुझे पढ़ते हैं वो पूरा, भले देते नहीं दाद हैं।
चलो हम भी इतने में ही खुश हैं यारों,
दोस्त नहीं, दुश्मन तो हमपर मेहरबान हैं।(वीरेंद्र)/0-58

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-852 मुझसे बात कर लोगे

मुझसे बात कर लोगे तो, छोटे नहीं हो जाओगे,
आप कोई शहर तो हैं नहीं, जो मेरे हो जाओगे..(वीरेंद्र)/1-852

रचना: वीरेंद्र  सिन्हा "अजनबी"

1-851 चल रही है ज़िन्दगी

चल रही है ज़िन्दगी, कि सांसें चल रही हैं,
चला चली में वक्त की घड़ियाँ चल रही हैं..(वीरेंद्र)/1-851

©रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 17 December 2016

1-850 सूना रहा है कोई यूं

सुना रहा है कोई यूं अपनी उदासी का रोना,
यकीं हो गया मुझे, पत्थर भी उदास होते हैं..(वीरेंद्र)/1-850


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 16 December 2016

2-465 इंसा दुआ मांगते वक्त


इंसाँ दुआ मांगते वक्त मानता है, सामने है साक्षात् भगवान,
गुनाह करते हुए मगर सोचता है बड़ी दूर बेखबर है भगवान..(वीरेंद्र)/2-465

रचना: वीरेंद्र सिन्हा जनबी"

1-838 किस किस को भूल जाऊं


किस किस को भूल जाऊं मै, ऐ बेवफा,
मुझे तो हरेचेहरा तेरे जैसा लगने लगा है..(वीरेंद्र)/1-838


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 14 December 2016

2-472 सींग कटाने से


सींग कटाने से बैल कभी बछड़ा नहीं बन जाता,
निकर पहन लेने से बुङ्ढा बच्चा नहीं बन जाता,
रखता अगर कोई अपने आमाल साफ़ सुथरे तो,
वो इंसान बनता,  यूं लुच्चा-टुच्चा नहीं बन जाता..(वीरेंद्र)/2-472

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-839 मेरे ग़मों से भी खुशियों का

मेरे ग़मों से भी, खुशियों का मुग़ालता वो खा जाते हैं,
के अक्सर ख़ुशी में भी, मेरी आँख में आंसू आ जाते है..(वीरेंद्र)/1-839

रचना: © वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-840 आजकल नाकाबिले-बर्दाश्त

आजकल नाकाबिले-बर्दाश्त हो गए हैं  रिश्ते,
अब सिर्फ दीवारों पर टंगे अच्छे लगते हैं रिश्ते..(वीरेंद्र)/1-840

रचना:©वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

Monday, 12 December 2016

2-466 खुदगर्जी के किस मुकाम

खुदगर्ज़ी के किस मुकाम पर दुनिया जा रही है,
जज़्बाती इंसा की ज़िंदगी कितनी ज़ाया जा रही है..(वीरेंद्र)/2-466

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-841 मेरी जिंदगी में हर ख़ुशी

मेरी जिंदगी में हर ख़ुशी यूं आकर लौट गयी,
जैसे हर लहर किनारे को चूम कर लौट गयी..(वीरेंद्र)/1-841

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

2-464 किस कदर कमीने

किस कदर कमीने हो गए हैं लोग,
आँखें होके भी नाबीने हो गए हैं लोग..(वीरेंद्र)/२-464

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-842 खामोश तो हम हो

खामोश तो हम, हो भी जाएं आपकी तराह,
पर इससे मुहब्बतों का सिलसिला रुकता तो नहीं..(वीरेंद्र)/1-842

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

Friday, 9 December 2016

1-843 किनारा करने से

किनारा करने से क्या मिला आपको,
यादों में तो आज भी डूबे हुए हैं आप..(वीरेंद्र)/1-843

‌रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-844 शिकायत नहीं, क्यों

शिकायत नहीं, क्यों आपने हमसे किनारा कर लिया,
डूबते भी तो बहुत जा रहे थे आप, हमारी मुहब्बत में..(वीरेंद्र)/1-844

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

Thursday, 8 December 2016

0-578 कितनी ग़लतफ़हमी में

कितनी ग़लतफ़हमी में रहते थे हम,
इश्क में आपके पागल रहते थे हम,
सुकूँ हो गया आपके बेवफा होने से,
वर्ना तो ज़िंदगी से परेशां रहते थे हम..(वीरेंद्र)/०-578

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-845 बेवफा हो जाओ तो दूर

बेवफ़ा हो जाओ तो दूर चले जाना ही बेहतर,
सामने रहकर फिर आँख मिलाई नहीं जाती..(वीरेंद्र)/1-845

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-846 मालूम था मुझको

मालूम था मुझको मेरा साथ न दोगे तुम,
आखिर तुम भी किस किस का साथ देते..(वीरेंद्र)/1-846

 रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-473 काश, भावनाओं का भी कोई

काश, भावनाओं का भी कोई ऑन-ऑफ़ स्विच हुआ करता,
जब जितनी देर चाहता इंसान, ऑन-ऑफ़ कर लिया करता,
क्यों होता कोई अपने दिल के हाथों मायूस-ओ-मजबूर इतना,
भूलना होता किसी को तो, बस एक बटन दबा दिया करता..(वीरेंद्र)/2-473

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 30 November 2016

1-847 मुतवातिर क़त्ल करता गया

मुतवातिर क़त्ल करता गया, वो मेरे अरमानों का,
छुपाके तलवार उसकी, बेगुनाह हम उसे साबित करते गए..(वीरेंद्र)/1-847

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

1-848 मत पोंछो धुंध आईने से,

मत पोंछो धुंध आईने से, पड़ी रहने दो,
कुछ देर और सही, सच्चाई छुपी रहने दो..(वीरेंद्र)/1-848

रचना:वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-475 नोटबंदी के विरुद्ध

नोटबंदी के विरुद्ध दलों की गुटबंदी
यह राजनीति नहीं, नौटंकी है गन्दी,
घंटी बज रही है खतरे की देश में,
कालाधन-कुबेर हैं आर्थिक-आतंकी..(वीरेंद्र/2-475
रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-467 हर घडी तुझसे दूर

हर घडी तुझसे दूर करती जा रही है अब मुझे, 
हर सांस लेती जा रही है क़ज़ा की तरफ मुझे..(वीरेंद्र)/2-467

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-579 नजदीकियां न बना पाएंगी

नज़दीकियां न बना पाएंगी रिश्ते,
ना ही दूरियां तोड़ पाएंगी रिश्ते,
दिलों से निकलती हैं जो आवाज़ें,
वही बना या बिगाड़ पाएंगी रिश्ते..(वीरेंद्र)/0-579 

रचना: ©  वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-849 कौन कौन से उसूलों

कौन कौन से उसूलों का हवाला देकर मुकर जाते हैं लोग,
बहाना कोई भी बनाकर इंसानियत से भी गिर जाते हैं लोग..(वीरेंद्र)/1-849

रचना:वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-480 मै कहाँ कहाँ बचूंगा

मैं कहाँ कहाँ बचूंगा,
कभी मारेगा ज़मीर,
कभी मारेंगे जज़्बात,
कभी मारेंगे एहसासात,
कभी मारेगी मुहब्बत,
कभी फनाह करेगी नफरत,
हर रोज़ कोई न कोई मौत,
मैं भला कितनी बार मरूंगा..(वीरेंद्र)/2-480


रचना:वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-edit कभी जलाए कभी बुझाए

कभी जलाए कभी बुझाए चराग़ तेरी यादों के,
बस यूँ ही तमाम उम्र तन्हा बसर कर दी हमने..(वीरेंद्र)/1-

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

3-editमेरे कातिल का शौक

मेरे क़ातिल का शौक पूरा हो न सका,
क़त्ल किया मेरे बदन को जिसमे जान न थी,
मक़तूल ने ही मिटा दिए तमाम सबूत,
क़ातिल को सज़ा हो, उसकी इसमें शान न थी,
बेवफा की तोहमतें मैं यूं सुनता चला गया,
वो समझता रहा मेरे मुंह में जुबान न थी,
मेरे भी न पड़ते कदम ज़मीं पर उसकी तराह,
मेरे पास पंख न थे, बेवफाई की उड़ान न थी.
रचना:वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-editमुझे गिले-शिकवे क्यों

मुझे क्यों हों गिले-शिकवे इस ज़माने से भला,
मुझसे बेवफा होने वाले भी कहाँ मेरे अपने थे..(वीरेंद्र)/1-

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-edit आसानी से रंग बदल

आसानी से रंग बदल लेते हैं, कितने रंगीले होते हैं लोग,
काश उतने ही अच्छे होते, जितने तस्वीरों में लगते हैं लोग..(वीरेंद्र)/1-

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-837 फनाह कर दे,

फनाह कर दे,मेरा वजूद मिटा दे,मगर 
मैं कबतक उफ़्फ़ न करुँ ये तो बता दे..(वीरेंद्र)/1-837

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 24 November 2016

1-822 काश एक दिन ऐसा भी

काश एक दिन ऐसा भी गुज़र जाए,
तुझको न देखूं और ग़ज़ल बन जाए..(वीरेंद्र)/1-822

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 20 November 2016

2-463 देश बदल रहा है और

देश बदल रहा है और दिखाई भी दे रहा है,
विरोधियों को मगर ये कहाँ दिखाई दे रहा है..(वीरेंद्र)/2-463

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-835 अपने भी नहीं अपने

अपने भी नहीं अपने, गैर क्या होंगे अपने,
हक़ीक़तें भी नहीं अपनी, सपने तो हैं सपने..(वीरेंद्र)/1-835

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-577 हमारे दिल के टुकड़े

हमारे दिल के टुकड़े जितने बिखर रहे हैं,
बेवफाओं के चेहरे उतने ही निखर रहे हैं,
हम ही से थीं कभी जिनकी दिलबस्तगियां,
जाने क्यूं उनको आज हम ही अखर रहे हैं..(वीरेंद्र)/0-577

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-834 जबसे उसने मेरा मासूम दिल

जबसे उसने मेरा मासूम दिल दुखाया है,
चेहरे पर उसके ग़ज़ब निखार आया है..(वीरेंद्र)/1-834

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-474 कहीं मेले हैं तो कहीं

कहीं मेले हैं तो कहीं तन्हाई है
यहाँ तो मगर उदासी छाई है,
कहीं चेहरे बुझे से लग रहे हैं,
कईयों पे रौनक लौट आई है,
माथे पर खिंची चोट की रेखा,
अब और ज्यदा उभर आई है..(वीरेंद्र)/2-474

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-833 दुनियां गोल है यार,

दुनियां गोल है यार, इतना भी भाव मत खा,
कौन जाने घूमफिर के तू मुझे कहाँ मिल जा..(वीरेंद्र)/1-833

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-832 न समझा कर खुद को

न समझा कर खुद को खुदा
दुनियां में नाखुदा भी होते हैं..(वीरेंद्र)/1-832

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-471 देशद्रोहियों को सर्जिकल

देशद्रोहियों को सर्जिकल स्ट्राइक भी मसनवी लग रहीं हैं,
मोदी को मिली जो दुआएं, गद्दारों को बद्दुआएं लग रही हैं,
हड़कंप मचा है गद्दारों में ,कहाँ से देंगे पेमेंट दहशतगर्दों को
पुराने नोट बंद और नए के वास्ते लाइनें लंबी लग रहीं हैं..(वीरेंद्र)/2-471

रचना; वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

1-831 हर रोज़ बिला नागा

हर रोज़ बिला नागा चली आती हैं तेरी यादें,
तन्हाई में मेरी ख़लल डाल जाती है तेरी यादें..(वीरेंद्र)/1-831

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

2-470 मुल्क का कानून बड़ा नर्म

मुल्क का कानून बड़ा नर्म है,
देशभक्त है ठंडा, गद्दार गर्म है,
दुश्मन परस्तों को बोलने में,
न कोई गुरेज़ है न कोई शर्म है..(वीरेंद्र)/2-470

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 13 November 2016

1-830 ख़ामोशी को अपनी मेरी

ख़ामोशी को अपनी, मेरी सज़ा न समझ,
नफरतों को अपनी, मेरी क़ज़ा न समझ..(वीरेंद्र)/1-830

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-836 तोते की जुबां बोलोगे

तोते की ज़ुबाँ बोलोगे तो पिंजरे में कैद रहोगे
कोयल की मीठी बोली बोलो, आज़ाद रहोगे..(वीरेंद्र)/1-836

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-829 दिल की दिल में लेकर

.
दिल की दिल में लेकर ही चले जाएंगे हम,
वक्त की कमी है, आरज़ू पूरी कर न पाएंगे हम..(वीरेंद्र)/1-829

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-828 इसी तरह रंज-ओ-गम

इसी तराह रंज-ओ-गम देते रहा करो तुम मुझे,
वजूद का मेरे यकीन दिला दिया करो तुम मुझे..(वीरेंद्र)/1-828

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 10 November 2016

0-576 जहाँ चाह है, वहां

जहाँ चाह है, वहां राह है,
बहाने बनाना बेवजाह है,
भूलना है तो भूल जाओ,
यहाँ भी किसे परवाह है..(वीरेंद्र)/0-576

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-827 निगोड़ी तकदीर भी कैसी है

निगोड़ी तक़दीर कैसी है, कहीं चैन से सांस नहीं लेने देती,
कहीं है दूषित हवा, तो कहीं ज़िन्दगी सांस नहीं लेने देती..(वीरेंद्र)/1-827

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

2-459 देशद्रोही तेरी जुबां

देशद्रोही तेरी ज़ुबान काफी है पर्यावरण ख़राब करने के लिए,
तेरा नाम ही पर्याप्त है देश का मौहाल बर्बाद करने के लिए,
तू इस कदर आतंक फैला देता है राजनीती के गलियारों में,
देशभक्तों को बरसों बरसों लग जाते हैं इसे साफ़ करने के लिए..(वीरेंद्र)/2-459


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

Friday, 4 November 2016

1-826 मत पूछो सवाल

मत पूछ सवाल इस झूंटे ज़माने से,
मिल जाएंगे जवाब सारे आईने से..(वीरेंद्र)/1-826

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-825 जुबां सिल लेते हैं,

ज़ुबाँ सिल लेते हैं, दिल दबा लेते हैं,किनारा करने वाले,
जाने कब हाथ थाम लेते हैं रकीब का ये भूल जाने वाले..(वीरेंद्र)/1-825

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-824 न ज़मीं की कमी है

न ज़मीं की कमी है ना आसमाँ की कमी है,
ज़िंदगी में आज से बस एक माँ की कमी है..(वीरेंद्र)/1-824

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-823 बिना मज्मून का कागज़

बिना मज़मूं का कागज़ ही रख कर भेज दिया उसने,
खुदा का शुक्र लिफ़ाफ़े पर मेरा नाम लिख दिया उसने..(वीरेंद्र)/1-823

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-821 दुनियां जहांन ने पढ़

दुनियां जहाँन ने पढ़ लिए शेर, जो लिखे थे मैंने,
बस उसी ने ना पढ़े जिसके लिए वो लिखे थे मैंने..(वीरेंद्र)/1-821

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-820 खामोश ही रह "अजनबी"

खामोश ही रह 'अजनबी', इज़हार न कर ख्यालात का
जाने कौन क्या मतलब निकाल ले तेरी किसी बात का..(वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-819 उससे और कुछ पूछना

उससे और कुछ पूछना भी हिमाकत होगी,
जिसकी बदली हुई नज़र ही मुकम्मल जवाब है..(वीरेंद्र)/1-819

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-462 कुछ दिन से ऐसा कुछ

कुछ दिन से ऐसा कुछ हुआ नहीं जिसका हम इलज़ाम लगा दें,
आओ विरोधियों फिरभी हम किसी न किसी का पुतला जला दें..(वीरेंद्र)/2-462

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-818 देख लिया कर मेरी तरफ

देख लिया कर मेरी तरफ इसी अदा से,
फिर बता न बता, तुझे मुहब्बत है मुझसे..(वीरेंद्र)/1-818

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 30 October 2016

1-817 अब और बेरुखी दिखने की

अब और बेरुखी दिखाने की कोशिश न कर मुझसे,
तेरी हर कोशिश से मेरी मोहब्बत को हवा मिल रही है..(वीरेंद्र)/1-817


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-816 'अजनबी' बना रहने दे

'अजनबी' बना रहने दे मुझे, मुझसे आशना न हो,
तेरा बनकर मैं मतलबी हो जाऊं कहीं ऐसा न हो..(वीरेंद्र)/1-816


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-815 दिल के जज़्बात-ओ-एहसासात

दिल के जज़्बात-ओ-एहसासात में डूब जाने की ज़रुरत होती है,
शायरी को समझने की नहीं, महसूस करने की ज़रुरत होती है..(वीरेंद्र)/1-815


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-461 सारे नेतागण चौकस और


सारे नेतागण चौकस और सयाने हो गए,
मगर मूर्ख मतदाता बस सठिया गया है।

वोट बैंक-वालों के मसाइल तो हल होगये,
असंगठित वोटर को दफना दिया गया है।


सबने छीन लिया खम्बा पटरी उखाड़ के, 
शेष जनरल वर्ग को लटका दिया गया है..(वीरेंद्र)/2-461


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-460 मनमोहक रूप देखने

मनमोहक रूप देखने की लालसा में,
निहारक बहुत उत्सुक हो जाता है।
किन्तु सत्यवादी निर्दयी दर्पण है कि,
बड़ा निर्लज्ज मुंहफट हो जाता है।
बोल देता है सही उम्र बिन लाग लपेट,
कृत्रिम बनाव श्रृंगार प्रकट हो जाता है।.(वीरेंद्र)/2-460


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-575 ताउम्र हाथों में बनाई

ताउम्र हाथों में बनाई, तेरी लकीर खींच-खींच कर,
कब से जी रहा हूँ बस तेरी तस्वीर देख-देख कर,
तेरी तलाश को इत्तेताम तक पहुंचा नहीं पाया मैं,
तुझे ही पुकारता हूँ वीरानों में भी चीख-चीख कर..(वीरेंद्र)/0-575


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

Tuesday, 25 October 2016

2-458 अब ज़माना बदल गया

अब ज़माना बदल गया है,
रुख हवा का बदल गया है,
अब रूठने का फायदा नहीं,
चढ़ता सूरज अब ढल गया है..(वीरेंद्र)/2-458


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-574 छुप गया चांद भी

छुप गया चाँद भी, उधर जब भी देखा है,
टूट गया हर ख्वाब, हमने जब भी देखा है,
खुद को और भी ज़्यादा दूर पाया हमने,
जानिबे मंज़िल बढ़ाके कदम जब भी देखा है..(वीरेंद्र)/0-574

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-573 बुझे चिराग का यह धुआं

बुझे चराग़ का यह धुआं बता रहा है,
अभी अभी ख़त्म हुई है दास्ताँ कोई,
तन्हाई में लिपटा सन्नाटा जता रहा है,
अभी अभी यहाँ से गुज़रा है तूफ़ाँ कोई..(वीरेंद्र)/0-573


©रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

Monday, 24 October 2016

2-457 बहुत सी बातें ज़हन

बहुत सी बातें ज़हन में आतीं हैं तब ही,
चिकनी खाल पे झुर्रियां जब पड़ जाती हैं


कागज़ के फूलों में खुशबू आती है तब ही,
इत्र की छींटें उन पर जब बिखर जातीं हैं।..(वीरेंद्र)/2-457


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-456 देश का सबसे बड़ा

देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य,
आज इसमें गद्दार बहुत है,
बाहरी शत्रु से जीता ये हमेशा,
पर अपनों से खाई मार बहुत है..(वीरेंद्र)/2-456


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

2-455 रिश्ता एक नहीं होता

रिश्ता एक नहीं होता, अनेक होते हैं,
निभाने होते हैं सभी, सब नेक होते हैं
एक दूसरे से निकलते हैं सभी रिश्ते,
जब दो परिवार बंधन में एक होते हैं..(वीरेंद्र)/2-455


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 23 October 2016

0-572 बहुत समझाया, बहुत टोका

बहुत समझाया, बहुत टोका ज़माने ने
मुहब्बत करने से बहुत रोका ज़माने ने,
फ़ना होने का शौक था, फ़ना होकर रहे,
ना उसने रोका हमें, ना रोका ज़माने ने..(वीरेंद्र)/0-572


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-454आज़ाद होकर भी बार-बार

आज़ाद होकर भी, बार-बार मांगते हो कौन सी आज़ादी,
कहीं जाकर पहले देख लो गुलामी, फिर माँगना आज़ादी..(वीरेंद्र)/2-454


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 22 October 2016

1-814 काश नींद न होती,

काश नींद न होती, ख्वाब न हुआ करते,
तनहा ज़िन्दगी के दिन सुकूँ से कटा करते..(वीरेंद्र)/1-814


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 19 October 2016

2-453 वतनपरस्ती की बात

वतनपरस्ती की बात करने में भी अब लोग कतराने लगे हैं,
गद्दारों को देखो, कितनी हिम्मत से वो गद्दारी करने लगे हैं..(वीरेंद्र)/2-453


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-445 गद्दार की जुबां में

ग़द्दार की ज़ुबान में इतना जो ज़ोर है,
कानून का डंडा क्या इतना कमज़ोर है,
मुरव्वत किस बात की, ऐसे के साथ में,
जो शख्स बे-हया बे-गैरत हरामखोर है..(वीरेंद्र)/2-445


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 17 October 2016

1-813 "जब गमे-इश्क सताता है"

'जब ग़मे-इश्क़ सताता है तो' आईने को ढक देता हूँ,
निकाल के हसीं दिनों की तस्वीर सामने रख लेता हूँ..(वीरेंद्र)/1-813


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

1-811 हर बार चला जाता हूँ

हर बार चला जाता हूँ मैं, फिर न आने के लिए,
क्यों बुला लेते हो तुम मुझे, फिर चले जाने के लिए,(वीरेंद्र)/1-811


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-452 रावण को मारा था

रावण को मारा था श्रीराम ने, हम तो उसे बस दहन कर रहे हैं,
वरना घूम रहे कितने रावण, हम हैं कि बेबस सहन कर रहे हैं। (वीरेंद्र)/2-452


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-810 कौन कहता है वक्त सिर्फ

कौन कहता है वक्त, सिर्फ सितम ही करता है,
हमने तो अक्सर देखा है, वो करम भी करता है।.(वीरेंद्र)/1-810


©रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"...

2-451 ज़िन्दगी में तरक्की

ज़िन्दगी में तरक्की तजुर्बों से की जाती है,
इनकी तालीम हमें ठोकरों से दी जाती है।..(वीरेंद्र)/२-451


©रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-446 जब तुम्हारा कुछ फायदा

जब तुम्हारा कुछ फायदा हो,
तो चलेगा भारतीय संविधान।
और अगर फायदा न हुआ तो,
चलेगा हदीस और क़ुरआन।
बाकी सब अनपढ़ और गंवार,
वाह मौलाना एक तुम्ही विद्वान्।..(वीरेंद्र)/२-446


©रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"...

Wednesday, 12 October 2016

1-809 मुहब्बतों के चराग

मुहब्बतों के चराग अभी अभी बुझे हैं,
रौशनी तो गयी इनकी, धुंए मगर अभी बचे है..(वीरेंद्र)/1-809

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-437 जो लोग सीना ठोक कर

जो लोग सीना ठोक कर सर्जिकल स्ट्राइक्स को झूंटा बता रहे हैं 
उन्हीं के परिवार अपनी सुरक्षा के लिए मोदी से गुहार लगा रहे हैं।
देश की सुरक्षा में समर्पित वीर सैनिकों का सम्मान तो रहा दूर,
दुश्मन के समक्ष उनके शौर्य व हौंसलों पर प्रश्न-चिन्ह लगा रहे हैं।.(वीरेंद्र)/2-437


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 10 October 2016

2-436 झूंटे वायदे करने वाले

झूंटे वायदे करने वाले लोग,
सत्तासीन रहे सब सरकारों में,
बाद में हरिश्चंद्र बन जाते हैं, 
जो लिप्त रहे तमाम घोटालों में..(वीरेंद्र)/2-436


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 9 October 2016

2-435 मारते रहेंगे तेरे

मारते रहेंगे तेरे भेजे हर फिदायीन को, 
यूँही वीराँ कर देंगे हम तेरी ज़मीन को,
हैवानियत खूंरेज़ी हमारा मक़सद नहीं,
मगर कैसे रोकूँ इन्साफ की संगीन को..(वीरेंद्र)/2-435


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

1-808 आँख बंद कर लेने से

आँख बंद कर लेने से हक़ीक़त छुप नहीं जाती,
ये और बात है आँख खुलने तक नज़र नहीं आती..(वीरेंद्र)/1-808

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-812 बहार अब रवानगी पर है

बहार अब रवानगी पर है,
तुम आजाओ तो शायद ठहर जाये..(वीरेंद्र)/1-812


रचना: "वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 5 October 2016

2-444 मादरेवतन में मेरे कैसे

मादरेवतन में मेरे कैसे कैसे सियसतदां बैठे हैं,
जज़्बा-ऐ-वतनपरस्ती को बेचकर यहाँ बैठे हैं,
रातदिन तोहमते-नाबर्दाश्तगी लगाते थे हम पे,
वो मुंतज़िर-ऐे-हुकूमत अब क्यों बेज़ुबाँ बैठे हैं...(वीरेंद्र)/2-444


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-571 इतने भी दूर न निकल

इतने भी दूर न निकल जाएं,
फासले इतने भी न बन जाएं,
कि फिर पास आ न सकें हम,
हालात ऐसे अगर बन जाएं..(वीरेंद्र)/0571


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 30 September 2016

2-449 आज पूरा देश बहुत

आज पूरा देश बहुत खुश है पर गद्दारों तुम खुश नहीं होना, 
तुम्हारे आकाओं ने तो तुम्हे सिखाया है ताउम्र रोते ही रहना..(वीरेंद्र)/2-449


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

2-448 चंद गद्दार शाद हुए

चंद ग़द्दार शाद हुएे, जिस रोज़ हमारे जांबाज़ जवान हलाक हुए, वतनपरस्त खुश है आज, वो दहशतगर्द ज़िन्दगी से आज़ाद हुए..(वीरेंद्र)/2-448

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

2-443 बढती ही जा रही है

बढ़ती ही जा रही है 'नाबर्दाश्तगी' यहाँ वहां, 
अमन के फ़रिश्ते अब जाएँ भी तो जाएँ कहाँ,
मेरा मुल्क ही बचा था  एक महफूज़ जगाह,
शत्रु तुले हैं मिटाने को इसका भी नामोनिशाँ..(वीरेंद्र)/2-443


रचना:  वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"