Tuesday, 8 December 2015

3-87 बहते हुए अश्क छुप नहीं

बहते हुए अश्क छुप नहीं सकते पोंछ लेने के बाद भी,
अपने भुलाये जाते नहीं, बेवफा हो जाने के बाद भी,

उन्सियतें रह जाती हैं, नफरतें हो जाने के बाद भी,
कुछ नजदीकियां रह जाती हैं दूरियां हो जाने के बाद भी,

तूफां से उजड़ जाया करते हैं कुछ चमन इस तरह,
रौनक लौटके आती नहीं उनमे, बहार आने के बाद भी,

फिक्र कब होती है उस आशियाने के बर्बाद होने की,
जो टूटा हो तूफां से पहले भी, तूफां आने के बाद भी,

बेक़सूर है वो जो अंधेरों का पैहम आदी हो गया हो,
उसको उजाले नज़र नहीं आते, सहर हो जाने के बाद भी,

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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