Tuesday, 8 December 2015

2-335 तुम्हारे सिराहने कुछ

तुम्हारे सिराहने कुछ अधूरे से ख्वाब रख छोड़े थे मैंने,

तन्हाई में जब दिल न लगे, उन्हें कुछ बुन लिया करना,


मेरा स्वेटर जो बुनना शुरू किया था तुमने उसे उधेड़ना मत,

जी लगाने को कभी उल्टे सीधे फंदे उसके गिन लिया करना,


मौसम आएंगे जायेंगे अपनी-अपनी यादें लेकर हरेक साल,

परेशां न होना तुम, अतीत की खिड़कियां बंद कर लिया करना,


चहचहाते आएंगे जब चिर परिचित परिंदे हमारे आँगन में,

मेरे न होने का सबब न बताना उनकी बात सुन लिया करना,


तुम्हारे सिराहने कुछ अधूरे से ख्वाब रख छोड़े थे मैंने,

तन्हाई में जब दिल न लगे उन्हें कुछ बुन लिया करना,



रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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