Sunday, 27 December 2015

0-526 दबे-दबे से, छिपे-छिपे से,

दबे-दबे से, छिपे-छिपे से, कुछ एहसास होते हैं,
ये बेनाम से रिश्ते हैं, जो बेइंतहा ख़ास होते हैं,
ख़ामोशी, तन्हाई, जुदाई, सब के सब हैं बेमानी,
दूर रहके भी ये रिश्ते दिलों के आस-पास होते हैं...(वीरेंद्र)/0-526

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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