Sunday, 27 December 2015

1-709 सिर्फ तेज़ हवाएं ही

सिर्फ तेज़ हवाएं ही सबब नहीं हुआ करतीं,
कमनसीबी भी बुझा देती है उमीदों के चराग..(वीरेंद्र)/1-709

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-526 दबे-दबे से, छिपे-छिपे से,

दबे-दबे से, छिपे-छिपे से, कुछ एहसास होते हैं,
ये बेनाम से रिश्ते हैं, जो बेइंतहा ख़ास होते हैं,
ख़ामोशी, तन्हाई, जुदाई, सब के सब हैं बेमानी,
दूर रहके भी ये रिश्ते दिलों के आस-पास होते हैं...(वीरेंद्र)/0-526

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-525 मुहब्बत में अब आप

मुहब्बत में अब आप तल्खियाँ घोलने लगे,
बिगड़ने लगे हो जब से अंग्रेजी बोलने लगे,
मैंने कहा था इतनी ज्यादा तरक्की न करो,
के इंसान को इंसान पैमानों पर तोलने लगे..(वीरेंद्र)/0525

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 25 December 2015

2-339 भारत-पाक बातचीत

भारत-पाक बातचीत अँधा सफ़र है जिसकी कोई मंजिल नहीं,
मुद्दे हैं इसमें ऐसे, जिनका निकल सकता अब कोई हल नहीं,
नासूर बन चुके ज़ख्म पर मरहम मलना वक्त ज़ाया करना है,
कर डालो ओपरेशन उसका आज ही, किसी सूरत में कल नहीं..(वीरेंद्र)/2-339

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-338 हमें गरीबों की करनी

हमें गरीबों की करनी है मदद,
इसीलिए हमने ठप्प की है संसद..(वीरेंद्र)/2-338

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-337 हमें क्या जेल में डालोगे


हमें क्या जेल में डालोगे तुम मोदी जी,

हमने तो पूर्ण विपक्ष को जेल में डाला है

छोटे मोटे कोर्टों की हमें धमकी मत दो,

हमने सर्वोच्च फैसलों को भी बदल डाला है,,वीरेंद्र/2-337



रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-336 मोती दमक उठें जब

मोती दमक उठें जब होठ खुलें,
बादल घिर आएं जब गेसू खुलें,
नीला आकाश भी फींका दिखे,
जब वो पहनके नीला रंग चले..(वीरेंद्र)/2-336

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-330 बड़े मज़े में हो आप

बड़े मज़े में हो आप मेरा दिल तोड़ कर,
काश दिल तोडना मेरा भी शगल होता..(वीरेंद्र)/2-330

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-323 कोई ऐसा सुंदर सहज

कोई ऐसा सुंदर सहज रस्ता मुझे बतलाए,
मै दाना डालूँ कौव्वे कांव कांव करते आएं,
गर दाना पानी न भी हो कभी हाथ में मेरे,
मै जहाँ चाहूँ एक आवाज़ पे मेरी चले आएं..(वीरेंद्र)/2-323

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-524 कल्पनाओं में खोकर

कल्पनाओं में खोकर जाने क्या-क्या हम लिखते रहे,
दूरियों को ही हम जाने क्यों नजदीकियां समझते रहे,
क्यों कहते हैं लोग, दुनियां सिमट गई छोटे दायरे में,
हम रहे वहीँ के वहीँ, मगर लोगों के दायरे बढ़ते गए..(वीरेंद्र)/0524

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-708 थाम ले तू हाथ मेरा

थाम ले तू हाथ मेरा, मेरी ज़िन्दगी को संवारने दे,
बना ले मुझे अपना, वरना अजनबी ही बना रहने दे..(वीरेंद्र)/1-708

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-707 तेरे बिन, तन्हाई तो झेल

तेरे बिन, तनहाई तो झेल भी लूं मै,
तेरी ख़ामोशी का कहर सहा जाता नहीं..(वीरेंद्र)/1-707

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-706 अच्छा हुआ तेरे मेरे

अच्छा हुआ तेरे मेरे बीच फासले हो गए,
कुछ उलझनें सुलझ गईं, कुछ फैसले हो गए..(वीरेंद्र)/1-706

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 9 December 2015

1-705 कोई नहीं पुरसाँ-हाल ऐ

कोई नहीं पुरसाँ-हाल ऐ दिल तेरा, तू भी तड़पना छोड़ दे,
बदल चुकी दुनियां अब, तू भी किसी के लिए धड़कना छोड़ दे..(वीरेंद्र)/1-705

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-704 कुछ यकीं सा नहीं हुआ

कुछ यकीं सा नहीं हुआ उसके इनकार का मुझे,
कुछ यूं मुस्कुराता रहा वो जवाब देने के बाद भी..(वीरेंद्र)/1-704

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 8 December 2015

3-87 बहते हुए अश्क छुप नहीं

बहते हुए अश्क छुप नहीं सकते पोंछ लेने के बाद भी,
अपने भुलाये जाते नहीं, बेवफा हो जाने के बाद भी,

उन्सियतें रह जाती हैं, नफरतें हो जाने के बाद भी,
कुछ नजदीकियां रह जाती हैं दूरियां हो जाने के बाद भी,

तूफां से उजड़ जाया करते हैं कुछ चमन इस तरह,
रौनक लौटके आती नहीं उनमे, बहार आने के बाद भी,

फिक्र कब होती है उस आशियाने के बर्बाद होने की,
जो टूटा हो तूफां से पहले भी, तूफां आने के बाद भी,

बेक़सूर है वो जो अंधेरों का पैहम आदी हो गया हो,
उसको उजाले नज़र नहीं आते, सहर हो जाने के बाद भी,

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-335 तुम्हारे सिराहने कुछ

तुम्हारे सिराहने कुछ अधूरे से ख्वाब रख छोड़े थे मैंने,

तन्हाई में जब दिल न लगे, उन्हें कुछ बुन लिया करना,


मेरा स्वेटर जो बुनना शुरू किया था तुमने उसे उधेड़ना मत,

जी लगाने को कभी उल्टे सीधे फंदे उसके गिन लिया करना,


मौसम आएंगे जायेंगे अपनी-अपनी यादें लेकर हरेक साल,

परेशां न होना तुम, अतीत की खिड़कियां बंद कर लिया करना,


चहचहाते आएंगे जब चिर परिचित परिंदे हमारे आँगन में,

मेरे न होने का सबब न बताना उनकी बात सुन लिया करना,


तुम्हारे सिराहने कुछ अधूरे से ख्वाब रख छोड़े थे मैंने,

तन्हाई में जब दिल न लगे उन्हें कुछ बुन लिया करना,



रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-322 क्यों मद्धम होती जा रही

क्यों मद्धम होती जा रही है ज़िन्दगी,
संचार की क्यों घटती जा रही है गति,
संवाद कहाँ विलुप्त, शब्द कहाँ खो गए,
'ऊर्जा' की कहाँ होती जा रही है क्षति..(वीरेंद्र)/2-322

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 1 December 2015

3-86 खिज़ाओं को ही बहारें

खिज़ाओं को ही बहारें मै मानने लगा हूँ,
तश्नागा हूँ पर तिशनगी मांगने लगा हूँ,
ग़मों का आदी हो गया हूँ मै इस कदर,
खुशियों से भी खौफ अब खाने  लगा हूँ,
ज़िन्दगी कुछ यूं गुजरी है अंधेरों में,
सहर में भी ज़ुल्मते-शाम मांगने लगा हूँ..(वीरेंद्र)/3-86

रचना; वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"