Tuesday, 1 December 2015

3-86 खिज़ाओं को ही बहारें

खिज़ाओं को ही बहारें मै मानने लगा हूँ,
तश्नागा हूँ पर तिशनगी मांगने लगा हूँ,
ग़मों का आदी हो गया हूँ मै इस कदर,
खुशियों से भी खौफ अब खाने  लगा हूँ,
ज़िन्दगी कुछ यूं गुजरी है अंधेरों में,
सहर में भी ज़ुल्मते-शाम मांगने लगा हूँ..(वीरेंद्र)/3-86

रचना; वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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