Monday, 30 November 2015

2-328 ता-ज़िन्दगी ऐश कर ली

ता-जिंदगी ऐश कर ली यहाँ, अब उतरा हूँ सियासत के बाज़ार में,
कौम-ओ-मुल्क छोड़ना चाहता हूँ, लगता नहीं जी उजड़े दयार में..(वीरेंद्र)/2-328

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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