Monday, 30 November 2015

0-523 गीत लिखे न लिखे, मगर

गीत लिखे न लिखे, मगर कोई गीत गुनगुना तो सकता है,
पा सके, या न पा सके किसी को, पर उसे चाह तो सकता है,
मना के यहाँ हस्बे-आरजू कुछ नहीं मिलता हर किसी को,
मुकम्मल जहाँ का कोई ख्वाब तो दिल में सजा सकता है..(वीरेंद्र)/0-523

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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