Monday, 30 November 2015

2-329 देश का सम्मान करता है

देश का सम्मान करता है, आम मुसलमान,
गद्दार बस वही है, जिसका आका पकिस्तान..(वीरेंद्र)/2-329

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-328 ता-ज़िन्दगी ऐश कर ली

ता-जिंदगी ऐश कर ली यहाँ, अब उतरा हूँ सियासत के बाज़ार में,
कौम-ओ-मुल्क छोड़ना चाहता हूँ, लगता नहीं जी उजड़े दयार में..(वीरेंद्र)/2-328

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-523 गीत लिखे न लिखे, मगर

गीत लिखे न लिखे, मगर कोई गीत गुनगुना तो सकता है,
पा सके, या न पा सके किसी को, पर उसे चाह तो सकता है,
मना के यहाँ हस्बे-आरजू कुछ नहीं मिलता हर किसी को,
मुकम्मल जहाँ का कोई ख्वाब तो दिल में सजा सकता है..(वीरेंद्र)/0-523

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-522 दिल पर बोझ बहुत हैं

दिल पर बोझ बहुत हैं मेरे,
दर्द-बयानी करके हल्का कर लेता हूँ,
गम ताकतवर बहुत हैं मेरे,
ये सोच ग़मों से समझौता कर लेता हूँ..(वीरेंद्र)/0522

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-521 शायरों को है मुशायरों में

शायरों को है मुशायरों में हमेशा सलाम,
इनकी महफिलों में नहीं लफंगों का काम,
उन्हें दाद देने की गलती भी क्या करनी,
जिन्हें अदबी तहज़ीब से नहीं कोई काम..(वीरेंद्र)/0521

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 27 November 2015

1-702 इंसान तो क्या परिंदे भी

इंसान तो क्या परिंदे भी वक्त पर बदल जाते हैं,
वो भी उड़ जाते हैं जब उनके पर निकल आते हैं..(वीरेंद्र)/1-702

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-701 वक्त थम जाने की तमन्ना

वक्त थम जाने की तमन्ना की थी मैंने उन हसीन दिनों में,
वक्त का सितम देखिये, वो थमा भी तो मेरे ग़मगीन दिनों में..(वीरेंद्र)/1-701

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-700 कभी तो माफ़ कर देने

कभी तो माफ़ कर देने का सबाब ले लिया जाय,
कहीं खुद पर भी खतावार होने का वक्त न आ जाय..(वीरेंद्र)/1-700

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-699 वक्त थम भी जाय तो

वक्त थम भी जाय तो उसका क्या करूँ,
मेरे पास भी अब वक्त बचा कहाँ  है..(वीरेंद्र)/1-699

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-698 तू राज़ नहीं मेरे लिए


तू राज़ नहीं मेरे लिए, मैंने तुझे करीब से देख लिया,

जब जी चाहे आजा, अब तो तूने भी रस्ता देख लिया..(वीरेंद्र)/1-698


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-697 न बदलते तुम तो

न बदलते तुम तो खूबसूरत भरम रह जाता,
मेरा यह सरूर कुछ देर तो कायम रह जाता..(वीरेंद्र)/1-697

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-696 बहुत से लोग बहुत से

बहुत से लोग बहुत से हुनर जानते हैं,
ज़िन्दगी जीने का हुनर मगर कम जानते हैं..(वीरेंद्र)/1-696

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-695 डरता नहीं वक्त से

डरता नहीं वक्त से, तकाज़ा-ऐ-वक्त को पहचान लेता हूँ,
वक्त की हर सख्ती को, मै वक्त की नजाकत मान लेता हूँ..(वीरेंद्र)/1-695

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-694 एक आध दर्द तो हमेशा

एक आध दर्द तो हमेशा पास रखा जाय,
वो इंसान ही क्या जिससे दर्द न सहा जाय..(वीरेंद्र)/1-694

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-693 मौसम तो बदले उसके

मौसम तो बदले उसके जाने के बाद,
पर वो सुबह न हुई, वो शाम न हुई..(वीरेंद्र)/1-693

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-692 खुशनसीब हैं वो

खुशनसीब है वो जिसका दिल पत्थर होता है,
जज़्बात से दूर और ग़मों से बेखबर होता है ..(वीरेंद्र)/1-692

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-691 ले अब मैंने डरना ही

ले अब मैंने डरना ही छोड़ दिया  मौत  से,
बिगाड़ ले जो बिगाड़ना है तुझे ऐ ज़िन्दगी..(वीरेंद्र)/1-691

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"