Wednesday, 23 September 2015

2-321 मेरी राष्ट्रभाषा हिंदी

मेरी राष्ट्रभाषा हिंदी की बस उसी दिन जीत है,
जब कोई भारतीय न कहेगा "मेरी हिंदी वीक है"..(वीरेंद्र)/2-321 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-690 शिकवे-शिकायत-गिले,

शिकवे-शिकायत-गिले, मुझे मंज़ूर नहीं तेरे,
तुझे मैंने दर्द कैसे दे दिये, जब दिल ही नहीं तेरे..(वीरेंद्र)/1-690

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-689 जिस पर भी बड़ा एतबार

जिस पर भी बड़ा ऐतबार किया,
उसी ने हद-दर्जे शर्मसार किया..(वीरेंद्र)/1-689

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-520 छोड़ दो, मगर मुझे

छोड़ दो, मगर मुझे भुला न देना,
तोड़ दो, पर मुझे बिखरा न देना,
मत जलाना मेरी राहों में चराग,
पर दिल का दीया, बुझा न देना..(वीरेंद्र)/0-520

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 14 September 2015

1-688 अब और बंदिशें मत लगा

अब और बंदिशें मत लगा, रंजिशें हो जाएंगी,
बा-मुश्किल हुई मुहब्बत, अदावतें हो जाएंगी..(वीरेंद्र)/1-688

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-334 विदेशों में अंग्रेजी तो

विदेशों में अंग्रेजी तो स्वदेश में है हिंदी,
अजनबियों से सम्पर्क करवाती है हिंदी,

बिना हिंदी काम न चलता किसी का,
कहीं न कहीं तो याद आती ही है हिंदी,

कई धर्म भाषाभाषी भारतीय हैं विश्व में,
परदेस में भी सभी को मिलवाती है हिंदी,

विश्व में टूटीफूटी अंग्रेजी से काम चले,
देश के हर कोने में काम बनाती है हिंदी,

बिना राष्ट्रभाषा के गूंगा कहलाता है राष्ट्र,
मात्रभाषा की सगी बहन राष्ट्रभाषा है हिंदी..(वीरेंद्र)/2-334

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 12 September 2015

2-325 कोई बात भले ही बहुत

कोई बात भले ही बहुत बड़ी होती है,
मुंह पे लाने से मगर छोटी हो जाती है,

कभी-कभी बात बहुत छोटी होती है,
तूल देने पे मगर वो बड़ी हो जाती है,

बड़े मुंह की छोटी बात भी बड़ी होती है,
पर छोटे मुंह की बड़ी बात भी छोटी हो जाती है,

अनकही ही अच्छी जो दिल में दबी होती है,
जुबां पे ला दी अगर, तो चुभन सी हो जाती है,

एक बार की कही बात, ज़रा वजनी होती है,
बार-बार कही वोही बात, हलकी हो जाती है,

याद रहती है वो बात, जो दमदार होती है,
वर्ना तो अक्सर बात, आई-गई हो जाती है.

बिगड़ी बात भी बने, गर किस्मत सीधी होती है,
नहीं तो बनी-बनाई भी, बिगड़ी सी हो जाती है......(वीरेंद्र)/2-325

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"


Wednesday, 9 September 2015

0-519 ज़रा समझा कर बता


ज़रा समझा कर बता दिल की बात,
इतनी लच्छेदार न बना कि पल्ले न पड़े,
सीधी सी बात को इतना भी न उलझा,
एक सिरा दूसरे से मिलाना मुश्किल पड़े..(वीरेंद्र)/0-519

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"






2-327 मौजूदा से लोग बस यूंही

मौजूदा से लोग बस यूंही किलसते रहेंगे,
जो बीत गया उसके लिए व्यर्थ बिलखते रहेंगे..(वीरेंद्र)/2-327

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"








2-326 अब तेरे पास आने का

अब तेरे पास आने का मौसम आया है,
इसीलिए शायद चाँद भी निकल आया है..(वीरेंद्र)/2-326

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-687 तोड़ो, मरोड़ो, पटको,


तोड़ो, मरोड़ो, पटको, बेरहमी से मेरे दिल को,
तुम्हे क्या है पड़ी, खुद का दिल तो पत्थर का ठहरा..(वीरेंद्र)/1-687

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"






1-685 तेरे दर्द से बा-खबर


तेरे दर्द से बा-खबर हो गया हूँ मै इतना,
के मुझे अपने दर्द की भी खबर नहीं होती..(वीरेंद्र)/1-685

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"




1-684 मेरे जज्बातों मेरे एहसासों

मेरे जज्बातों मेरे एहसासों, मै मुजरिम हूँ तुम्हारा,
एक बेवफा के लिए, मैंने तुम्हे बे-इंतहा रुलाया है..(वीरेंद्र)/1-684

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"




1-683 अपने दिल में छुपा लिए थे

अपने दिल में छुपा लिए थे जो दर्द मैंने,
कम्बख्त वो आँखों के रास्ते बेपर्दा हो गए..(वीरेंद्र)/1-683

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"





1-682 यूंही जलते रहोगे मुझसे

यूंही जलते रहोगे मुझसे, तो एक दिन राख हो जाओगे,
रहा सहा वजूद बचा लो, वर्ना खुदा को क्या जवाब दे पाओगे,.(वीरेंद्र)/1-682

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"





1-680 मुहब्बत का नशा मुझे

मुहब्बत का नशा मुझे कुछ ज्यादा हो गया,
मालूम ही नहीं चला वो कब बेवफा हो गया..(वीरेंद्र)/1-680

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-681 सच्चे लोग बुरे लगते

सच्चे लोग बुरे लगते हैं, तल्ख़ हकीकत जो बता देते हैं,
चाटुकार हरदिल अज़ीज़ हैं, झूंटे ख्वाब जो दीखा देते हैं..(वीरेंद्र)/1-681

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"