Sunday, 23 August 2015

3-85 बुझने को आँधियों में

बुझने को आँधियों में, चराग हम जला देते हैं,
और कसूर तेज़ हवाओं का, हम बता देते है,

अपनी औलादों को तरबियत हम  देते नहीं,
तोहमतें अपनी किस्मत पर हम लगा देते हैं,

मालूम हैं, खोटे हैं हमारे ही अपने सिक्के,
फिर भी बाज़ार में उन्हें हम चला देते हैं,

जला देते थे इंसान को, बाद मरने के उसके,
पर बहु बेटियों को जिंदा ही अब जला देते हैं,

उस हुकूमत से क्या कीजे उमीदे-इंसाफ़ 'वीरेंद्र'
जिसके मुंसिफ गुनाह को जायज़ ठहरा देते हैं..(वीरेंद्र)/3-85

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"
















औलादों को तरबियत हम देते नहीं,
तोहमतें अपनी किस्मत पे लगा देते है।
जला देते हैं चराग आँधियों में हम,
और कसूर हवाओं का बता देते हैं।
मालूम है हमारे सिक्के हैं खोटे,
फिरभी बाजार में उन्हें हम चला देते हैं।
उस हुकूमत से क्या उमीदे-इन्साफ,
मुंसिफ जिसके गुनाह जायज़ ठहरा देते हैं।
जला देते थे इंसा को, बाद मरने के,
पर बहु बेटियों को अब ज़िंदा जला देते हैं।
••• वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"•••©

Friday, 21 August 2015

1-679 मेरे ख्यालात में उतरने

मेरे ख्यालात में उतरने के वास्ते जज्बाती नज़र चाहिए,
माफ़ी चाहूँगा उनसे, जीने मेरी शायरी में 'बहर' चाहिए..(वीरेंद्र)/1-679

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-516 हमसफ़र साथ चल,

हमसफ़र साथ चल, तू न राहे-मंजिल की परवाह कर,
सफ़र में कोई मोड़ न आये, तू बस इसी की दुआ कर,
आ भी जाए कभी कोई दो-राहा या चौ-राहा सफ़र में,
डगमगा न जाएं कहीं कदम, बस इतनी इल्तिजा कर..(वीरेंद्र)/0-516

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-517 तू एक बहाना ही सही,

 तू एक बहाना ही सही, मगर  
मेरे जीने के लिए काफी वो है,
ज़िन्दगी मेरी तनहा ही सही,
पर कहने को, ज़िन्दगी तो है..(वीरेंद्र)/0-517

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-518 जुस्तजू में उसकी दूर


जुस्तजू में उसकी दूर मै निकल गया,

रुसवाइयों का घूँट भी मै निगल गया,

नाम लेकर जिसका मै जीने लगा था,

अबतो उसका वो नाम भी बदल गया..(वीरेंद्र)/0-518


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 16 August 2015

0-515 कभी वादा, कभी भरोसा,

कभी वादा, कभी भरोसा, कभी दिल,
तुमको तो बस तोड़ देने की आदत है,
कभी आरज़ू, कभी उम्मीद, कभी जिद,
हमको भी कभी न छोड़ने की आदत है..(वीरेंद्र)/0-515

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-514 सच है किसी को मुकम्मल

सच है किसी को मुकम्मल जहाँ मिला नहीं,
मै भी इस दुनियां में ग़मज़दा अकेला नहीं,
झाँका जो मजलूमों की ज़िन्दगी में तो देखा,
भूख प्यास का दर्द खुदा से मुझे मिला नहीं..(वीरेंद्र)/0-514

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-513 क्यों घूम फिर कर लौट

क्यों घूमफिर के लौट आता है दर्द मेरे पास,
क्या इस दर्द का भी  'कोई मज़हब नहीं होता',
क्यों लपेट लेता हैं ये मुझे अपने शिकंजे में,
क्या इसे भी खुदा से कोई मतलब नहीं होता..(वीरेंद्र)/0-513

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-678 हर ग़म के बाद

हर ग़म के बाद आएगी कोई ख़ुशी, हम ये मान लेते हैं,
हर मर्तबा जाने क्यों हम नई खुशफहमी पाल लेते हैं..(वीरेंद्र)/1-678

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-677 ज़िन्दगी बाखुशी यूं तन्हा

ज़िन्दगी बाखुशी यूं तन्हा हम बसर करते रहे,
हमसाये को ही हमराह मंज़ूर हम करते रहे..(वीरेंद्र)/1-677

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-675 गनीमत है दिल के आईने

ग़नीमत है दिलों के टूटने पर आवाज़ नहीं होती,
वरना टुकड़ों के साथ रुसवाइयों की भरमार बड़ी होती..(वीरेंद्र)/1-675

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-674 ग़मों का अजायबघर हूँ मै

ग़मों का अजायबघर हूँ मै, मेरे दर्द हैं किस्म किस्म के,
दिल के किसी कोने में दर्दे-नफरत है, तो दर्दे-मुहब्ब्बत भी..(वीरेंद्र)/1-674

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-673 ज़ख्मों की परत दर परत

ज़ख्मों की परत दर परत मेरे शेरों में कुछ ऐसी खुली,
कई चेहरों पर ख़ुशी, तो कई चेहरों पर मायूसी मिली ..(वीरेंद्र)/1-673

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-672 मुझे इल्हाम हुआ था

मुझे इल्हाम हुआ था वो बेवफा ज़रूर आयेगा,
उसके लिए मैंने चंद साँसे बचा कर रक्खीं थीं..(वीरेंद्र)/1-672

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-324 यह कैसा मौज-मस्त


यह कैसा मौज-मस्त परिवर्तन हो रहा है,

धर्मनिरपेक्ष भी अब "धार्मिक" हो रहा है,



ये कैसे जल्वे बिखेर दिये "माँ" "बापू" ने,

हरेक "घर वापसी" को आतुर हो रहा है,



आस्थाएं तीव्र हो रही हैं सब के मन में,

हर कामुक प्रसंग में आकर्षित हो रहा है,



नीरसता का अब काम नहीं धर्म क्षेत्र में,

धर्म संग कर्म का भी प्रचलन हो रहा है.



आओ नास्तिकों तुम आस्तिक हो जाओ,

आनंद-धर्म का वृहद आयोजन हो रहा है।



•••वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"•••2-244

2-318 कुछ लोग हमारी माँ

कुछ लोग हमारी "माँ "हो गए,
और कुछ पूज्य "बापू" हो गए,
सगे माँ-बाप तो वृद्धाश्रम में हैं,
ढोंगी गैर हमारे माँ-बापू हो गए,

माता-पिता को तो कभी पूछा नहीं,
गैरों के चरणों में नित्य लोट रहे हैं,
मात्र-पितृ भक्ति कभी समझी नहीं,
ढोंगियों की भक्ति में लीन हो रहे हैं.

ईश्वर है कि नहीं, ये भी ज्ञात नहीं,
मानवता की जानते कोई बात नहीं,
मूर्ख अंध-भक्त बन कर देखा-देखी, 
बस पाखंडियों को ही पूज रहे हैं..(वीरेंद्र)/2-318

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-316 उमड़ घुमड़ कर ह्रदय

उमड़ घुमड़ कर ह्रदय में जब भावनाएं छा जाती हैं,
कभी प्रेम छलका देती हैं, कभी अश्रू बरसा जाती हैं..(वीरेंद्र)/2-316

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-315 पांवों में जंजीर बंधे

पांवों में जंजीर बंधे, रेस से बाहर, कितने ही घोड़े यहाँ घूम रहे हैं,
वर्तमान व्यवस्था में खच्चर गधे नित नयी बुलंदियां चूम रहे हैं..(वीरेंद्र)/2-315

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-314 शत्रुओं से घनिष्टता

शत्रुओं से घनिष्टता, अपनों से शत्रुता,
कष्ट है कोई तो छोड़ दे छल कपटता..(वीरेंद्र)/2-314

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 5 August 2015

0-512 चुपके से निकल गया मेरी

चुपके से निकल गया मेरी ज़िन्दगी से वो,
बड़ी जोर-शोर से जो ज़िन्दगी में आया था.
ऊंची-ऊंची वो लहरें जाने कहाँ खो गयीं,
ज्यूं ही पास समुन्दर का किनारा आया था..(वीरेंद्र)/0-512

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 2 August 2015

3-84 खिजाएँ ही बस दोस्ती

 ख़िज़ाएँ ही बस दोस्ती का हाथ बढ़ाती हैं,

तुम भी तो कभी हाथ बढ़ाया करो, बहारों।


पतझड़ रहा मुझसे बा-वफ़ा अभी तक,

कभी तुमभी तो वफ़ा निभाया करो, बहारों


मेरे गुलशन पे नज़र रक्खी है ख़िज़ाओं ने,

कभी तुमभी तो देखने आया करो, बहारों।


शूल ही शूल बिखरेे हैं हर तरफ आँगन में,

कभी तुम आके फूल बरसाया करो, बहारों।


आ-आ कर, रुला-रुला कर चली जाती हो,

कभी तो मुस्कुरा भी लेने दिया करो, बहारों।/3-84


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी ©