Tuesday, 28 July 2015

2-312 बहुत लोग रिश्तों की

बहुत लोग रिश्तों की दूकान खोल के बैठे हैं,
जैसा भी ग्राहक को चाहिए वैसा बेच देते हैं...(वीरेंद्र)/2-312 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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