Tuesday, 28 July 2015

0-509 कुछ लोग चेहरे मोहरे से



कुछ लोग चेहरे-मोहरे से भोले लगते हैं, पर वो होते नहीं,

जो कड़वे कसैले दीखाई देते हैं, सच में वैसे वो होते नहीं,

भरपूर मुहब्बतें भी, बेइंतहा नफ़रतें भी हैं इसी जहाँ में,

सच्चे मगर जो लोग हैं, बीज यहाँ नफरतों के वो बोते नहीं।(वीरेंद्र)/0-509

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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