Thursday, 16 July 2015

0-503 अबकी बार रुक जाने को

अबकी बार रुक जाने को आई है,
या फिर से लौट जाने को आई है,
मेरी जिंदगी की वो पुरानी ख़ुशी,
आज फिर थोड़ी सी लौट आई है..(वीरेंद्र)/0-503

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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