Friday, 31 July 2015

2-320 रहम की दरख्वास्त

रहम की दरख्वास्त करने वाला सो गया,
जिससे की थी दरख्वास्त वो भी सो गया,
सब कुछ होने लगा है ब-दस्तूर आज से,
नुक्सान हुए, पर मसलों का हल हो गया..(वीरेंद्र)/2-320

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-319 नदियाँ न पिएँ अपना जल

नदियाँ न पिएँ अपना जल,
वृक्ष भी न खाएं अपना फल,
इंसान मगर उनसे सब लेकर,
उन्हीं को नष्ट करता हर पल..(वीरेंद्र)/2-319

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-671 दहशतगर्दों तुम अपनी जान से

दहशतगर्दों तुम अपनी जान से चले जाओगे,
पर अपने पीछे कई चेहरे बेनकाब कर जाओगे..(वीरेंद्र)/1-671

रचना : वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-511 मुझे पढ़ा करते हैं


मुझे पढ़ा करतेे हैं कुछ ख़ास लोग ही,

मैं दीवार पर लिखा इश्तहार नहीं हूँ।

उड़ादूं अपनी शायरी के पन्ने बाजारों में,

मैं उन शायरों में कतई शुमार नहीं हूँ।..(वीरेंद्र)/0-511



रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-510 इन्सा की शख्सियतें हैं


इन्सां की शख्सियतें हैं जुदा जुदा,

उनके आमाल भी हैं जुदा जुदा,

मगर अंजामे-आखरी में फर्क नहीं,

बस मौत के अंदाज़ हैं जुदा जुदा।.(वीरेंद्र)/0510




रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"


Tuesday, 28 July 2015

1-670 मुहब्बत का ये कैसा अजीब

मुहब्बत का ये कैसा अजीब सिला है,
ख़ुशी एक बार दर्द हज़ार बार मिला है..(वीरेंद्र)/1-670

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-669 खोटी थी हमारी किस्मत

खोटी थी हमारी किस्मत, फिर भी उसे हम आजमाते रहे,
बेवफा हो गया था वो मगर आजमाए को हम आजमाते रहे..(वीरेंद्र)/1-669

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-313 कुछ नसीहतें अपने लिए

कुछ नसीहतें अपने लिए भी तो संभाल कर रख ले "वीरेंद्र"
निहायत ज़रूरी हैं ये तेरे वास्ते भी, इन्हें यूं न लुटाया कर लोगों में..(वीरेंद्र)/2-312 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-312 बहुत लोग रिश्तों की

बहुत लोग रिश्तों की दूकान खोल के बैठे हैं,
जैसा भी ग्राहक को चाहिए वैसा बेच देते हैं...(वीरेंद्र)/2-312 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-311 इतने भी 'व्यवहारिक' न बनो

इतने भी 'व्यवहारिक' न बनो कि संपूर्ण जीवन अव्यवहारिक हो जाय,
मान्यताएं रूढ़ियाँ तब तोड़ो जब समाज का उससे कोई हित हो जाय..(वीरेंद्र)/2-311

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-310 खिचड़ी पक गई समझो

खिचड़ी पक गई समझो जब चावल के संग दाल गलती है,
बुखार-ऐ-इश्क चढ़ गया समझो जब दिल से ग़ज़ल निकलती है..(वीरेंद्र)/2-310 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-509 कुछ लोग चेहरे मोहरे से



कुछ लोग चेहरे-मोहरे से भोले लगते हैं, पर वो होते नहीं,

जो कड़वे कसैले दीखाई देते हैं, सच में वैसे वो होते नहीं,

भरपूर मुहब्बतें भी, बेइंतहा नफ़रतें भी हैं इसी जहाँ में,

सच्चे मगर जो लोग हैं, बीज यहाँ नफरतों के वो बोते नहीं।(वीरेंद्र)/0-509

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-508 अपनों से डरता हूँ

अपनों से डरता हूँ,
बड़े गैर होते हैं वो,
दिल तोड़ते हैं वही,
दिल में रहते हैं जो..(वीरेंद्र)/0-508 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-507 तिल्ली से घरों के


तिल्ली से घरों के चिराग रौशन हो जाते हैं,

तिल्ली से शहर के शहर ख़ाक हो जाते हैं,

तिल्ली घरों के चूल्हे जलाती है, बुझाती भी है,

तिल्ली के इस्तमाल में हम अंधे हो जाते हैं..(वीरेंद्र)/0-507

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 17 July 2015

1-676 मेरी ग़ज़ल मेरे शेर

मेरी ग़ज़ल मेरे शेर दुनिया ने पढ़े,
लिक्खे थे मैंने जिसके लिए बस उसी ने न पढ़े .(वीरेंद्र)/1-676

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-668 मै खुदा को समझा

मै खुदा को समझा, उसकी कायनात को समझा,
बस एक शख्स को न मै समझा, न मुझे वो समझा..(वीरेंद्र)/1-668

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-667 सभी बदस्तूर है वो गयी

सभी बदस्तूर है, वो गयी मेरी ज़िन्दगी से जबसे,
मगर महक कोई न रह गयी इन हवाओं में तबसे..(वीरेंद्र)/1-667

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-666 किसी के लिए बेचैनी

किसी के लिए बेचैनी इश्क की अलामत हो, ज़रूरी नहीं,
इश्क बिना भी कभी कभी दिल को दिल से राह होती है..(वीरेंद्र)/1-666

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-665 ज़िन्दगी मिली है इंसा को

ज़िन्दगी मिली है इंसा को तकलीफे उठाने के लिए,
कोई ख़ुशी आती भी है इसमें तो लौट जाने के लिए..(वीरेंद्र)/1-665

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-664 ये सोचकर कौन डूबता

ये सोचकर कौन डूबता है दरिया में,
कि डूबते को तिनके का सहारा बहुत है..(वीरेंद्र)/1-664

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-663 हमने भी अब बनावट का

हमने भी अब बनावट का लबादा ओढ़ लिया,
सच्चे दिल से मिलने पर कतराने लगे थे लोग..(वीरेंद्र)/1-663

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 16 July 2015

0-506 अब मै पत्थरों में शुमार

अब मै भी पत्थरों में शुमार हूँ,
यहाँ जज़्बात का कोई काम नहीं,
रंजो-गम आहों आंसुओं से दूर हूँ,
यहाँ एहसासात का नाम निशान नहीं..(वीरेंद्र)/0-506

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-505 खून खराबे लूटपाट

खूनखराबे लूटपाट की बुनियाद पर तामीर,
महलों से निकले हैं ये रहनुमा मुफलिसों के,
सभी गरीब आओ, उनके हाथ मज़बूत करें,
ताकि वे हासिल कर सकें हकूक मजलूमों के..(वीरेंद्र)/0-505

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-504 लूटने का जिसको मौका

लूटने का जिसको मौका है मिल रहा वो भ्रष्टाचारी है,
अवसर जिसको नहीं मिला, वो ही एक सदाचारी है,
सुनियोजित ढंग से सभी लूट रहे बेचारी जनता को,
आज इस दल की बारी, तो कल उस दल की बारी है..(वीरेंद्र)/0504

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-503 अबकी बार रुक जाने को

अबकी बार रुक जाने को आई है,
या फिर से लौट जाने को आई है,
मेरी जिंदगी की वो पुरानी ख़ुशी,
आज फिर थोड़ी सी लौट आई है..(वीरेंद्र)/0-503

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-502 ऐसा नहीं सिर्फ कागज़

 ऐसा नहीं सिर्फ कागज़ कलम इश्क ही चाहिए,
शेरो शायरी करने को थोडा सा हुनर भी चाहिए,
इश्क तो दे देता है हसीन जज़्बात-ओ-ख्यालात,
ढालने को उन्हें ग़ज़ल में एक शायर भी चाहिए..(वीरेंद्र)/0-502

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-501 न जाने क्यों आज भी

न जाने क्यों आज भी होता नहीं यकीं,
कि तुम इतने बेवफा हो गए हो मुझसे,
मै समझा देता हूँ अपने नादां दिल को,
तुम बेवफा नहीं बस रूठ गए हो मुझसे...(वीरेंद्र)/0501

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-500 झुलसाती गर्मी में अगर

झुलसाती गर्मी में अगर थोड़ी बरसात हो,
दर्द भरी इस तन्हाई में अगर तेरा साथ हो,
जुबां से काम लेने की फिर क्या दरकार,
जब आँखों ही आँखों में दिल की बात हो..(वीरेंद्र)/0-500

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-499 वक्त निकलता है तो

वक्त निकलता है तो निकल जाए,
ये दिलकश मंज़र हम निकलने नहीं देंगे,
नहीं छोड़ेंगे दामन इन हसीन पलों का,
इन रिश्तों की गर्माहट कम होने नहीं देंगे..(वीरेंद्र)/0-499

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 15 July 2015

2-210 नींद से जगा सा

नींद से जगा सा,
राह में लुटा सा,
खडा हूँ दोराहे पर,
मै वक्त से ठगा सा..(वीरेंद्र)/2-210 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-308 यूं तो कमियाँ हर इंसान

यूं तो कमियां हर इंसान में बहुत सारी होती हैं,
मगर कुछ कमियां बाकी सब पर भारी होती हैं,
बस एक हम ही हैं मुकम्मल दौर-ऐ-ज़िन्दगी में,
यूं सोच लेना भी गलतफहमियां हमारी होती हैं..(वीरेंद्र)/2-308

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-317 सूरज को समेट के रख

सूरज को समेट के रख दूं अपने आँगन में,

चाँद की रौशनी को भर लूं अपने दामन में,


मै प्रकृती का शत्रु स्वार्थी इंसान जो ठहरा,

प्रकृति को जकड लूं मैं अपने बंधन में।


उजाड़ डालूँ जंगल, ध्वस्त करूँ पहाड़ों को,

नष्ट कर दूं प्रकृति को मैं अपने आनंद में।


गर्मी सर्दी वर्षा सभी का संतुलन बिगाड़ दूं,

पर्यावरण नष्ट करके सूखा ला दूं सावन में!


कुदरत दिखाए जब तांडव रौद्ररूप यहाँ वहां,

तब सर अपना पकड़के बैठूं मैं रूदन क्रंदन में।..(वीरेंद्र)/2-317


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"