Tuesday, 9 June 2015

1-661 मुझको नहीं किसी और मंजिल

मुझको नहीं किसी और मंजिल की आरज़ू, 

अब सफ़र ख़त्म न होना ही मेरी मंजिल है ...(वीरेंद्र)/1-661


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

No comments:

Post a Comment