Monday, 8 June 2015

1-030 हमने तो अजनबियत की

हमने तो अजनबियत की चादर ओढ़ ली थी कभी की,
अब तन्हाईयाँ लोरी सुनाके सुलाने की कोशिश में हैं..(वीरेंद्र)/1-030

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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