Monday, 8 June 2015

0-092 जंजीरों से बांध सकते हो

जंजीरों से बाँध सकते हो इंसान को तुम,
पहरे बैठा सकते हो इर्द गिर्द उसके, पर 
आज़ाद परिंदे बेसाख्ता उड़ जाएँगे कहीं,
बाँध सकते नहीं, दिलो-जज़्बात को तुम..(वीरेंद्र)/0-92

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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