Monday, 8 June 2015

0-383 वक्त ने दे रखी थी

वक्त ने दे रखी थी हमें सज़ा,
हमारे ज़ख्म कबसे पल रहे थे,
ज़ख्म भरते भी कैसे बेचारे,
'अपने' जो मरहम मल रहे थे..(वीरेंद्र)/0-383

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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