Monday, 8 June 2015

0-250 मिल गया पैगाम उसका,

मिल गया पैगाम उसका, जो उसने मुझे भेजा भी नहीं,

पढ़ लिया मैंने वो सभी, जो उसने मुझे लिखा भी नहीं,

कौनसा है यह सिलसिला, मेरे और उसके दरमियान,

जो कभी किसी ने सुना नहीं, जो किसी ने देखा भी नहीं. ...(वीरेंद्र)/0-250


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

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