Wednesday, 17 June 2015

3-83 ये बारिशें भी इंसान

ये बारिशें भी इंसान इंसान में फर्क कर रहीं हैं,
कहीं बत्तियां रौशन, तो कहीं गुल कर रहीं हैं.

कहीं ख़ुशी, कहीं ग़म हैं बारिशों की आमद से,
कहीं फसलें हरी तो कहीं पैदावारें बह रहीं हैं,

जशन मन रहे हैं कहीं कहीं, ऐ तेज़ बारिशों,
पर कच्चे घरों की गीली दीवारें हिल रहीं हैं.

मेरे लिए बारिशों का बस इतना सा है मतलब,
भरी हुईं थीं जो आँखें कब से, अब बह रहीं हैं,

इल्म है, ये कागज़ की कश्ती मेरी गल जायगी,
अभी तो बहती देख इसे तसल्लियाँ मिल रहीं हैं,

ख्वाब, ख्वाब ही रहते हैं, मुझे पता है "वीरेंद्र",
पर यूं ही दिल में उम्मीदें, फिर भी पल रहीं हैं...(वीरेंद्र)/3-83

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 9 June 2015

2-297 "विश्शु भैया"

 विश्शू भैय्या.......

हमारी माँ के सबसे सुंदर बेटे थे तुम, "विश्शू भैय्या",
भले ही हो गए आज तुम हमारी आँखों से ओझल,
पर दिलों में बने रहोगे तुम वैसे ही, हर क्षण, हर पल,
तुम थे अदभुत जीवत के, अन्य सभी से हटके,
जीवन भर ही बांटते रहे तुम हमें खुशियाँ  और प्रीत,
कैसे  भूलें  कृष्णाजी, विवेक, विकास और  विनीत,
जो हसीन ख्वाब देखे थे तुमने अपनी "टायब्रोस" में,
तुम छोड़ कर क्यों चल दिए ऐसे ही बस बीच में,
अभी तो बहुत कुछ तरक्की बाकी थी तुम्हे देखने को,
"वेलनेस" का तुम्हारा सपना था बस पूरा होने को,

तुम जहां हो, वहीँ से देखोगे, वो सब होता हुआ,
जो तुमने सोचा था, चाहा था, परिवार के लिए,
पूर्ण होंगे वो हर काम ,तुमने रखी नींव जिनकी,
पूर्ण करेंगे तुम्हारी पत्नी,पुत्र,बाहें और पोता-पोती.......................................(वीरेंद्र)

                                तुम्हारा छोटा भाई: वीरेंद्र  ("लाला")  १७.२.२०१२.

1-659 जियो ज़िन्दगी को इतना

जियो ज़िन्दगी को इतना कि और मांगनी पड़े,
इतना भी न सिमटो हद में की वो लांघनी पड़े...(वीरेंद्र)/1-659

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-661 मुझको नहीं किसी और मंजिल

मुझको नहीं किसी और मंजिल की आरज़ू, 

अब सफ़र ख़त्म न होना ही मेरी मंजिल है ...(वीरेंद्र)/1-661


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 8 June 2015

1-041 खुशियों की बड़ी चाह थी

खुशियों की बड़ी चाह थी जिनसे, बहुत रुलाया उन्हीं ने,
जिनको  अपना बनाया था,  हमें अजनबी बनाया उन्हीं ने....(वीरेंद्र)/1-041

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-030 हमने तो अजनबियत की

हमने तो अजनबियत की चादर ओढ़ ली थी कभी की,
अब तन्हाईयाँ लोरी सुनाके सुलाने की कोशिश में हैं..(वीरेंद्र)/1-030

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-442 बहुत अरसे बाद अब

बहुत अरसे बाद अब जाके सुकून मिला है,
लम्बी दुआओं का आज जाके फल मिला है,
एक पुराना ज़ख्म जो बन रहा था नासूर, 
उसे काट फेंकने को नश्तर माकूल मिला है..(वीरेंद्र)/0-442

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-383 वक्त ने दे रखी थी

वक्त ने दे रखी थी हमें सज़ा,
हमारे ज़ख्म कबसे पल रहे थे,
ज़ख्म भरते भी कैसे बेचारे,
'अपने' जो मरहम मल रहे थे..(वीरेंद्र)/0-383

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-250 मिल गया पैगाम उसका,

मिल गया पैगाम उसका, जो उसने मुझे भेजा भी नहीं,

पढ़ लिया मैंने वो सभी, जो उसने मुझे लिखा भी नहीं,

कौनसा है यह सिलसिला, मेरे और उसके दरमियान,

जो कभी किसी ने सुना नहीं, जो किसी ने देखा भी नहीं. ...(वीरेंद्र)/0-250


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-218 मैंने तो खोया ही दिया

मैंने तो खो ही दिया था तुम्हे,
अब तुमने भी मुझे खो दिया है,
दूर रहे क्यों तुम इतना मुझसे,
तुम बिन मैंने जीना सीख लिया है.,(वीरेंद्र)/0-218

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-167 रकीब ने लिख मारा

रकीब ने लिख मारा उनके दुपट्टे पे फालतू सा शेर,
बस, वो हमें भूलकर, उस शख्स के दीवाने हो गए,
वो जो हम पढते रहे कसीदे ताउम्र, उनके हुस्न के ,
खुदा जाने क्यों हम ही उनके वास्ते पराये हो गए,..(वीरेंद्र)/0-167

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-165 यकीन कर, मुझे इसका

यकीन कर, मुझे इसका गम नहीं,
जो मेरे शेर ग़ज़ल तुझे पसंद नहीं,
गैरों को मुबारक हो तेरी वाहवाह,
यकीन कर, मुझे इसका रंज नहीं ..(वीरेंद्र)/0-165

रचना: वीरेंद्र सिन्हा("अजनबी") 

0-092 जंजीरों से बांध सकते हो

जंजीरों से बाँध सकते हो इंसान को तुम,
पहरे बैठा सकते हो इर्द गिर्द उसके, पर 
आज़ाद परिंदे बेसाख्ता उड़ जाएँगे कहीं,
बाँध सकते नहीं, दिलो-जज़्बात को तुम..(वीरेंद्र)/0-92

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 3 June 2015

1-658 इंसान जब देता है इल्जाम

इंसान जब देता है इल्जाम ज़माने को,
भूल ही जाता है वो भी शामिल है ज़माने में..(वीरेंद्र)/1-658

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-498 बहुत मशकूर हूँ

बहुत मशकूर हूँ मेरी तन्हाई लौटा दी तुमने.

मुहब्बत में पाई मेरी कमाई लौटा दी तुमने,

अमानत में खयानत मगर कर क्यों कर दी,

मैंने तो दी थी वफ़ा, बेवफाई लौटा दी तुमने...(वीरेंद्र)/0498


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-657 उसने तो कह दिया

उसने तो कह दिया, मगर मै कैसे भूल जाऊं उसे,
मै जब लडखडा रहा था, उसी ने तो संभाला था मुझे..(वीरेंद्र)/1-657

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 1 June 2015

2-296 मै भी सेक्यूलर होता


मैं भी सेक्युलर होता:

यदि JNU से पढ़कर निकला होता

यदि बुद्धिजीवी वर्ग में शुमार होता

यदि छोटा मोटा सेलिब्रिटी होता

यदि खाते पीते अमीर घर का होता

यदि करोड़ों का मेरा टर्न ओवर होता

यदि विदेशों में मेरा धन जमा होता

यदि मीडिया से नाता जुड़ा होता

यदि मै भी उभरता राजनेता होता

यदि अल्पसंख्यक-वोटों पर निर्भर होता

मगर क्या करूँ आम आदमी जो ठहरा।..(वीरेंद्र)/2-296


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

3-82 ढूँढ कर तो देखो

ढूँढ कर तो देखो, खुदा कहाँ नहीं मिलता,

मिलता नहीं अगर कहीं, तो इंसा नहीं मिलता,


ज़ुबानों पर  रक्खे हैं चाहतों के अल्फाज़,

दिलों में मगर मुहब्बतों का निशां नहीं मिलता,


खुदा ने ही दे रक्खा है हुक्म जीने का,

जिंदगी न होती तो कोई शख्स परेशां नहीं मिलता,


कौन खाता खौफ खुदा के कहर से,

इंसान को अगर मौत का फरमाँ नहीं मिलता,


खुदा के सामने कर लो अपने गुनाह कबूल,

के इस जहाँ में उससे बड़ा कोई राजदां नहीं मिलता....(वीरेंद्र)


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"/3-82

1-656 कोशिश न कर ऐ ख़ुशी

कोशिश न कर ऐ ख़ुशी, मुझे मेरे ग़मों से जुदा करने की,
ता-उम्र इन्होने साथ निभाया है, तू तो एक पल को आई है..(वीरेंद्र)/1-656

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"