Friday, 29 May 2015

3-80 मिलता है वो रोज़

मिलता है वो रोज़ राहों में, मगर अजनबी है अभी,
आँखों आँखों में इशारे हुए हैं, जुबां खुलनी है अभी,

लहराई हुई हैं जुल्फें सुर्ख रुखसार पर उसके,
पूरे हो जांय दीदार ऐसी कोई हवा चलनी है अभी,

राहे-इश्क में कुछ धुंध सी फैली हुई है "वीरेंद्र"
मुहब्बत की पुरनूर शम्मा दिलों में जलनी है अभी..(वीरेंद्र)/3-80

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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