Friday, 29 May 2015

0-494 बेतुकी ही रह गई

बेतुकी ही रह गई ये ज़िन्दगी हमारी,
ता-उम्र तुकबन्दियाँ ही हम मिलाते रहे,
दाद पर दाद मिलती रही मुशायरों में,
फ़क्त तसव्वुरी इश्क हम फरमाते रहे..(वीरेंद्र)/0-494

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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