Tuesday, 12 May 2015

0-493 अन्दर से मै एक हूँ

अन्दर से मै एक हूँ पर बाहर से अनेक मेरे चेहरे हैं,
कुछ दीखते रात को हैं, और कुछ दीखते सवेरे हैं,
दुनियां भले न पहचाने इन चेहरों की असलियत,
आइना मगर रोज़ कहता है ये सबके सब मेरे हैं..(वीरेंद्र)/0-493

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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