Tuesday, 12 May 2015

0-492 मिलता है रोज़ वो राहों में

मिलता है रोज़ वो राहों में, मगर अजनबी है अभी,
आँखों में इशारे हो जाते हैं, पर जुबां खुलनी है अभी,
राह-ऐ-इश्क में कुछ धुंध सी फैली हुई है, "वीरेंद्र",
मुहब्बत की शम्मा दिलों में पुरनूर जलनी है अभी..(वीरेंद्र)/0-492

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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