Thursday, 7 May 2015

0-489 लुट चुके हैं जज़्बात

लुट चुके हैं जज़्बात और एहसासात कभी के,
अब मै ज़मीर का सरमाया बचाना चाहता हूँ,
मुझको फिरौती की रकम बता दे ऐ ज़माने,
अब मै ज़िन्दगी को रिहा कराना चाह्ता हूँ..(वीरेंद्र)/0-489

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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