Sunday, 31 May 2015

3-81 उड़ लो चाहे जितना आसमां

उड़ लो चाहे जितना आसमां में,

पर कदम वहां ठहर नहीं सकते.



उतर लो चाहे जितना गहराई में,

ज़्यादा देर वहां ठहर नहीं सकते.



सिर्फ ज़मीं हो सकती है ठिकाना,

और कहीं इन्सां ठहर नहीं सकते.



सदाक़त का निज़ाम है जहाँ भी,

पाँव झूंट के वहां ठहर नहीं सकते..(वीरेंद्र)/3-81


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 29 May 2015

2-306 जिनके पास उपलब्धियां

जिनके पास उपलब्धियां नहीं अपनी गिनाने को,
अपने व्यक्तित्व में एक भी गुण नहीं बताने को,
वे बेचारे किस्मत के मारे राजनीति करें भी तो कैसे,
बस ढूंढते ही रहते हैं  मन-घडंत इल्जाम लगाने को..(वीरेंद्र)/2-306

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

3-80 मिलता है वो रोज़

मिलता है वो रोज़ राहों में, मगर अजनबी है अभी,
आँखों आँखों में इशारे हुए हैं, जुबां खुलनी है अभी,

लहराई हुई हैं जुल्फें सुर्ख रुखसार पर उसके,
पूरे हो जांय दीदार ऐसी कोई हवा चलनी है अभी,

राहे-इश्क में कुछ धुंध सी फैली हुई है "वीरेंद्र"
मुहब्बत की पुरनूर शम्मा दिलों में जलनी है अभी..(वीरेंद्र)/3-80

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-497कच्ची कलि से फूल

कच्ची कलि से फूल खिले क्यों थे,
बे-दर्द बे-वफा से हम मिले क्यों थे,
मंजिल अगर जुदा थी उसकी तो,
हमसफ़र बनके साथ चले क्यों थे..(वीरेंद्र)/0-497

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-496 खौलते पानी के बुलबुले

खौलते पानी के बुलबुले शांत हो गए,
चुप बेचारे योगेन्द्र और प्रशांत हो गए,
नेताजी ने दबा दी लोकतंत्र की आवाज़,
मीडिया के मेले भी अब एकांत हो गए..(वीरेंद्र)/0-496

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-495 मुकम्मल हो जाये

मुकम्मल हो जाये ग़मगीन ग़ज़ल,
चोट कोई आज ताज़ा पहुँचाओ मुझे,
मेरी आँखों में रुके आंसू छलक जाएँ,
दर्द आज कोई ऐसा पहुँचाओ मुझे..(वीरेंद्र)/0-495

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-494 बेतुकी ही रह गई

बेतुकी ही रह गई ये ज़िन्दगी हमारी,
ता-उम्र तुकबन्दियाँ ही हम मिलाते रहे,
दाद पर दाद मिलती रही मुशायरों में,
फ़क्त तसव्वुरी इश्क हम फरमाते रहे..(वीरेंद्र)/0-494

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-655 दर्द भरे मेरे शेर

दर्द भरे मेरे शेर दिलों में उतर जाएं बज़्म वालों के,
लाओ आज मै भी चेहरे पे संजीदगी इतनी ले आऊँ...(वीरेंद्र)/1-654

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-654 उसे तलाश है किसी की

उसे तलाश है किसी की तो मै उसकी तलाश हो जाऊं,
उसे गर आरज़ू है किसी की तो वो आरज़ू मै हो जाऊं..(वीरेंद्र)/1-654

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-653 खुद जो सारे जहाँ

खुद जो सारे जहाँ के लिए एक सिरदर्द है,
सिर ना होते हुए भी उसके सिर में दर्द है..(वीरेंद्र)/1-653

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-652 हर धूर्त की एक यही

हर धूर्त की एक यही है पहचान,
उसे धूर्त ही दीखता है हर इंसान..(वीरेंद्र)/1-652

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-651 चोट सहने का इतना

चोट सहने का इतना आदी हो गया है दिल,
इधर लगती है चोट, उधर दर्द पुराना हो जाता है..(वीरेंद्र)/1-651

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 12 May 2015

2-309 लुटने पिटने को तैयार

लुटने पिटने को तैयार बैठे हैं हम मूर्ख लोग,
बस किसी शातिर सियासतदां के आने की देर है..(वीरेंद्र)/2-309

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-283 आज के ज़माने में बड़े

आज के ज़माने में बड़े ही मेहरबां होते हैं लोग,
खुद देखें या न देखें, हमें आइना दिखा देते हैं लोग..(वीरेंद्र)/2-283

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-493 अन्दर से मै एक हूँ

अन्दर से मै एक हूँ पर बाहर से अनेक मेरे चेहरे हैं,
कुछ दीखते रात को हैं, और कुछ दीखते सवेरे हैं,
दुनियां भले न पहचाने इन चेहरों की असलियत,
आइना मगर रोज़ कहता है ये सबके सब मेरे हैं..(वीरेंद्र)/0-493

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-492 मिलता है रोज़ वो राहों में

मिलता है रोज़ वो राहों में, मगर अजनबी है अभी,
आँखों में इशारे हो जाते हैं, पर जुबां खुलनी है अभी,
राह-ऐ-इश्क में कुछ धुंध सी फैली हुई है, "वीरेंद्र",
मुहब्बत की शम्मा दिलों में पुरनूर जलनी है अभी..(वीरेंद्र)/0-492

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-650 काश वो हमारे दोस्त

काश वो हमारे दोस्त न होते,
हाल उनका हम ज़माने से तो पूछ लेते..(वीरेंद्र)/1-650

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-649 ज़िन्दगी का मतलब

ज़िन्दगी के मायने समझने में रोज़ इजाफा हो जाता है,
मगर हर दिन,  एक दिन कम ज़िन्दगी का हो जाता है..(वीरेंद्र)/1-649

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-648 मैंने बनाई थी एक रंगीन

मैंने बनाई थी एक रंगीन तस्वीर सपनों की,
मगर तेरे आंसुओं ने उस पर पानी फेर दिया..(वीरेंद्र)/1-648

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-647 काश रिश्ते भी पैरहन की

काश रिश्ते भी पैरहन की तराह हुआ करते,
लोग पहन लिया करते, उतार भी दिया करते..(वीरेंद्र)/1-647

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-646 इस दुनियां में हक तो

इस दुनियां में हक़ तो सभी को हुआ करते हैं,
हक़ को हासिल मगर सिर्फ दबंग ही किया करते हैं..(वीरेंद्र)/1-646

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 8 May 2015

2-282 सामजिक संवेदनाएं अभी

सामाजिक संवेदनाएं अभी तक मरी नहीं, जिंदा हैं,
ये और बात है कुछ दरिन्दे भी अभी मरे नहीं, ज़िंदा हैं...(वीरेंद्र)/2-282

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 7 May 2015

0-491 हिला दिया मेरे दिल की

हिला दिया मेरे दिल की जागीर को,
ढहा दिया मेरे ख़्वाबों की ताबीर को,
तुम भी किसी ज़लज़ले से कम नहीं,
गिरा दिया जज्बातों की तामीर को..(वीरेंद्र)/0-491

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-490 मुझसे वो लड़ाई तो करे,

मुझ से वो लड़ाई तो करे, मै उससे हारना चाहता हूँ,
वो बेवफाई तो करे, मै उससे गिला करना चाहता हूँ,
बंद करो अब ये दवा-दारू ये तीमारदारी ज़माने वालों,
जब तलक वो न आ जाय, मै बीमार रहना चाहता हूँ..(वीरेंद्र)/0-490

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-489 लुट चुके हैं जज़्बात

लुट चुके हैं जज़्बात और एहसासात कभी के,
अब मै ज़मीर का सरमाया बचाना चाहता हूँ,
मुझको फिरौती की रकम बता दे ऐ ज़माने,
अब मै ज़िन्दगी को रिहा कराना चाह्ता हूँ..(वीरेंद्र)/0-489

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-645 खौफ खाता हूँ जब मै

खौफ खाता हूँ जब मै किसी शय से, उससे दूर हो जाता हूँ,
मगर खौफ खाता हूँ जब खुदा से, उसके करीब हो जाता हूँ..(वीरेंद्र)/1-645

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-644 बारिश के कतरे की कीमत

बारिश के कतरे की कीमत तपते रेगिस्तान से पूछो,
मौजों से लबरेज़ समुंदर को इसका इल्म कहाँ होगा..(वीरेंद्र)/1-644

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-643 अल्लाह के वो भी करीब

अल्लाह के वो भी करीब है, जो गरीब है,
वो चंद रोज़ नहीं, अक्सर  ही रोज़े से रहता है..(वीरेंद्र)/1-643

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-642 इतना भी गरीब कभी

इतना भी गरीब कभी न बना देना मुझे मेरे खुदा,
के तेरी बख्शी बेशुमार दौलत से किसी का भला न कर सकूं..(वीरेंद्र)/1-642

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-641 बेइंतहा गम पोशीदा

बेइंतहा गम पोशीदा हुए जा रहे थे दिल में,
ज़िन्दगी में ये ज़लज़ला आना तो लाजिम था..(वीरेंद्र)/1-641

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-640 न तो मिटटी खराब थी

ना तो मिटटी खराब थी ना जड़ खराब थी,
प्यार का पौधा न बढ़ा, किस्मत खराब थी..(वीरेंद्र)/1-640

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-639 मिटटी पर इल्जाम लगाने

मिटटी पर इल्जाम लगाने से पहले ये समझ लेना,
जमने के लिए हर पोधे की जड़ मजबूत नहीं होती..(वीरेंद्र)/1-639

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-638 अब भला कौन खौफ

अब भला कौन खौफ खाता है तबाहियों से "वीरेंद्र",
अब तो ज़लज़लों का सिलसिला मुसलसल हो गया..(वीरेंद्र)/1-638

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-637 दौड़ने की रफ़्तार में

दौड़ने की रफ़्तार में ज़लज़ले ने इजाफा कर दिया,
वरना इंसान तो पहले ही हकीकत से भाग रहा था..(वीरेंद्र)/1-637

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-636 यूं तो आपने अपनी हंसी

यूं तो आपनी अपनी हंसी बेशक छुपाई है,
बंद होटों पे मगर वो फिर भी उभर आई है..(वीरेंद्र)/1-636

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-635 तजुर्बे ही तजुर्बे करते गए

तजुर्बे ही तजुर्बे करते गए तमाम उम्र हम,
खुद की ज़िन्दगी को हमसे संवारा न गया..(वीरेंद्र)/1-635

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-634 सुन रक्खा था टूट जाता

सुन रक्खा था टूट जाता है दिल तो फिर जुड़ता नहीं,
पर कुछ लोग हैं जो ज़रुरत पड़ने पर जोड़ भी लेते हैं..(वीरेंद्र)/1-634 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-633 जब जी चाहा रिश्तों को

जब जी चाहा रिश्तों को लोग तोड़-मरोड़ लेते हैं,
ज़रुरत के मुताबिक, कश्ती का रुख मोड़ लेते हैं...(वीरेंद्र)/1-633

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-632 थाम तो लूं खुशियों का

थाम तो लूं खुशियों का हाथ कस कर,
एक बार वो मेरे ख्वाबों से बाहर तो आएं..(वीरेंद्र)/1-632

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-631 आज हर जगह तेरा ही तेरा

आज हर जगह तेरा ही तेरा चेहरा देखा है,
किसने कह दिया हर शाख पे उल्लू बैठा है..(वीरेंद्र)/1-631

रचना : वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-630 इतना भी दर्द न दे खुदा

इतना भी दर्द न दे खुदा कि वक्त से पहले टूट जाऊं,
ज़िन्दगी इतनी भी लम्बी न दे कि उससे ऊब जाऊं...(वीरेंद्र)/1-630

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-629 तेरी जुदाई का भला

तेरी जुदाई का भला क्यों झूंटा शिकवा करेंगे हम,
तेरे साथ भी तन्हा थे, अब और क्या तन्हा होंगे हम..(वीरेंद्र)/1-629

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-628 क्यों रोक लिए उसने अश्क

क्यों रोक लिए अश्क मेरी मौत पर उसने,
आज तो मौका भी था और दस्तूर भी था..(वीरेंद्र)/1-628

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-305 खुद भी देहरूपी ईमारत

खुद भी देहरूपी ईमारत को दुश्मन के हमले से बचा,
खुद भी कर संरक्षित उसे, कामाग्नि के हमले से बचा,
धारण करके चल देह पर उपयुक्त कवच व् अस्त्र-शस्त्र, 
सामने से आने वाले हर वार को स्वयं के दम से बचा...(वीरेंद्र)/2-305

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-304 वक्त किसी के हाथ

वक्त किसी के हाथ में नहीं, फिरभी सबको मिल जाता है,
नसीब साथ में नहीं, फिर भी हर काम निकल जाता है.
तूने तो यहाँ सबको सब कुछ दिया है ऐ परवर दीगार,
ये इंसा की फितरत है तुझ पर से भरोसा हिल जाता है..(वीरेंद्र)/2-304 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-303 कभी छोड़ देता हूँ मै

कभी छोड़ देता हूँ मै वक्त को,
कभी वक्त मुझे छोड़ देता है,
साथ चल नहीं पाए हम दोनों,
खुदा भी रुख हमारे मोड़ देता है..(वीरेंद्र)/2-303

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-302 कितना सही हिसाब लगा

कितना सही सही हिसाब किताब लगा लेते हैं लोग,
कितनी जल्दी से नफ़े नुक्सान को भांप लेते हैं लोग,
बड़ी रफ़्तार से हरेक रोज़ तरक्की कर रही है दुनिया,
आगे क्या होगा  अभी से  अंदाजा लगा लेते हैं लोग..(वीरेंद्र)/2-302

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-301 घडियाली आंसू बहाने लगे

घडियाली आंसू बहाने लगे इंसान, मगरमच्छ तो अब बेकार हो गए,
आदमी बदलने लगे हैं रंग अब, गिरगिट तो बेचारे शर्मसार हो गए...(वीरेंद्र)/2-301

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-300 जैसे कि जंग के

जैसे कि जंग के मैदान में वीर योद्धा तलवार उठा लेते हैं,
वैसे ही, कलम को स्वयं-सिद्ध  साहित्यकार उठा लेते हैं,
शुरू कर  देते हैं उकेरना और उधेड़ना बाल की खाल को,
अंध-भक्त भी उनके खूब आसमान पर उन्हें उठा लेते हैं...(वीरेंद्र)/2-300

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-299 कौन कहता है पावर का

कौन कहता है पावर का नशा कुछ बड़ी पार्टियों को होता है,
ये नशा चीज़ ऐसी है जो "आम आदमी पार्टी "को भी होता है..(वीरेंद्र)/2-299 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-295 कम्युनल और सेक्यूलर

कम्यूनल और सेक्यूलर सबके सब एक हो गए,
कानों में तेल डाल, अपनी आँखें मूंद्कर सो गए,

पक्ष-विपक्ष से न रह गई अब कोई उम्मीद बाकी,
भारतमाता वन्देमातरम बस ये नारे ही हो गए,

और कितने टुकड़े सहेंगे इस प्यारी धरती के हम,
देखते देखते इसके इतने टुकड़े तो पहले ही हो गए,

सत्ता का सुख किस काम का रहेगा ऐ रहनुमाओं,
अलगाववादियों के मंसूबे अगर कामयाब हो गए..(वीरेंद्र)/2-295

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-281 कबतक सहेजोगे

कबतक सहेजोगे पुराने रिश्ते "यूज़ एन थ्रो" के इस ज़माने में,
मान क्यों नहीं लेते वक्त का तकाज़ा, क्यों रहते हो मुगालते में...(वीरेंद्र)/2-281

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-280 पुरवा आज क्यों बेमौसम

पुरवा आज क्यों बे-मौसम बही जा रही है,
कुछ तो बात है याद उसकी बड़ी आ रही है...(वीरेंद्र)/2-280

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

3-77 माना हम थे गुनेहगार

माना हम थे गुनेहगार तेरी कुदरत के ऐ खुदा,
तूने भी तो देके भूख प्यास हमारी फसलें छीन ली,

क्यों कर डाला हमें ज़मींदोज़ तेरे ज़लज़लों ने,
हमने कौन सा तेरा आसमां या ज़मीं छीन ली,

हम खुश थे खुदा, तेरे खुले आसमान के नीचे,
देके सर पर  छत तूने, अब ज़िन्दगी भी छीन ली,  (to be continue)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

3-78 दिल अगर नाज़ुक है तो


दिल अगर नाज़ुक है तो ये धड़कता क्यों है,

अगर है पत्थर, तो फिर ये तड़पता क्यों है,



टूटना है गर इसको, तो टूट क्यों नहीं जाता,

इश्क की आग में पैहम, ये सुलगता क्यों है,



जिस बेवफा ने रुलाया धार-धार दिल को,

उसीके तसव्वुर में इतना ये चहकता क्यों है,



कबके मुरझा गए उम्मीदों के फूल दिल में,

जाने क्यूँ आज भी दिल ये महकता क्यों है,



रिश्ते तोड़ इंसान तो सकूं से बैठ जाता है,

पर दिल बेचारा रह रह के सिसकता क्यों है।



••••वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"••••©3-78

(पैहम=लगातार)

3-79 बहुत देर कर दी तूने

बहुत देर कर दी तूने मुझे ये समझाने में,

मुहब्बतें भी होती हैं नापायदार इस ज़माने में।



मैं समझा था मुहब्बत को हासिल है सबात,

चाहिए मगर सरमाया इसको भी बचाने में।



वफ़ा की दुहाई देने वाले लगा देते हैं दांव पे,

अपनी मुहब्बत, मुस्तकबिल अपना बनाने में।



ले आती है अगर मुहब्बत दैरो हरम पर हमे,

वापस भी लौटा देती है इन्सां को मैखाने में।



सूरत जो तैरती है कभी आँखों में खुद की,

वक्त ऐसा भी आता है जब तैरती है पैमाने में।..(वीरेंद्र)/3-79



रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"



(नपायदर=अस्थायी:सबात=स्थायित्व:
मुस्तकबिल=भविष्य:दैरो हरम=इश्वर का स्थान)