Wednesday, 25 February 2015

1-623 कुछ काम नहीं होते मेरे


कुछ काम नहीं होते मेरे, सुबह से तेरी याद सताने लगती है,

तेरे ख्वाब देखने को, रात होने से पहले नींद आने लगती है।..(वीरेंद्र)/1-623


रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

Sunday, 22 February 2015

1-621तोड़ भी डालिए

तोड़ भी डालिए, सिर्फ प्यार ही तो है कोई कॉन्ट्रैक्ट नहीं,
हर इंसान में होती हैं कमियां, यहाँ हर कोई परफेक्ट नहीं...(वीरेंद्र)/1-621

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 21 February 2015

1-622 भूलने को कहता है तू भी


भूलने को कहता है तू भी, मैं भी,

पर भूल कहाँ पाता है तू भी, मैं भी..(वीरेंद्र)/1-622


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" 

1-620 कुछ वक्त और ठहर


कुछ वक्त और ठहर जाओ, याद करोगे इसी ज़माने को,

अब नहीं कद्र इसकी, तड़प जाओगे तुम इसे ही पाने को..(वीरेंद्र)/1-620



रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

1-619 एक तू ही न बन सका मेरा


एक तू ही न बन सका मेरा दोस्त आज तलक,

तेरे जुनूं में, तेरे कितने हमनाम मेरे दोस्त बन गए...(वीरेंद्र)/1-619



रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-484 हमसे ना कहो तुम

हम से ना कहो तुम मुस्कुराने को,

मुस्कराने में अब दर्द होने लगा है।

कितनी कीमतें चुकाएँ खुशियों की,

सब्र का खज़ाना ख़त्म होने लगा है।..(वीरेंद्र)/0484



रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

0-483 इतना भी न बढ़ने दे,


इतना भी न बढ़ने दे, बेरुखी को अपनी,

के मेरे साथ हादसा ये आखिरी हो जाय।



इस कदर न ले इम्तिहान मेरे सब्र का तू,

के किसी दिन तू खुद पे पशेमाँ हो जाय।..(वीरेंद्र)/0483




रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 17 February 2015

0-482 खाओ इतना जो तुम


खाओ इतना जो तुम पचा सको,

वादा करो इतना जो निभा सको,

हवाओं में उड़ो खूब, मगर इतना,

आना पड़े नीचे कभी तो आ सको.,,(वीरेंद्र)/0-482


रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

1-618 मैंने सोचा, तुम चल

मैंने सोचा, चल न पाओगे तुम एक कदम मेरे बिना,
पर तुमने तो एक नई दुनियां भी बसा ली मेरे बिना...(वीरेंद्र)/1-618


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"






Sunday, 15 February 2015

1-617 कहाँ से लाऊँ चेहरे पर

कहाँ से लाऊँ अपने चेहरे पर छोटी सी मुस्कान,
सारे शहर की मुस्कुराहटें तो आप चुराए बैठे हैं..(वीरेंद्र)/1-667

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 11 February 2015

1-616 सोचा कई बार, भूल ही

सोचा कई बार, भूल ही जाऊंगा तुझे अब की बार,
पर ये कमीनी यादें तुडवा देती हैं मेरा अहद हर बार..(वीरेंद्र)/1-616

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-615 तुझे अपना हाल सुनाने को

तुझे अपना हाल सुनाने को, मुझे पूरी ग़ज़ल चाहिए,
खैरियत तेरी जानने को, बस तेरा एक लफ्ज़ चाहिए...(वीरेंद्र)/1-615

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 10 February 2015

1-614 कुछ इस तरह पेश आया

कुछ इस तरह पेश आया वो कैफियत पर मेरी,
जैसे कभी ना गुजरेगी कोई घड़ी उस पर बुरी...(वीरेंद्र)/1-614

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"



Wednesday, 4 February 2015

1-611 मुझे ये सब ऐशो-आराम


मुझे ये सब ऐशो-आराम क्यों दे दिये ऐ खुदा,

मै खुशनसीब होता अगर मुझे तू जज़्बात न देता..(वीरेंद्र)/1-६११


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 3 February 2015

1-610 कौन कहता है वो दिल से

कौन कहता है वो दिल से मेरा नहीं था,
मेरे जनाज़े में सबसे आगे तो वही था. ..(वीरेंद्र)/1-610

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 2 February 2015

0-481इंसान हूँ गलती कर


इन्सां हूँ गलती कर जाता हूँ,

भावनाओं में मैं बह जाता हूँ,

लोग तो नशे में हैं कैसे कैसे,

और मैं यूं ही बहक जाता हूँ..(वीरेंद्र)/0-481


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

3-76 ज़िन्दगी के संवरने में


ज़िन्दगी के संवरने में बड़ी देर लगेगी,

तेरी यादों को भुलाने में थोड़ी देर लगेगी,



तेरी  नफरतों को तो मैंने भुला दिया,

मुहब्बतों को भुलाने में अभी देर लगेगी।



मंज़िल पर आकर अब लौटना तो तय है,

पर दिल को मनाने में अभी देर लगेगी।




सुपुर्दे-आतिश कर दिए हैं जज़्बात मैंने,

सब्र करो, ख़ाक होने में थोड़ी देर लगेगी। ..(वीरेंद्र)/3-76




रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-609 अपनी जिद पर कायम


अपनी जिद पर कायम रहो तुम बेशक,

मगर कहीं ऐसा न हो बेक़सूर निकलूँ मै ..(वीरेंद्र)/1-609 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-608 इतने दिन गुज़ार लिए


इतने दिन गुज़ार लिए तेरी यादों के सहारे,

अब कहाँ जाऊं मै, के तेरी यादों ने भी जवाब दे दिया..(वीरेंद्र)/1-608 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-292 न भविष्य हूँ मै,

न भविष्य हूँ मै, ना हूँ मै वर्तमान तुम्हारा,
जाने क्यूं फिर भी रहता है ध्यान तुम्हारा,
सभी हसरतें निकल चुकीं इस दिल से अब,
निकलता नहीं है तो बस अरमान तुम्हारा..(वीरेंद्र)/2-292

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-607 अपनी यादों को अब तो

अपनी यादों को अब तो समझा दो,
कि मै एक पुराना किस्सा हो चूका हूँ..(वीरेंद्र)/1-607

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-606 कुछ न रहा मुश्तरका

कुछ न रहा मुश्तरका तुम्हारे हमारे बीच तो ये भी बता दो,
इन ख्वाबों का क्या करूँ, जो मिल कर देखे थे हमने तुमने..(वीरेंद्र)/1-606

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-605 बरसों पुराना मेरा दर्द

बरसों पुराना मेरा दर्द जाता रहा,
उसने जो आज ज़रा सा मेरा हाल पूछा. ..(वीरेंद्र)/1-605

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-613 बिन तेरे ज़िन्दगी

बिन तेरे जिंदगी रह गई अधूरी,
सोचा तो था यूंही पूरी कर लेंगे..(वीरेंद्र)/1-613

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-604 यूं तो तेरे शहर का

यूं तो तेरे शहर का मौसम खिलखिलाता बहुत है,
मगर फिरभी जाने क्यों आज वहां सन्नाटा बहुत है. .(वीरेंद्र)/1-604

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 1 February 2015

3-75 एहसासों को जज्बातों को

एहसासों को जज्बातों को दबा लूँगा,
ख्वाबों को अपने ख़ाक में मिला लूँगा,

मै भी अब बन जाऊंगा मौका परस्त,
नए रिश्ते नए ख्वाब मै भी सजा लूँगा,

चरागे-मुहब्बत से रौशनी हो न सकी,
दिल में नफरत के दीप मै जला लूँगा,

गए साल बदल नहीं सका मै खुद को,
नए साल में खुद को पत्थर बना लूँगा..(वीरेंद्र)/3-75

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-603 'मुहब्बत' पर कुछ लिखने

'मुहब्बत' पर कुछ लिखने को मन बेताब हुआ है,
कुछ देर को ही सही, आज ज़रा नफरतें भुला दो...(वीरेंद्र)/1-603

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-601 उठा लिया था उसने मेरी

उठा लिया था उसने मेरी जानिब अपना कदम,
पीछे ले लिया मगर, उसे मुकर जाने की आदत जो है. .(वीरेंद्र)/1-601

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-600 मैंने न रक्खा नए मकाँ

मैंने न रक्खा नए मकाँ में कोई कोना रोने के वास्ते,
ये भी न सोचा कुछ तो मुकाम आयेंगे रोने के वास्ते...(वीरेंद्र)/1-600

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-599 मुहब्बत बड़ी महँगी चीज़

मुहब्बत बड़ी महँगी चीज़ है, "वीरेंद्र"
कंजूसों से कभी इसकी तमन्ना न करना. ..(वीरेंद्र)/1-599

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-598 मैंने क्या पाया ज़िन्दगी में

मैंने क्या पाया ज़िन्दगी में ये तो पता नहीं,
जानता हूँ इतना मगर, तुझे खोया बहुत है. ..(वीरेंद्र)/1-598

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-597 उसके किये हर सवाल

उसके किये हर सवाल का जवाब तो मै दे भी दूं,
खुद के सवालात का जवाब मुझसे दिया नहीं जाता..(वीरेंद्र)/1-597

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-596 अजीब सिफत है तेरी

अजीब सिफत है तेरी आँखों की,
क़त्ल भी करतीं हैं और मुहब्बत भी. .(वीरेंद्र)/1-596

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-595 अब भी दावा कर सकता हूँ

अब भी दावा कर सकता हूँ मै बस इतना,
दो चार दिन ही और तू रह पायेगी मेरे बिना. ..(वीरेंद्र)/1-595

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-594 ऐ मन किसी का आदी

ऐ मन किसी का आदी भी न बन इतना,
कि जीना भी मौहाल हो जाए उसके बिना. .(वीरेंद्र)/1-594

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-593 तुम जीत गईं, तुम रह

तुम जीत गई, तुम रह सकती हो मेरे बिना,
मै हार गया, मै नहीं रह सका तुम्हारे बिना. ..(वीरेंद्र)/1-593

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-480 शायद उसको जीने का

शायद उसको जीने का सलीका आता है,
शादी-शुदा हो कर भी वो मुस्कुराता है,
कुदरत के करिश्मे हैं ये, ऐ दुनियां वालों,
ऐसा शख्स वो लाखों में एक बनाता है..(वीरेंद्र)/0-480

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-479 बड़े बहुमूल्य थे वो रिश्ते

बड़े बहु-मूल्य थे वो रिश्ते,
सम्भाल कर रक्खे थे मैंने,
कीमत गिर गई अचानक,
अब नीलाम कर दिए मैंने. .(वीरेंद्र)/0-479

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-478 गर मैंने लाड़ न लड़ाया

गर मैंने लाड़ न लड़ाया होता तो,
ये ज़िन्दगी इतनी बेरहम न होती,
कज़ा हमदर्द बन जाती कभी की,
गर ज़िन्दगी मेरी हमदम न होती. .(वीरेंद्र)/0-478

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-477 ज़िन्दगी कहाँ ले जायगी

जिंदगी कहाँ लेकर जायगी हमें मालूम नहीं,
रोकेगी ये हमको जहाँ, रुक जायंगे हम वहीँ,
हम तो बस निकल पड़े हैं इसके पीछे -पीछे,
सुबह हो जायगी इसकी या फिर शाम कहीं...(वीरेंद्र)/0-477

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-476 जो नहीं हैं वो खुद को

जो नहीं हैं, वो खुदको क्यों पेश करते हैं लोग,
जो वो हैं, वो ही क्यों बने नहीं रहते हैं लोग,
फितरत अपनी बदल बदल कर  जाने क्यों ,
अपने संग दुनियां को धोखा देते रहते हैं लोग..(वीरेंद्र)/0-476

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-475 दुनियां से शिकवा

दुनियां से शिकवा अच्छा नहीं,
यूं ही कोई अपना बनता नहीं,
प्यार की पूँजी ज़रूरी होती है,
यूंही कोई किसीका होता नहीं. ..(वीरेंद्र)/0-475

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"



0-474 मै नहीं हूँ इस दुनियां के

मै नहीं हूँ इस दुनियां के काबिल,
ज़माने की तल्खियाँ निगल रहा हूँ,
वैसे तो मै पत्थर बन गया हूँ, पर 
जाने क्यों फिर भी पिंघल रहा हूँ...(वीरेंद्र)/0-474

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-473 मैंने शिकस्त देखी न थी,

मैंने शिकस्त देखी न थी,
जज़्बात का बस मारा हूँ,
मुझे हारा हुआ न समझ,
मै बस तुझसे ही हारा हूँ. .(वीरेंद्र)/0-473

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-472 तुम्हारा भी हो आने वाला

तुम्हारा भी हो आने वाला साल खुशियों से भरा,
हमें भी मिलता रहे तुम्हारा साथ प्यार से भरा, 
हम बहुत खुशनसीब हैं ऐ दोस्त तुम्हें पा कर,
तुम्हारा दामन तो है बेशुमार दुआओं से भरा.... (वीरेंद्र)/0-472

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-470 तू शिकस्ता हुआ, दहशतगर्द

तू शिकस्ता हुआ, दहशत-गर्द फतेहयाब हुआ,
मेरे खुदा, इन्साफ में तू कहाँ कामयाब हुआ,
कातिलों से बच्चों की जान बचाने के वास्ते,
तुझे कोई धारदार हथियार न दस्तेयाब हुआ...(वीरेंद्र)/0-470

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-469 बेगैरत बेखौफ कबतक

बेगैरत बेखौफ कबतक घूमता रहेगा खूंखार शैतान,
मेरे खुदा बता कबतक तू लेता ही रहेगा इम्तिहान,
अपने ही हाथों क्यों ख़त्म नहीं कर देता दुनियां को,
कत्ले-आम मचाने को क्यों छोड़ रखे हैं तूने हैवान...(वीरेंद्र)/0-469

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-471-नए साल आते गए

नए साल आते गए पुराने साल जाते गए,
तल्ख़ तजुर्बे ज़िन्दगी के हम  बढाते गए,
आरजुएं कब पूरी हुई हर किसी की यहाँ.
हम बेवजाह ही इतनी उम्मीदें जगाते गए.,(वीरेंद्र)/0-471

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"