Sunday, 27 December 2015

1-709 सिर्फ तेज़ हवाएं ही

सिर्फ तेज़ हवाएं ही सबब नहीं हुआ करतीं,
कमनसीबी भी बुझा देती है उमीदों के चराग..(वीरेंद्र)/1-709

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-526 दबे-दबे से, छिपे-छिपे से,

दबे-दबे से, छिपे-छिपे से, कुछ एहसास होते हैं,
ये बेनाम से रिश्ते हैं, जो बेइंतहा ख़ास होते हैं,
ख़ामोशी, तन्हाई, जुदाई, सब के सब हैं बेमानी,
दूर रहके भी ये रिश्ते दिलों के आस-पास होते हैं...(वीरेंद्र)/0-526

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-525 मुहब्बत में अब आप

मुहब्बत में अब आप तल्खियाँ घोलने लगे,
बिगड़ने लगे हो जब से अंग्रेजी बोलने लगे,
मैंने कहा था इतनी ज्यादा तरक्की न करो,
के इंसान को इंसान पैमानों पर तोलने लगे..(वीरेंद्र)/0525

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 25 December 2015

2-339 भारत-पाक बातचीत

भारत-पाक बातचीत अँधा सफ़र है जिसकी कोई मंजिल नहीं,
मुद्दे हैं इसमें ऐसे, जिनका निकल सकता अब कोई हल नहीं,
नासूर बन चुके ज़ख्म पर मरहम मलना वक्त ज़ाया करना है,
कर डालो ओपरेशन उसका आज ही, किसी सूरत में कल नहीं..(वीरेंद्र)/2-339

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-338 हमें गरीबों की करनी

हमें गरीबों की करनी है मदद,
इसीलिए हमने ठप्प की है संसद..(वीरेंद्र)/2-338

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-337 हमें क्या जेल में डालोगे


हमें क्या जेल में डालोगे तुम मोदी जी,

हमने तो पूर्ण विपक्ष को जेल में डाला है

छोटे मोटे कोर्टों की हमें धमकी मत दो,

हमने सर्वोच्च फैसलों को भी बदल डाला है,,वीरेंद्र/2-337



रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-336 मोती दमक उठें जब

मोती दमक उठें जब होठ खुलें,
बादल घिर आएं जब गेसू खुलें,
नीला आकाश भी फींका दिखे,
जब वो पहनके नीला रंग चले..(वीरेंद्र)/2-336

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-330 बड़े मज़े में हो आप

बड़े मज़े में हो आप मेरा दिल तोड़ कर,
काश दिल तोडना मेरा भी शगल होता..(वीरेंद्र)/2-330

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-323 कोई ऐसा सुंदर सहज

कोई ऐसा सुंदर सहज रस्ता मुझे बतलाए,
मै दाना डालूँ कौव्वे कांव कांव करते आएं,
गर दाना पानी न भी हो कभी हाथ में मेरे,
मै जहाँ चाहूँ एक आवाज़ पे मेरी चले आएं..(वीरेंद्र)/2-323

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-524 कल्पनाओं में खोकर

कल्पनाओं में खोकर जाने क्या-क्या हम लिखते रहे,
दूरियों को ही हम जाने क्यों नजदीकियां समझते रहे,
क्यों कहते हैं लोग, दुनियां सिमट गई छोटे दायरे में,
हम रहे वहीँ के वहीँ, मगर लोगों के दायरे बढ़ते गए..(वीरेंद्र)/0524

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-708 थाम ले तू हाथ मेरा

थाम ले तू हाथ मेरा, मेरी ज़िन्दगी को संवारने दे,
बना ले मुझे अपना, वरना अजनबी ही बना रहने दे..(वीरेंद्र)/1-708

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-707 तेरे बिन, तन्हाई तो झेल

तेरे बिन, तनहाई तो झेल भी लूं मै,
तेरी ख़ामोशी का कहर सहा जाता नहीं..(वीरेंद्र)/1-707

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-706 अच्छा हुआ तेरे मेरे

अच्छा हुआ तेरे मेरे बीच फासले हो गए,
कुछ उलझनें सुलझ गईं, कुछ फैसले हो गए..(वीरेंद्र)/1-706

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 9 December 2015

1-705 कोई नहीं पुरसाँ-हाल ऐ

कोई नहीं पुरसाँ-हाल ऐ दिल तेरा, तू भी तड़पना छोड़ दे,
बदल चुकी दुनियां अब, तू भी किसी के लिए धड़कना छोड़ दे..(वीरेंद्र)/1-705

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-704 कुछ यकीं सा नहीं हुआ

कुछ यकीं सा नहीं हुआ उसके इनकार का मुझे,
कुछ यूं मुस्कुराता रहा वो जवाब देने के बाद भी..(वीरेंद्र)/1-704

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 8 December 2015

3-87 बहते हुए अश्क छुप नहीं

बहते हुए अश्क छुप नहीं सकते पोंछ लेने के बाद भी,
अपने भुलाये जाते नहीं, बेवफा हो जाने के बाद भी,

उन्सियतें रह जाती हैं, नफरतें हो जाने के बाद भी,
कुछ नजदीकियां रह जाती हैं दूरियां हो जाने के बाद भी,

तूफां से उजड़ जाया करते हैं कुछ चमन इस तरह,
रौनक लौटके आती नहीं उनमे, बहार आने के बाद भी,

फिक्र कब होती है उस आशियाने के बर्बाद होने की,
जो टूटा हो तूफां से पहले भी, तूफां आने के बाद भी,

बेक़सूर है वो जो अंधेरों का पैहम आदी हो गया हो,
उसको उजाले नज़र नहीं आते, सहर हो जाने के बाद भी,

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-335 तुम्हारे सिराहने कुछ

तुम्हारे सिराहने कुछ अधूरे से ख्वाब रख छोड़े थे मैंने,

तन्हाई में जब दिल न लगे, उन्हें कुछ बुन लिया करना,


मेरा स्वेटर जो बुनना शुरू किया था तुमने उसे उधेड़ना मत,

जी लगाने को कभी उल्टे सीधे फंदे उसके गिन लिया करना,


मौसम आएंगे जायेंगे अपनी-अपनी यादें लेकर हरेक साल,

परेशां न होना तुम, अतीत की खिड़कियां बंद कर लिया करना,


चहचहाते आएंगे जब चिर परिचित परिंदे हमारे आँगन में,

मेरे न होने का सबब न बताना उनकी बात सुन लिया करना,


तुम्हारे सिराहने कुछ अधूरे से ख्वाब रख छोड़े थे मैंने,

तन्हाई में जब दिल न लगे उन्हें कुछ बुन लिया करना,



रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-322 क्यों मद्धम होती जा रही

क्यों मद्धम होती जा रही है ज़िन्दगी,
संचार की क्यों घटती जा रही है गति,
संवाद कहाँ विलुप्त, शब्द कहाँ खो गए,
'ऊर्जा' की कहाँ होती जा रही है क्षति..(वीरेंद्र)/2-322

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 1 December 2015

3-86 खिज़ाओं को ही बहारें

खिज़ाओं को ही बहारें मै मानने लगा हूँ,
तश्नागा हूँ पर तिशनगी मांगने लगा हूँ,
ग़मों का आदी हो गया हूँ मै इस कदर,
खुशियों से भी खौफ अब खाने  लगा हूँ,
ज़िन्दगी कुछ यूं गुजरी है अंधेरों में,
सहर में भी ज़ुल्मते-शाम मांगने लगा हूँ..(वीरेंद्र)/3-86

रचना; वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 30 November 2015

2-329 देश का सम्मान करता है

देश का सम्मान करता है, आम मुसलमान,
गद्दार बस वही है, जिसका आका पकिस्तान..(वीरेंद्र)/2-329

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-328 ता-ज़िन्दगी ऐश कर ली

ता-जिंदगी ऐश कर ली यहाँ, अब उतरा हूँ सियासत के बाज़ार में,
कौम-ओ-मुल्क छोड़ना चाहता हूँ, लगता नहीं जी उजड़े दयार में..(वीरेंद्र)/2-328

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-523 गीत लिखे न लिखे, मगर

गीत लिखे न लिखे, मगर कोई गीत गुनगुना तो सकता है,
पा सके, या न पा सके किसी को, पर उसे चाह तो सकता है,
मना के यहाँ हस्बे-आरजू कुछ नहीं मिलता हर किसी को,
मुकम्मल जहाँ का कोई ख्वाब तो दिल में सजा सकता है..(वीरेंद्र)/0-523

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-522 दिल पर बोझ बहुत हैं

दिल पर बोझ बहुत हैं मेरे,
दर्द-बयानी करके हल्का कर लेता हूँ,
गम ताकतवर बहुत हैं मेरे,
ये सोच ग़मों से समझौता कर लेता हूँ..(वीरेंद्र)/0522

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-521 शायरों को है मुशायरों में

शायरों को है मुशायरों में हमेशा सलाम,
इनकी महफिलों में नहीं लफंगों का काम,
उन्हें दाद देने की गलती भी क्या करनी,
जिन्हें अदबी तहज़ीब से नहीं कोई काम..(वीरेंद्र)/0521

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 27 November 2015

1-702 इंसान तो क्या परिंदे भी

इंसान तो क्या परिंदे भी वक्त पर बदल जाते हैं,
वो भी उड़ जाते हैं जब उनके पर निकल आते हैं..(वीरेंद्र)/1-702

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-701 वक्त थम जाने की तमन्ना

वक्त थम जाने की तमन्ना की थी मैंने उन हसीन दिनों में,
वक्त का सितम देखिये, वो थमा भी तो मेरे ग़मगीन दिनों में..(वीरेंद्र)/1-701

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-700 कभी तो माफ़ कर देने

कभी तो माफ़ कर देने का सबाब ले लिया जाय,
कहीं खुद पर भी खतावार होने का वक्त न आ जाय..(वीरेंद्र)/1-700

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-699 वक्त थम भी जाय तो

वक्त थम भी जाय तो उसका क्या करूँ,
मेरे पास भी अब वक्त बचा कहाँ  है..(वीरेंद्र)/1-699

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-698 तू राज़ नहीं मेरे लिए


तू राज़ नहीं मेरे लिए, मैंने तुझे करीब से देख लिया,

जब जी चाहे आजा, अब तो तूने भी रस्ता देख लिया..(वीरेंद्र)/1-698


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-697 न बदलते तुम तो

न बदलते तुम तो खूबसूरत भरम रह जाता,
मेरा यह सरूर कुछ देर तो कायम रह जाता..(वीरेंद्र)/1-697

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-696 बहुत से लोग बहुत से

बहुत से लोग बहुत से हुनर जानते हैं,
ज़िन्दगी जीने का हुनर मगर कम जानते हैं..(वीरेंद्र)/1-696

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-695 डरता नहीं वक्त से

डरता नहीं वक्त से, तकाज़ा-ऐ-वक्त को पहचान लेता हूँ,
वक्त की हर सख्ती को, मै वक्त की नजाकत मान लेता हूँ..(वीरेंद्र)/1-695

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-694 एक आध दर्द तो हमेशा

एक आध दर्द तो हमेशा पास रखा जाय,
वो इंसान ही क्या जिससे दर्द न सहा जाय..(वीरेंद्र)/1-694

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-693 मौसम तो बदले उसके

मौसम तो बदले उसके जाने के बाद,
पर वो सुबह न हुई, वो शाम न हुई..(वीरेंद्र)/1-693

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-692 खुशनसीब हैं वो

खुशनसीब है वो जिसका दिल पत्थर होता है,
जज़्बात से दूर और ग़मों से बेखबर होता है ..(वीरेंद्र)/1-692

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-691 ले अब मैंने डरना ही

ले अब मैंने डरना ही छोड़ दिया  मौत  से,
बिगाड़ ले जो बिगाड़ना है तुझे ऐ ज़िन्दगी..(वीरेंद्र)/1-691

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 23 September 2015

2-321 मेरी राष्ट्रभाषा हिंदी

मेरी राष्ट्रभाषा हिंदी की बस उसी दिन जीत है,
जब कोई भारतीय न कहेगा "मेरी हिंदी वीक है"..(वीरेंद्र)/2-321 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-690 शिकवे-शिकायत-गिले,

शिकवे-शिकायत-गिले, मुझे मंज़ूर नहीं तेरे,
तुझे मैंने दर्द कैसे दे दिये, जब दिल ही नहीं तेरे..(वीरेंद्र)/1-690

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-689 जिस पर भी बड़ा एतबार

जिस पर भी बड़ा ऐतबार किया,
उसी ने हद-दर्जे शर्मसार किया..(वीरेंद्र)/1-689

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-520 छोड़ दो, मगर मुझे

छोड़ दो, मगर मुझे भुला न देना,
तोड़ दो, पर मुझे बिखरा न देना,
मत जलाना मेरी राहों में चराग,
पर दिल का दीया, बुझा न देना..(वीरेंद्र)/0-520

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 14 September 2015

1-688 अब और बंदिशें मत लगा

अब और बंदिशें मत लगा, रंजिशें हो जाएंगी,
बा-मुश्किल हुई मुहब्बत, अदावतें हो जाएंगी..(वीरेंद्र)/1-688

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-334 विदेशों में अंग्रेजी तो

विदेशों में अंग्रेजी तो स्वदेश में है हिंदी,
अजनबियों से सम्पर्क करवाती है हिंदी,

बिना हिंदी काम न चलता किसी का,
कहीं न कहीं तो याद आती ही है हिंदी,

कई धर्म भाषाभाषी भारतीय हैं विश्व में,
परदेस में भी सभी को मिलवाती है हिंदी,

विश्व में टूटीफूटी अंग्रेजी से काम चले,
देश के हर कोने में काम बनाती है हिंदी,

बिना राष्ट्रभाषा के गूंगा कहलाता है राष्ट्र,
मात्रभाषा की सगी बहन राष्ट्रभाषा है हिंदी..(वीरेंद्र)/2-334

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 12 September 2015

2-325 कोई बात भले ही बहुत

कोई बात भले ही बहुत बड़ी होती है,
मुंह पे लाने से मगर छोटी हो जाती है,

कभी-कभी बात बहुत छोटी होती है,
तूल देने पे मगर वो बड़ी हो जाती है,

बड़े मुंह की छोटी बात भी बड़ी होती है,
पर छोटे मुंह की बड़ी बात भी छोटी हो जाती है,

अनकही ही अच्छी जो दिल में दबी होती है,
जुबां पे ला दी अगर, तो चुभन सी हो जाती है,

एक बार की कही बात, ज़रा वजनी होती है,
बार-बार कही वोही बात, हलकी हो जाती है,

याद रहती है वो बात, जो दमदार होती है,
वर्ना तो अक्सर बात, आई-गई हो जाती है.

बिगड़ी बात भी बने, गर किस्मत सीधी होती है,
नहीं तो बनी-बनाई भी, बिगड़ी सी हो जाती है......(वीरेंद्र)/2-325

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"


Wednesday, 9 September 2015

0-519 ज़रा समझा कर बता


ज़रा समझा कर बता दिल की बात,
इतनी लच्छेदार न बना कि पल्ले न पड़े,
सीधी सी बात को इतना भी न उलझा,
एक सिरा दूसरे से मिलाना मुश्किल पड़े..(वीरेंद्र)/0-519

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"






2-327 मौजूदा से लोग बस यूंही

मौजूदा से लोग बस यूंही किलसते रहेंगे,
जो बीत गया उसके लिए व्यर्थ बिलखते रहेंगे..(वीरेंद्र)/2-327

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"








2-326 अब तेरे पास आने का

अब तेरे पास आने का मौसम आया है,
इसीलिए शायद चाँद भी निकल आया है..(वीरेंद्र)/2-326

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-687 तोड़ो, मरोड़ो, पटको,


तोड़ो, मरोड़ो, पटको, बेरहमी से मेरे दिल को,
तुम्हे क्या है पड़ी, खुद का दिल तो पत्थर का ठहरा..(वीरेंद्र)/1-687

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"






1-685 तेरे दर्द से बा-खबर


तेरे दर्द से बा-खबर हो गया हूँ मै इतना,
के मुझे अपने दर्द की भी खबर नहीं होती..(वीरेंद्र)/1-685

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"




1-684 मेरे जज्बातों मेरे एहसासों

मेरे जज्बातों मेरे एहसासों, मै मुजरिम हूँ तुम्हारा,
एक बेवफा के लिए, मैंने तुम्हे बे-इंतहा रुलाया है..(वीरेंद्र)/1-684

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"




1-683 अपने दिल में छुपा लिए थे

अपने दिल में छुपा लिए थे जो दर्द मैंने,
कम्बख्त वो आँखों के रास्ते बेपर्दा हो गए..(वीरेंद्र)/1-683

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"





1-682 यूंही जलते रहोगे मुझसे

यूंही जलते रहोगे मुझसे, तो एक दिन राख हो जाओगे,
रहा सहा वजूद बचा लो, वर्ना खुदा को क्या जवाब दे पाओगे,.(वीरेंद्र)/1-682

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"





1-680 मुहब्बत का नशा मुझे

मुहब्बत का नशा मुझे कुछ ज्यादा हो गया,
मालूम ही नहीं चला वो कब बेवफा हो गया..(वीरेंद्र)/1-680

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-681 सच्चे लोग बुरे लगते

सच्चे लोग बुरे लगते हैं, तल्ख़ हकीकत जो बता देते हैं,
चाटुकार हरदिल अज़ीज़ हैं, झूंटे ख्वाब जो दीखा देते हैं..(वीरेंद्र)/1-681

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"






Sunday, 23 August 2015

3-85 बुझने को आँधियों में

बुझने को आँधियों में, चराग हम जला देते हैं,
और कसूर तेज़ हवाओं का, हम बता देते है,

अपनी औलादों को तरबियत हम  देते नहीं,
तोहमतें अपनी किस्मत पर हम लगा देते हैं,

मालूम हैं, खोटे हैं हमारे ही अपने सिक्के,
फिर भी बाज़ार में उन्हें हम चला देते हैं,

जला देते थे इंसान को, बाद मरने के उसके,
पर बहु बेटियों को जिंदा ही अब जला देते हैं,

उस हुकूमत से क्या कीजे उमीदे-इंसाफ़ 'वीरेंद्र'
जिसके मुंसिफ गुनाह को जायज़ ठहरा देते हैं..(वीरेंद्र)/3-85

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"
















औलादों को तरबियत हम देते नहीं,
तोहमतें अपनी किस्मत पे लगा देते है।
जला देते हैं चराग आँधियों में हम,
और कसूर हवाओं का बता देते हैं।
मालूम है हमारे सिक्के हैं खोटे,
फिरभी बाजार में उन्हें हम चला देते हैं।
उस हुकूमत से क्या उमीदे-इन्साफ,
मुंसिफ जिसके गुनाह जायज़ ठहरा देते हैं।
जला देते थे इंसा को, बाद मरने के,
पर बहु बेटियों को अब ज़िंदा जला देते हैं।
••• वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"•••©

Friday, 21 August 2015

1-679 मेरे ख्यालात में उतरने

मेरे ख्यालात में उतरने के वास्ते जज्बाती नज़र चाहिए,
माफ़ी चाहूँगा उनसे, जीने मेरी शायरी में 'बहर' चाहिए..(वीरेंद्र)/1-679

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-516 हमसफ़र साथ चल,

हमसफ़र साथ चल, तू न राहे-मंजिल की परवाह कर,
सफ़र में कोई मोड़ न आये, तू बस इसी की दुआ कर,
आ भी जाए कभी कोई दो-राहा या चौ-राहा सफ़र में,
डगमगा न जाएं कहीं कदम, बस इतनी इल्तिजा कर..(वीरेंद्र)/0-516

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-517 तू एक बहाना ही सही,

 तू एक बहाना ही सही, मगर  
मेरे जीने के लिए काफी वो है,
ज़िन्दगी मेरी तनहा ही सही,
पर कहने को, ज़िन्दगी तो है..(वीरेंद्र)/0-517

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-518 जुस्तजू में उसकी दूर


जुस्तजू में उसकी दूर मै निकल गया,

रुसवाइयों का घूँट भी मै निगल गया,

नाम लेकर जिसका मै जीने लगा था,

अबतो उसका वो नाम भी बदल गया..(वीरेंद्र)/0-518


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 16 August 2015

0-515 कभी वादा, कभी भरोसा,

कभी वादा, कभी भरोसा, कभी दिल,
तुमको तो बस तोड़ देने की आदत है,
कभी आरज़ू, कभी उम्मीद, कभी जिद,
हमको भी कभी न छोड़ने की आदत है..(वीरेंद्र)/0-515

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-514 सच है किसी को मुकम्मल

सच है किसी को मुकम्मल जहाँ मिला नहीं,
मै भी इस दुनियां में ग़मज़दा अकेला नहीं,
झाँका जो मजलूमों की ज़िन्दगी में तो देखा,
भूख प्यास का दर्द खुदा से मुझे मिला नहीं..(वीरेंद्र)/0-514

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-513 क्यों घूम फिर कर लौट

क्यों घूमफिर के लौट आता है दर्द मेरे पास,
क्या इस दर्द का भी  'कोई मज़हब नहीं होता',
क्यों लपेट लेता हैं ये मुझे अपने शिकंजे में,
क्या इसे भी खुदा से कोई मतलब नहीं होता..(वीरेंद्र)/0-513

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-678 हर ग़म के बाद

हर ग़म के बाद आएगी कोई ख़ुशी, हम ये मान लेते हैं,
हर मर्तबा जाने क्यों हम नई खुशफहमी पाल लेते हैं..(वीरेंद्र)/1-678

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-677 ज़िन्दगी बाखुशी यूं तन्हा

ज़िन्दगी बाखुशी यूं तन्हा हम बसर करते रहे,
हमसाये को ही हमराह मंज़ूर हम करते रहे..(वीरेंद्र)/1-677

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-675 गनीमत है दिल के आईने

ग़नीमत है दिलों के टूटने पर आवाज़ नहीं होती,
वरना टुकड़ों के साथ रुसवाइयों की भरमार बड़ी होती..(वीरेंद्र)/1-675

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-674 ग़मों का अजायबघर हूँ मै

ग़मों का अजायबघर हूँ मै, मेरे दर्द हैं किस्म किस्म के,
दिल के किसी कोने में दर्दे-नफरत है, तो दर्दे-मुहब्ब्बत भी..(वीरेंद्र)/1-674

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-673 ज़ख्मों की परत दर परत

ज़ख्मों की परत दर परत मेरे शेरों में कुछ ऐसी खुली,
कई चेहरों पर ख़ुशी, तो कई चेहरों पर मायूसी मिली ..(वीरेंद्र)/1-673

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-672 मुझे इल्हाम हुआ था

मुझे इल्हाम हुआ था वो बेवफा ज़रूर आयेगा,
उसके लिए मैंने चंद साँसे बचा कर रक्खीं थीं..(वीरेंद्र)/1-672

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-324 यह कैसा मौज-मस्त


यह कैसा मौज-मस्त परिवर्तन हो रहा है,

धर्मनिरपेक्ष भी अब "धार्मिक" हो रहा है,



ये कैसे जल्वे बिखेर दिये "माँ" "बापू" ने,

हरेक "घर वापसी" को आतुर हो रहा है,



आस्थाएं तीव्र हो रही हैं सब के मन में,

हर कामुक प्रसंग में आकर्षित हो रहा है,



नीरसता का अब काम नहीं धर्म क्षेत्र में,

धर्म संग कर्म का भी प्रचलन हो रहा है.



आओ नास्तिकों तुम आस्तिक हो जाओ,

आनंद-धर्म का वृहद आयोजन हो रहा है।



•••वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"•••2-244

2-318 कुछ लोग हमारी माँ

कुछ लोग हमारी "माँ "हो गए,
और कुछ पूज्य "बापू" हो गए,
सगे माँ-बाप तो वृद्धाश्रम में हैं,
ढोंगी गैर हमारे माँ-बापू हो गए,

माता-पिता को तो कभी पूछा नहीं,
गैरों के चरणों में नित्य लोट रहे हैं,
मात्र-पितृ भक्ति कभी समझी नहीं,
ढोंगियों की भक्ति में लीन हो रहे हैं.

ईश्वर है कि नहीं, ये भी ज्ञात नहीं,
मानवता की जानते कोई बात नहीं,
मूर्ख अंध-भक्त बन कर देखा-देखी, 
बस पाखंडियों को ही पूज रहे हैं..(वीरेंद्र)/2-318

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-316 उमड़ घुमड़ कर ह्रदय

उमड़ घुमड़ कर ह्रदय में जब भावनाएं छा जाती हैं,
कभी प्रेम छलका देती हैं, कभी अश्रू बरसा जाती हैं..(वीरेंद्र)/2-316

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-315 पांवों में जंजीर बंधे

पांवों में जंजीर बंधे, रेस से बाहर, कितने ही घोड़े यहाँ घूम रहे हैं,
वर्तमान व्यवस्था में खच्चर गधे नित नयी बुलंदियां चूम रहे हैं..(वीरेंद्र)/2-315

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-314 शत्रुओं से घनिष्टता

शत्रुओं से घनिष्टता, अपनों से शत्रुता,
कष्ट है कोई तो छोड़ दे छल कपटता..(वीरेंद्र)/2-314

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 5 August 2015

0-512 चुपके से निकल गया मेरी

चुपके से निकल गया मेरी ज़िन्दगी से वो,
बड़ी जोर-शोर से जो ज़िन्दगी में आया था.
ऊंची-ऊंची वो लहरें जाने कहाँ खो गयीं,
ज्यूं ही पास समुन्दर का किनारा आया था..(वीरेंद्र)/0-512

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 2 August 2015

3-84 खिजाएँ ही बस दोस्ती

 ख़िज़ाएँ ही बस दोस्ती का हाथ बढ़ाती हैं,

तुम भी तो कभी हाथ बढ़ाया करो, बहारों।


पतझड़ रहा मुझसे बा-वफ़ा अभी तक,

कभी तुमभी तो वफ़ा निभाया करो, बहारों


मेरे गुलशन पे नज़र रक्खी है ख़िज़ाओं ने,

कभी तुमभी तो देखने आया करो, बहारों।


शूल ही शूल बिखरेे हैं हर तरफ आँगन में,

कभी तुम आके फूल बरसाया करो, बहारों।


आ-आ कर, रुला-रुला कर चली जाती हो,

कभी तो मुस्कुरा भी लेने दिया करो, बहारों।/3-84


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी ©

Friday, 31 July 2015

2-320 रहम की दरख्वास्त

रहम की दरख्वास्त करने वाला सो गया,
जिससे की थी दरख्वास्त वो भी सो गया,
सब कुछ होने लगा है ब-दस्तूर आज से,
नुक्सान हुए, पर मसलों का हल हो गया..(वीरेंद्र)/2-320

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-319 नदियाँ न पिएँ अपना जल

नदियाँ न पिएँ अपना जल,
वृक्ष भी न खाएं अपना फल,
इंसान मगर उनसे सब लेकर,
उन्हीं को नष्ट करता हर पल..(वीरेंद्र)/2-319

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-671 दहशतगर्दों तुम अपनी जान से

दहशतगर्दों तुम अपनी जान से चले जाओगे,
पर अपने पीछे कई चेहरे बेनकाब कर जाओगे..(वीरेंद्र)/1-671

रचना : वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-511 मुझे पढ़ा करते हैं


मुझे पढ़ा करतेे हैं कुछ ख़ास लोग ही,

मैं दीवार पर लिखा इश्तहार नहीं हूँ।

उड़ादूं अपनी शायरी के पन्ने बाजारों में,

मैं उन शायरों में कतई शुमार नहीं हूँ।..(वीरेंद्र)/0-511



रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-510 इन्सा की शख्सियतें हैं


इन्सां की शख्सियतें हैं जुदा जुदा,

उनके आमाल भी हैं जुदा जुदा,

मगर अंजामे-आखरी में फर्क नहीं,

बस मौत के अंदाज़ हैं जुदा जुदा।.(वीरेंद्र)/0510




रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"


Tuesday, 28 July 2015

1-670 मुहब्बत का ये कैसा अजीब

मुहब्बत का ये कैसा अजीब सिला है,
ख़ुशी एक बार दर्द हज़ार बार मिला है..(वीरेंद्र)/1-670

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-669 खोटी थी हमारी किस्मत

खोटी थी हमारी किस्मत, फिर भी उसे हम आजमाते रहे,
बेवफा हो गया था वो मगर आजमाए को हम आजमाते रहे..(वीरेंद्र)/1-669

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-313 कुछ नसीहतें अपने लिए

कुछ नसीहतें अपने लिए भी तो संभाल कर रख ले "वीरेंद्र"
निहायत ज़रूरी हैं ये तेरे वास्ते भी, इन्हें यूं न लुटाया कर लोगों में..(वीरेंद्र)/2-312 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-312 बहुत लोग रिश्तों की

बहुत लोग रिश्तों की दूकान खोल के बैठे हैं,
जैसा भी ग्राहक को चाहिए वैसा बेच देते हैं...(वीरेंद्र)/2-312 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-311 इतने भी 'व्यवहारिक' न बनो

इतने भी 'व्यवहारिक' न बनो कि संपूर्ण जीवन अव्यवहारिक हो जाय,
मान्यताएं रूढ़ियाँ तब तोड़ो जब समाज का उससे कोई हित हो जाय..(वीरेंद्र)/2-311

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-310 खिचड़ी पक गई समझो

खिचड़ी पक गई समझो जब चावल के संग दाल गलती है,
बुखार-ऐ-इश्क चढ़ गया समझो जब दिल से ग़ज़ल निकलती है..(वीरेंद्र)/2-310 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-509 कुछ लोग चेहरे मोहरे से



कुछ लोग चेहरे-मोहरे से भोले लगते हैं, पर वो होते नहीं,

जो कड़वे कसैले दीखाई देते हैं, सच में वैसे वो होते नहीं,

भरपूर मुहब्बतें भी, बेइंतहा नफ़रतें भी हैं इसी जहाँ में,

सच्चे मगर जो लोग हैं, बीज यहाँ नफरतों के वो बोते नहीं।(वीरेंद्र)/0-509

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-508 अपनों से डरता हूँ

अपनों से डरता हूँ,
बड़े गैर होते हैं वो,
दिल तोड़ते हैं वही,
दिल में रहते हैं जो..(वीरेंद्र)/0-508 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-507 तिल्ली से घरों के


तिल्ली से घरों के चिराग रौशन हो जाते हैं,

तिल्ली से शहर के शहर ख़ाक हो जाते हैं,

तिल्ली घरों के चूल्हे जलाती है, बुझाती भी है,

तिल्ली के इस्तमाल में हम अंधे हो जाते हैं..(वीरेंद्र)/0-507

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 17 July 2015

1-676 मेरी ग़ज़ल मेरे शेर

मेरी ग़ज़ल मेरे शेर दुनिया ने पढ़े,
लिक्खे थे मैंने जिसके लिए बस उसी ने न पढ़े .(वीरेंद्र)/1-676

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-668 मै खुदा को समझा

मै खुदा को समझा, उसकी कायनात को समझा,
बस एक शख्स को न मै समझा, न मुझे वो समझा..(वीरेंद्र)/1-668

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-667 सभी बदस्तूर है वो गयी

सभी बदस्तूर है, वो गयी मेरी ज़िन्दगी से जबसे,
मगर महक कोई न रह गयी इन हवाओं में तबसे..(वीरेंद्र)/1-667

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-666 किसी के लिए बेचैनी

किसी के लिए बेचैनी इश्क की अलामत हो, ज़रूरी नहीं,
इश्क बिना भी कभी कभी दिल को दिल से राह होती है..(वीरेंद्र)/1-666

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-665 ज़िन्दगी मिली है इंसा को

ज़िन्दगी मिली है इंसा को तकलीफे उठाने के लिए,
कोई ख़ुशी आती भी है इसमें तो लौट जाने के लिए..(वीरेंद्र)/1-665

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-664 ये सोचकर कौन डूबता

ये सोचकर कौन डूबता है दरिया में,
कि डूबते को तिनके का सहारा बहुत है..(वीरेंद्र)/1-664

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-663 हमने भी अब बनावट का

हमने भी अब बनावट का लबादा ओढ़ लिया,
सच्चे दिल से मिलने पर कतराने लगे थे लोग..(वीरेंद्र)/1-663

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 16 July 2015

0-506 अब मै पत्थरों में शुमार

अब मै भी पत्थरों में शुमार हूँ,
यहाँ जज़्बात का कोई काम नहीं,
रंजो-गम आहों आंसुओं से दूर हूँ,
यहाँ एहसासात का नाम निशान नहीं..(वीरेंद्र)/0-506

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-505 खून खराबे लूटपाट

खूनखराबे लूटपाट की बुनियाद पर तामीर,
महलों से निकले हैं ये रहनुमा मुफलिसों के,
सभी गरीब आओ, उनके हाथ मज़बूत करें,
ताकि वे हासिल कर सकें हकूक मजलूमों के..(वीरेंद्र)/0-505

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-504 लूटने का जिसको मौका

लूटने का जिसको मौका है मिल रहा वो भ्रष्टाचारी है,
अवसर जिसको नहीं मिला, वो ही एक सदाचारी है,
सुनियोजित ढंग से सभी लूट रहे बेचारी जनता को,
आज इस दल की बारी, तो कल उस दल की बारी है..(वीरेंद्र)/0504

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-503 अबकी बार रुक जाने को

अबकी बार रुक जाने को आई है,
या फिर से लौट जाने को आई है,
मेरी जिंदगी की वो पुरानी ख़ुशी,
आज फिर थोड़ी सी लौट आई है..(वीरेंद्र)/0-503

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-502 ऐसा नहीं सिर्फ कागज़

 ऐसा नहीं सिर्फ कागज़ कलम इश्क ही चाहिए,
शेरो शायरी करने को थोडा सा हुनर भी चाहिए,
इश्क तो दे देता है हसीन जज़्बात-ओ-ख्यालात,
ढालने को उन्हें ग़ज़ल में एक शायर भी चाहिए..(वीरेंद्र)/0-502

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-501 न जाने क्यों आज भी

न जाने क्यों आज भी होता नहीं यकीं,
कि तुम इतने बेवफा हो गए हो मुझसे,
मै समझा देता हूँ अपने नादां दिल को,
तुम बेवफा नहीं बस रूठ गए हो मुझसे...(वीरेंद्र)/0501

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-500 झुलसाती गर्मी में अगर

झुलसाती गर्मी में अगर थोड़ी बरसात हो,
दर्द भरी इस तन्हाई में अगर तेरा साथ हो,
जुबां से काम लेने की फिर क्या दरकार,
जब आँखों ही आँखों में दिल की बात हो..(वीरेंद्र)/0-500

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-499 वक्त निकलता है तो

वक्त निकलता है तो निकल जाए,
ये दिलकश मंज़र हम निकलने नहीं देंगे,
नहीं छोड़ेंगे दामन इन हसीन पलों का,
इन रिश्तों की गर्माहट कम होने नहीं देंगे..(वीरेंद्र)/0-499

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 15 July 2015

2-210 नींद से जगा सा

नींद से जगा सा,
राह में लुटा सा,
खडा हूँ दोराहे पर,
मै वक्त से ठगा सा..(वीरेंद्र)/2-210 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-308 यूं तो कमियाँ हर इंसान

यूं तो कमियां हर इंसान में बहुत सारी होती हैं,
मगर कुछ कमियां बाकी सब पर भारी होती हैं,
बस एक हम ही हैं मुकम्मल दौर-ऐ-ज़िन्दगी में,
यूं सोच लेना भी गलतफहमियां हमारी होती हैं..(वीरेंद्र)/2-308

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-317 सूरज को समेट के रख

सूरज को समेट के रख दूं अपने आँगन में,

चाँद की रौशनी को भर लूं अपने दामन में,


मै प्रकृती का शत्रु स्वार्थी इंसान जो ठहरा,

प्रकृति को जकड लूं मैं अपने बंधन में।


उजाड़ डालूँ जंगल, ध्वस्त करूँ पहाड़ों को,

नष्ट कर दूं प्रकृति को मैं अपने आनंद में।


गर्मी सर्दी वर्षा सभी का संतुलन बिगाड़ दूं,

पर्यावरण नष्ट करके सूखा ला दूं सावन में!


कुदरत दिखाए जब तांडव रौद्ररूप यहाँ वहां,

तब सर अपना पकड़के बैठूं मैं रूदन क्रंदन में।..(वीरेंद्र)/2-317


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 17 June 2015

3-83 ये बारिशें भी इंसान

ये बारिशें भी इंसान इंसान में फर्क कर रहीं हैं,
कहीं बत्तियां रौशन, तो कहीं गुल कर रहीं हैं.

कहीं ख़ुशी, कहीं ग़म हैं बारिशों की आमद से,
कहीं फसलें हरी तो कहीं पैदावारें बह रहीं हैं,

जशन मन रहे हैं कहीं कहीं, ऐ तेज़ बारिशों,
पर कच्चे घरों की गीली दीवारें हिल रहीं हैं.

मेरे लिए बारिशों का बस इतना सा है मतलब,
भरी हुईं थीं जो आँखें कब से, अब बह रहीं हैं,

इल्म है, ये कागज़ की कश्ती मेरी गल जायगी,
अभी तो बहती देख इसे तसल्लियाँ मिल रहीं हैं,

ख्वाब, ख्वाब ही रहते हैं, मुझे पता है "वीरेंद्र",
पर यूं ही दिल में उम्मीदें, फिर भी पल रहीं हैं...(वीरेंद्र)/3-83

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 9 June 2015

2-297 "विश्शु भैया"

 विश्शू भैय्या.......

हमारी माँ के सबसे सुंदर बेटे थे तुम, "विश्शू भैय्या",
भले ही हो गए आज तुम हमारी आँखों से ओझल,
पर दिलों में बने रहोगे तुम वैसे ही, हर क्षण, हर पल,
तुम थे अदभुत जीवत के, अन्य सभी से हटके,
जीवन भर ही बांटते रहे तुम हमें खुशियाँ  और प्रीत,
कैसे  भूलें  कृष्णाजी, विवेक, विकास और  विनीत,
जो हसीन ख्वाब देखे थे तुमने अपनी "टायब्रोस" में,
तुम छोड़ कर क्यों चल दिए ऐसे ही बस बीच में,
अभी तो बहुत कुछ तरक्की बाकी थी तुम्हे देखने को,
"वेलनेस" का तुम्हारा सपना था बस पूरा होने को,

तुम जहां हो, वहीँ से देखोगे, वो सब होता हुआ,
जो तुमने सोचा था, चाहा था, परिवार के लिए,
पूर्ण होंगे वो हर काम ,तुमने रखी नींव जिनकी,
पूर्ण करेंगे तुम्हारी पत्नी,पुत्र,बाहें और पोता-पोती.......................................(वीरेंद्र)

                                तुम्हारा छोटा भाई: वीरेंद्र  ("लाला")  १७.२.२०१२.

1-659 जियो ज़िन्दगी को इतना

जियो ज़िन्दगी को इतना कि और मांगनी पड़े,
इतना भी न सिमटो हद में की वो लांघनी पड़े...(वीरेंद्र)/1-659

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"