Friday, 12 December 2014

3-74 हकीकतों को अभी मंज़ूर

हकीकतों को अभी मंज़ूर कर लीजिये,

ख्वाब पूरे होते होते तो उमर हो जायगी,


दुआएं मज़लूम की हासिल कर लीजिये,

खुदा की इनायत भी आप पर हो जायगी,


कुछ देर तो अंधेरों से मुकाबला कर लीजिये,

यकीनन कुछ ही देर में सहर हो जायगी,


नफरतों की चिंगारी को अभी बुझा लीजिये,

बाद में तो ये जलता हुआ शहर हो जायगी,


नेकी की इब्तिदा तो करके देख लीजिये,

इंशाअल्लाह फैल कर ये लहर हो जायगी।..(वीरेंद्र)/3-74



रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

3-73 कभी सुबह कभी शाम

कभी सुबह कभी शाम रंगीन होती है,,

सपनों की यह दुनियां हसींन होती है,.,

उड़ लें हम आसमान में चाहे जितना,

रहने के लिए तो सिर्फ ज़मीन होती है,

पत्थर पर भी आ जाती है नींद सुहानी,

इंसा की जिंदगी गर मुतमईन होती है

खिलाएं एक दिन किसी भूखे को रोटी,

फिर देखें दिल को कैसी तस्कीन होती है,.(वीरेंद्र)/3-73


रचना: वीरेंद्र  सिन्हा  "अजनबी"

1-592 मुफलिसी में गिले-शिकवे


मुफ़लिसी में  गिले-शिकवे न कर 'अपनों' की नफरतों के,

तरक्की कर इस कदर, मुहब्बत करने लगें 'अपने' भी तुझसे..(वीरेंद्र)/1-592


रचना: वीरेन्द सिन्हा "अजनबी"

1-591 आखिरी सांस भी हमने


आखिरी सांस भी हमने रोक कर रख ली है

तेरे आने तक जीने की ज़िद जो कर ली है।..(वीरेंद्र)/1-591


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-590 करके मेरे लिए दरवाज़ा

मेरे लिए दरवाज़ा बंद कर चैन से न वो सोया होगा,
यकीनन दरवाज़े के पीछे खड़ा बहुत देर वो रोया होगा।.(वीरेंद्र)/1-590
रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-468 तलबगार हूँ जिसका


तलबगार हूँ जिसका उसी के आने की आस नहीं है,

इतनी भीड़ में बस मेरा ही एक शख्स ख़ास नहीं है,

सहरा सा हो गया है मंज़र इस जशन का अब तो,

सूखा है गला मेरा, फिर भी पानी की प्यास नहीं है..(वीरेंद्र/0468



रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" 

0-467 तुम्हारी मुहब्बत का


तुम्हारी मुहब्बत का जवाब तो देते हैं,

चाहे भले ही भगवान् पत्थर के होते हैं,

उन इंसानों से मगर उम्मीद न करना, 

जिनके दिल बने हुए पत्थर के होते हैं।. (वीरेंद्र)/0-467


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-294 सूर्योदय हुआ,

सूर्योदय हुआ,
अन्धकार हटा।
ओस की बूँदें,
हुईं चमकीली,
पत्तियां धुलीं,
कलियाँ खिलीं,
कैसी मनोरम,
प्रकृति की छटा।

नारंगी से नीला,
बनता आकाश,
नदी झरनों की,
कलकल सुनते,
शांत बैठे पक्षी,
पल में उड़ेंगे,
जाने कौन दिशा।

आ गए दिनकर,
थोड़े और ऊपर,
चलने लगी हैं,
हवाएं सर-सर
सर्द हुए सरोवर,
छाने लगी घटा।

आओ बचा लें,
ईश्वर प्रदत्त,
इस द्रश्य को,
इस प्रकृति को,
करें प्रकृति से,
कुछ और निकटता।

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी") 2-294

Wednesday, 10 December 2014

2-291 तोड़ दिए हैं सारे रिश्ते

तोड़ दिए हैं सारे रिश्ते तो इनकी बची डोर भी तोड़ क्यों नहीं देते,
क्यों थामे हो टूटी डोर को अभी तक, इसे भी छोड़ क्यों नहीं देते,
अब भी हमारे बीच क्यों संचारित हो रहीं हैं कुछ शेष ह्रदय-तरंगे,
क्या इनपे तुम्हारा वश नहीं, इनका मार्ग तुम मोड़ क्यों नहीं देते..(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")/2-291

0-466 जी करता है अपने

जी करता है अपने जज़्बात की हड्डियाँ तोड़ दूं,
एहसासात की अपने एक बार गर्दन मरोड़ दूं,
अब तक वफ़ा और जफा का फर्क ये न समझे,
क्यूँ न इन्हें नफरतों के जंगल में जाके छोड़ दूं..(वीरेंद्र)/0-466

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-465 ज़िन्दगी वीरान रास्तों में से

ज़िन्दगी वीरान रास्तों में से गुज़रती रही,
लगातार तेरे मेरे बीच की दूरी बढती रही,
कहने को तो एक राह के हमसफ़र थे हम,
मगर हमारे बीच एक लकीर भी चलती रही..(वीरेंद्र)/0465

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-464 तुम ही किया करतीं थीं

तुम ही किया करतीं थीं नफरत मुझसे, 
अब तो मै भी कुछ कुछ करने लगा हूँ,
इतनी मिलती जुलती हैं आदतें हमारी,
कोई गुल खिल न जाए मै डरने लगा हूँ..(वीरेंद्र)/0-464

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-463 बड़े बे-अदब हो जाते हैं

बड़े बे-अदब हो जाते हैं तहज़ीब सिखाने वाले,
चिल्लाते बहुत हैं अम्न और अमान लाने वाले,
किस किस की नसीहत पर अमल करे इंसान,
खुद नाखुदा होगए खुदा का नाम सिखाने वाले..(वीरेंद्र)/0-463

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-462 छोडो भी तस्करा-ऐ-बेवफाई

छोड़ो भी तस्करा-ऐ-बेवफाई अब बहुत हो गया,
खामोश हो चुका है वो इतना, कि बुत हो गया,
रौशन कर दी थी जिसने ज़िन्दगी किसी की,
खुद उसी की ज़िन्दगी में अँधेरा गुप हो गया..(वीरेंद्र)/0462

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-461 बड़ा जिंदादिल ताज़ा तरीन

बड़ा जिंदादिल, ताज़ा-तरीन था मेरा दिल,
बड़े नाजों-अंदाज़ से पला था मेरा दिल,
चंद दिनों के इश्क में क्या हालत कर दी,
लौटाया भी उसने तो किस हाल में मेरा दिल..(वीरेंद्र)/0-461

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-460 मैंने समझा था मिल गए तुम

मैंने समझा था मिल गए तुम मुझे उम्र भर के लिए,
देख लिए कई ख्वाब मैंने ज़िन्दगी की सहर के लिए,
पर ये तो एक पड़ाव था जिसे मंज़िल मै समझ बैठा,
अभी तो कई मोड़ आने बाकी थे पूरे सफ़र के लिए..(वीरेंद्र)/0-460  

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-459 फिर से कुरेदने का क्या

फिर से कुरेदने का क्या फायदा इन्हें,
मैंने तो दफना दिए थे जज़्बात सभी,
अजनबी बनके खुद को भुला दिया था,
मै समझा था तुम न दोगे आवाज़ कभी..(वीरेंद्र)/0-459

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-458 वो मुहब्बत ही क्या

वो मुहब्बत ही क्या जिसका इकरार नहीं,
वो मरासिम ही क्या जिसपर एतबार नहीं,
इश्क में रूहानी तस्करे तो सभी करते हैं,
रूह से मगर किसी को कोई सरोकार नहीं..(वीरेंद्र)/0-458 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-457 आज हर शख्स ग़मों में आज

आज हर शख्स ग़मों में मुब्तला सुबह शाम रहता है,
लबों पर उसके गिले शिकवों का कयाम रहता है,
हर हाल में बेज़ार रहने की आदत हो गई है उसकी,
गर ज़माने से नहीं, तो खुद से ही परेशान रहता है..(वीरेंद्र)/0-457

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-589 पी तो जाता हूँ मै दर्द

पी तो जाता हूँ मै दर्द, पर मुझसे किसी को सुनाये नहीं जाते,
भूल जाता हूँ ज़ख्म मगर उनके निशाँ मुझसे भुलाए नहीं जाते. .(वीरेंद्र)/1-589

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-588 चेहरे पर आपके इस कदर

चेहरे पर आपके इस कदर ख़ुशी देखकर, मुझे ये यकीन होता है,
ज़िन्दादिलों को उड़ने के वास्ते ज़मीं-आसमां में फर्क नहीं होता है.

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")/1-588

1-587 जाने क्यों अब वो ही कहते

जाने क्यों अब वो ही कहतें हैं अपना मुझे,
खुद ही जिन्होंने "अजनबी" बनाया था मुझे. ..(वीरेंद्र)/1-587

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-586 बाद में देना इल्जाम

बाद में देना मुझे इल्जाम दिल तोड़ने का, संगदिल,
पहले ज़रा अपने पत्थर दिल को आइना तो कर ले..(वीरेंद्र)/1-586

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-585 अब हकीकत में ही तुम मुझसे

अब हकीकत में ही तुम मुझसे मिला करो,
ख्वाबों में तो तुम हद ही पार कर जाते हो...(वीरेंद्र)/1-585

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-584 आज़िज़ आ गया था मै

आज़िज़ आ गया था मै ज़माने से,
सकूं मिला तेरे अजनबी बनाने से. ..(वीरेंद्र)/1-584

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")