Monday, 17 November 2014

0-456-तेरे प्यार की ये यादें

तेरे प्यार की ये यादें, यादें नहीं सजाएं हैं,
मैंने समझा था बहारें, मगर ये खिजाएँ हैं,
इन्होने बुझा कर रख दिए वो सब चिराग,
अंधेरों से निकलने को जो मैंने जलाएं हैं...(वीरेंद्र)/0-456

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-455-ज़रूरी नहीं, हंसी होटों पर

ज़रूरी नहीं, हंसी होटों पर ही नज़र आए,
आँखों में भी अक्सर ये दिखाई दे जाती है,
ज़रूरी नहीं, बात जुबां से ही बताई जाए,
आँखों के इशारे से भी बताई ये जाती है..(वीरेंद्र)/0-455

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


0-454-झूंटी तारीफ से खुश

झूंटी तारीफ़ से खुश हो जाते हैं,
मुगालते का शिकार हो जाते हैं,
छोड़ देते हैं आइना देखना हम,
खुद दुनियां से बेज़ार हो जाते हैं..(वीरेंद्र)/0-454

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-453-दिल की धड़कन जो सुना

दिल की धड़कन जो सुना दी उन्हें आज हमने, तो कहने लगे,
ये तो कभी धड़कता नहीं था, इसने धड़कना कब सीख लिया,
खुद ही ने फ़ेंक दिया है हमेको मुहब्बत के समुन्दर में "वीरेंद्र",
और हम ही से वो पूछते हैं कि हमने तैरना कब सीख लिया....(वीरेंद्र)/0453

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-452-कसमे, वादे, नाते भले हों

कसमे, वादे, नाते भले हों सब झूंटे,
फिर भी सबको लगते हैं बड़े अच्छे,
वक्ती तसल्ली मिल जाती है इनसे,
आगे क्या होगा,अभी से कौन सोचे..(वीरेंद्र)/0-452 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


0-451-भूला है मुझे तो एहसान

भूला है मुझे तो एहसान इतना कर, 
मेरा हाल गैरों से कभी पूछा ना कर,
जाने भी दे अगर मिलता नहीं दिल,
मेरे बारे में अब इतना सोचा ना कर..(वीरेंद्र)/0-451

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-290-मैंने आँगन में जो खिलाए


मैंने आँगन में जो खिलाए थे फूल तेरे वास्ते,

कल खुद मैंने ही उन्हें मुरझाने को कह दिया,

यूं तो कर दिया था उम्मीदों का दरवाज़ा बंद

आज न जाने क्यों थोडा सा खुला रख दिया।..(वीरेंद्र)/2-290



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-289-सुनो, आज एक बात पूछनी


सुनो, आज एक बात पूछनी थी,

दिल की मुझे तसल्ली करनी थी,

ये जो आंसू तुमने दिए थे मुझको, 

तुम गंभीर थे या दिल्लगी करनी थी..(वीरेंद्र)/2-289




रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-288-थोड़ी देर को मुझसे मिलने आज


थोड़ी देर को मुझसे मिलने आज मेरा बचपन चला आया,

बहुत दिनों से बिछुड़े थे, मिलकर मेरा दिल भी भर आया,

मैंने जो सुना डालीं उसे विरह उपरांत की व्यथाएं अपनी,

वो हंस कर बोला तू ही उतावला था मैं तुझे न रोक पाया...(वीरेंद्र)/2-288



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-277-यूं तो मुस्कराहट आपने निसंदेह

यूं तो मुस्कराहट आपने निसंदेह छुपाई है,
पर बंद होटों पर वो फिर भी उभर आई है..(वीरेंद्र)/2-277

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-583-अजीब ज़हनियत है "वीरेंद्र"

अजीब ज़हनियत है "वीरेंद्र" तेरे ख्यालात की भी,
बेवफाई पर भी तेरे शेर मुहब्बत से लबरेज़ होते हैं,..(वीरेंद्र)/1-583

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-582-इंतहा मासूमियत की तो कोई

इंतहा मासूमियत की तो कोई देखे उनकी,
डुबो दिया हमको, साहिल पे लाने के लिए..(वीरेंद्र)/1-582

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")