Sunday, 7 September 2014

0-114-तूभी गरज ले, तूभी बरस


तूभी गरज ले, तूभी बरस ले, ऐ आसमान मुझ पर,

तमाम दुनियां भी तो गरजती, बरसती है मुझ पर,

आसमान से बिजली बरसाने में तूही कमी क्यूं करे,

ज़माने ने भी ज़मीं से बिजलियाँ गिराई हैं मुझ पर...(वीरेंद्र)/0-114


रचना:  © वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



Friday, 5 September 2014

1-533-मान जाता है दिल छोटी

मान जाता है दिल कभी छोटी सी बात से,
और कभी नहीं मानता बड़ी सी सौगात से...(वीरेंद्र)/1-533 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 4 September 2014

1-046-बड़ा मशकूर हूँ आपका

बड़ा मशकूर हूँ आपका, जो आप मुझे शायरी का काम दे गए,

दूर करके मेरी गलतफहमियां मुझे "अजनबी"का नाम दे गए.



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")/1-046



2-239-बच्चे, बजुर्गों के प्यार से

बच्चे, बजुर्गों के प्यार से वंचित होते जा रहे हैं,
क्यूंकि परिवार धीरे-धीरे सोक्ष्म होते जा रहे हैं,
जो रहते थे साथ-साथ घर आँगन में कभी, वो
अब वृद्धाश्रम में या फ्रेमों में सिमटते जा रहे हैं...(वीरेंद्र)/2-239

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-244-जीवन में अंतर्द्वंद बहुत हैं


जीवन में अंतर्द्वंद बहुत हैं,

मन के दायरे तंग बहुत हैं,

कल्पना में भी संभव नहीं,

मुझ पर प्रतिबंध बहुत हैं।


मै उड़ना चाहूं आकाश में,

मेरे होंसले बुलंद बहुत हैं,

कुछ न मांगूं प्रकृति से मै,

मेरे लिए बस पंख बहुत हैं।



प्रेम-निधि में वृद्धि देदे प्रभु,

धन के सुपात्र रंक बहुत हैं,

बस तेरे रंग में रंग जाऊं मै,

वैसे तो जहां में रंग बहुत हैं।



बस तुझसे नाता न छूटे प्रभु,

संसार में तो सम्बन्ध बहुत हैं,

सदमार्ग पर अग्रसर कर मुझे,

यूंतो जीने के यहाँ ढंग बहुत हैं।(वीरेंद्र)/2-244



रचना: ©वीरेंद्र सिन्हा  ("अजनबी")

Wednesday, 3 September 2014

0-035-"जाते हुए भी तुम्हारी याद

जाते हुए भी तुम्हारी याद साथ थी,
आते हुए भी तुम्हारी याद साथ थी,
मै न भूल पाया तुम्हे एक पल को,
ना जाने तुम में ऐसी क्या बात थी. ...(वीरेंद्र)/0-035

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")