Sunday, 31 August 2014

1-062-गम तो है बहुत मुझको

गम तो बहुत है मुझको कि अब तू दोस्त ना रहा,
पर हैराँ हूँ सोचके, अबतक कैसे मेरा दोस्त बना रहा...(वीरेंद्र)/1-062

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 26 August 2014

0-018-मुफलिसी में खोटे सिक्के


मुफलिसी में खोटे सिक्के भी काम आ जाते हैं,

सूखे शजर भी लिपटके रोने के काम आ जाते हैं,

ज़िन्दगी की असलियत को समझ ऐ "अजनबी"

ग़मी में अपनों के संग बेगाने भी काम आ जाते हैं...(वीरेंद्र)/0-018



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")                    

2-211-"कोई इंसान भगवान् हो


कोई इंसान भगवान् हो नहीं सकता

जो है भगवान् वो इंसान हो नहीं सकता. ..(वीरेंद्र)/2-२११ 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


1-577-रोटी कपडे के बाद, मजलूम

रोटी कपडे के बाद, मजलूम की आँख एक छत को तरसती है,
क्योंकि, उसकी झोंपड़ी पर बरसात बिन रोक टोक बरसती है..(वीरेंद्र)/1-577

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



1-525-खँडहर हो जाएगी हसीं दुनिया


खँडहर हो जाएगी हसीं दुनियां, अगर बेटी नहीं है,

रिश्ते-नाते बनेंगे कैसे, दुनियां में अगर बेटी नहीं है...(वीरेंद्र)/1-525 



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-517-तेरे तसव्वुर से महक

तेरे तसव्वुर से महक जाती हैं यादें,

वर्ना तनहाइयों में होती गुज़र नहीं है...(वीरेंद्र)/1-517


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 25 August 2014

0-017-ये माना कि कुछ कुछ बातें


ये माना कि कुछ कुछ बातें आपका हक़ नहीं होतीं,

यह दलील भी ठीक है कि अपेक्षाएं ठीक नहीं होतीं,

पर हम सभी तो हैं इंसान एहसास जज़्बात से भरे,

वक्त कभी तेरा कभी मेरा, उपेक्षाएं ठीक नहीं होतीं....(वीरेंद्र)/0-०१७ 




रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-016-मै नहीं जानता तूने मुझसे


मै नहीं जानता तूने मुझसे मुहब्बत की है, या नहीं है,

मै नहीं जानता मैंने जो लिखा वो शायरी है या नहीं है,

हर लफ्ज़ निकला है दिल की गहराई से तेरे ही लिए,

मै नहीं जानता तूने मुझसे मुहब्बत की है, या नहीं है...(वीरेंद्र)/0-०१६ 




रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-524-करोगे क्या चारों तरफ


करोगे क्या चारों तरफ सन्नाटेदार रेगिस्तान का,

कुछ तो जगाह मखसूस रक्खो बेटियों के लिए भी ...(वीरेंद्र)/1-524




रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-578-आलिम लफ्फाजी नहीं करता

आलिम लफ्फाजी नहीं करता, लफ़्ज़ों को तोलकर बोलता है,
उसे पता है सच अगर खामोश भी है तो सर चढ़कर बोलता है..(वीरेंद्र)/1-578

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-581-हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी

हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी जो नेक ज़िन्दगी हमने जी ली है,
डाका तो नहीं डाला मैखानेवालों, बस तौबा ही तो हमने कर ली है...(वीरेंद्र)/1-581

(एक प्रसिद्ध ग़ज़ल की तर्ज़ पर)
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 24 August 2014

0-015-कुछ ऐसे भी सवाल हैं, जो


कुछ ऐसे भी सवाल हैं, जो पूछे नहीं जाते,

कुछ जवाब भी ऐसे हैं, जो दिए नहीं जाते,

सवाल को सवाल ही रहने दो पूछने वालों,

पूछ लिए तो अक्सर जवाब सहे नहीं जाते...(वीरेंद्र)/0-015  


.© रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-011-खुदा ने बनाईं दुनियां, तो

खुदा ने बनाई दुनियाँ, तो कौन सा बड़ा काम कर दिया,
लोग भी तो हर रोज़ अपनी दुनिया एक नई बना लेते हैं, 
उसने लिक्खीं हैं किस्मतें, तो कौन सा अजूबा कर दिया,
लोग भी तो, अक्सर खुद ही अपनी किस्मतें बना लेते हैं. ....(वीरेंद्र)/0-०११ 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी) 

0-012-हमें ना मारा है उनकी


हमें ना मारा है उनकी नफरतों ने,

ना ही मारा है उनकी फितरतों ने,

बेवफाई का उन्हें क्यूं इलज़ाम दें,

हमें मारा उनकी मसरूफियतों ने. .. (वीरेंद्र)/0-०१२ 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")/0493

0-013-ज़िन्दगी फिर से हसीं


ज़िंदगी फिर से हसीन बना दी हमने,

अपने बीच की दीवार गिरा दी हमने,

समुंदर से गहरे रिश्ते अब ना टूटेंगे,

गलतफहमियां तमाम बहा दी हमने. ...(वीरेंद्र)/0-013

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  ("अजनबी")

0-014-कुछ कसर न रखी बाक़ी


कुछ कसर न रखी बाकी, दिल हमारा जलाने को,

किसने कहा था तुम्हे बारिश में यूं भीग जाने को,

खुद तो इतना कंप कपा रहे हो ठण्ड से तुम मगर, 

कोई कमी न रखी तुमने हमारी आग सुलगाने को. ...(वीरेंद्र)/0-0१४ 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 20 August 2014

0-009-मै जानता नहीं था जो,

मै जानता नहीं था जो, वो सिखाया ज़माने ने मुझे,

मै था अपरिपक्व, परिपक्व बनाया ज़माने ने मुझे,

अक्सर चेहरे निकले नकली, जब भी मुखौटा हटा,

मै था आशावादी, निराशावादी बनाया ज़माने ने मुझे....(वीरेंद्र)/0-009


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-008- आरजू थी, शाम ढले तुम


आरज़ू थी, शाम ढले तुम आते,
ज़ुल्फ़ की खुशबू में हमें सुलाते,
ना तुम आये, ना नींद ही आई,
क्या करते, गर हम मर न जाते...(वीरेंद्र)/0-008

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-100-ऊँचाई न चढो इतनी

ऊंचाई न चढो इतनी कि सांस फूले और पैर फिसल जाय,

गहराइयों में न उतरो इतनी, घुटकर दम ही निकल जाय,

चंद लम्हों की ख़ुशी की जद्दो-जहद में मत डूबो इतना कि,

देखते-देखते,  ज़िन्दगी का असल मकसद ही बदल जाय....(वीरेंद्र)/0-100


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 17 August 2014

1-516-हम मुस्कुराना भी चाहें

हम मुस्कुराना भी चाहें तो, मुस्कुराएँ  कैसे,
शहर भर की मुस्कुराहटें तो आप लिए बैठे हैं...(वीरेंद्र)/1-516

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-523-मै हूँ ज़िन्दगी

मै हूँ ज़िन्दगी, मुझे लोग उलझन के नाम से भी जानते हैं,
मै कितनी भी सुलझ जाऊं, लोग मुझे उलझन ही मानते हैं, ..(वीरेंद्र)/1-523

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-515-सूरज की रौशनी को बादल


सूरज की रौशनी को बादल छीन लेते होंगे,

हमारी मुस्कुराह्टों को छीन कर तो कोई दिखाए ...(वीरेंद्र)/1-515




रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-514-दूरियां बढती चली गईं

"दूरियां" बढती चली गईं "नजदीकियों" की चाह में,

फूलों की जगह कांटे बिछते गए हसरतों की राह में,...(वीरेंद्र)/1-514



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-007-काटते हैं बड़े जोर से


काटते हैं बड़े जोर से, पर उनके दांत नहीं होते,

चुभते हैं तीर की तरह, पर वो बाण नहीं होते,

कटु 'शब्द' कर देते हैं ज़ख्म बहुत गहरे गहरे,

मचा देते हैं वे कत्लेआम, पर तलवार नहीं होते. ..(वीरेंद्र)/0-007


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-006-दुनिया को धोखा देने की बात

दुनियां को धोखा देने की बात तो समझ आती है,

पर खुद को धोखा देने की बात समझ नहीं आई,

कैसे भूल जाता है इंसान, औरों की तकलीफ को,

क्या उस पर ता-उम्र कोई भी तकलीफ नहीं आई, ..(वीरेंद्र)/0-006



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-005-तेरे आने की आस, अब


तेरे आने की आस, अब भी दिल से जाती नहीं,

बहुत किया ईलाज, सुर्खी आँखों से जाती नहीं.

फिर से हरे हो जाते हैं, तमाम ज़ख्म जुदाई के,

बहुत दबाता हूँ इन्हें पर यादें दिल से जाती नहीं.,,(वीरेंद्र)/0-005 


रचना: वीरेंद्र "अजनबी"


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0-004-पसीने-पसीने जो आप

पसीने-पसीने जो आप नहाए हुए हैं,
क्या बात है, जिससे घबराये हुए हैं,
हमने तो खुद ही निगाह नीची कर ली,
फिर भी क्यों आप तिलमिलाए हुए हैं...(वीरेंद्र)/0-004

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-003-रिश्ते कोई महंगी शय नहीं


रिश्ते कोई महंगी शय नहीं, यहाँ-वहां रोज़ बिकते हैं,

इसके बाज़ार हर जगह, हर शहर में रोज़ लगते हैं,

क्या ज़रुरत इन्हें संवारने की, बढाने की, बनाने की,

पायदारी भी क्या देखनी इनकी, ये रोज़ टूटते बिगड़ते हैं....(वीरेंद्र)/0-003


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-002-खुदा गर मुझे तू जज़्बात न


खुदा अगर मुझे तू जज़्बात न देता, तो तेरा क्या बिगड़ जाता, 

तुझे पता था तेरी इस सौगात के बिन भी यहाँ काम चल जाता,

गर तूने भर दी होती अहमियत इनकी हर इंसान के दिमाग में,

मेरे जैसे कई दिल रोने से बच जाते तो, तेरा क्या बिगड़ जाता...(वीरेंद्र)/0-००२ 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-001-क्यों करे किसी को खुद

क्यों करे किसीको खुद से याद कोई,

क्यों करे गुफ्तगू का आगाज़ कोई,

जब मालूम हो कि रह नहीं सकता,

दो दिन से ज्यादा बिन करे बात कोई. ..(वीरेंद्र )/०-001


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Saturday, 16 August 2014

2-236-सखियों जैसी प्रिय, सुंदर


सखियों जैसी प्रिय, सुंदर हरी-भरी पहाड़ियों के बीच,जाऊं मै,

पर्वतों की प्राकृतिक ममतामयी गोद में  जाकर सो जाऊं मै, 


रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियों में रम कर उनसे श्रृंगार करवाऊं, 

फूलों की भिन्न सुगंधों को पहचानने में बस व्यस्त हो जाऊं मै,


सर्पाकार में इठलाती ये पग-डंडियाँ उनके आने का संकेत देतीं,

चिरैय्या, कोयल की आवाजों के मतलब का अनुमान लगाऊं मै,


घिर-घिर आए जब बदरा और चले जब शीतल पवन यहाँ वहां,

भेजकर कोई पवन-संदेसा अपने पिया को, परदेस से बुलाऊँ मै,


तंग आ गई हूँ मै, उदासी में रहते-रहते, विरह में जलते-जलते,

यूंही न जाने दूँगी ऋतू को, इस बार तो सावन सफल बनाऊँ मै ..(वीरेंद्र)/2-236 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-235-आजादी का मतलब क्या,


आज़ादी का मतलब क्या, उस से पूछो,

ज़िन्दगी गुलामी की, जिसने देखी है,

जज्बा देशभक्ति का क्या है, उससे पूछो 

ज़िन्दगी जिसने, देश के नाम कर दी है ...(वीरेंद्र)/2-२३५


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-233-जीवन की जिन राहों में

जीवन की जिन राहों में, तेरा साथ नहीं,
जिस आँगन में तेरी कोई, पदचाप नहीं,
उनमे अँधेरे भी रहें तो मुझे क्या फर्क,
उजियारों की उनमे, अब मुझे चाह नहीं. ..(वीरेंद्र)/2-233 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-234-लगता आकाश "काला" मुझे

"रंग"

लगता आकाश "काला" मुझे, यह "नीला" नहीं है,
चन्द्रमा लगता बुझा-बुझा सा, चमकीला नहीं है,
प्रिय बिन मेरे,सावन भी बड़ा रूखा लगे है मुझको,
धरती बदरंगी लग रही, वातावरण रंगीला नहीं है..(वीरेंद्र)/2-234 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

Thursday, 14 August 2014

2-92-एक-एक आतंकी का

एक-एक आतंकी का सफाया कर दिया जाय,

किसी भी शहीद की शहादत बेकार ना जाय,

बहुत दिन हो गए अमन-अमन, करते-करते,

चलो जवानों अब कुछ शिकार विकार हो जाय...(वीरेंद्र)/2-92 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 13 August 2014

2-219-कुपात्रों के लिए भावनाएं


कुपात्रों के लिए भावनाएं ,संवेदनाएं नष्ट न कीजिये,
खुदगर्जों को कभी आजमाने का आप कष्ट न कीजिये...(वीरेंद्र)/2-219 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-205-ये माना, प्यार बिन आकर्षण

ये माना, प्यार बिन आकर्षण नहीं होता,
मगर हर प्यार मात्र आकर्षण नहीं होता,
सच्चे मन में प्यार स्वयं ही झलकता है,
उस पर कोई भी बाह्य आवरण नहीं होता...(वीरेंद्र)/2-205

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 12 August 2014

1-093-खुदा तो मुझमे और काफिर में

खुदा तो मुझमे और काफिर में भी है, सिर्फ मस्जिद में ही नहीं,

वल्लाह मेरी शराब नोशी से इंसा को तकलीफ है खुदा को नहीं...(वीरेंद्र)/1-093



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 11 August 2014

1-580-आने न दो आंसूं, ऐसे दिखो

आने न दो आंसूं, ऐसे दिखो जैसे ग़मज़दा नहीं हो,

हंसो तो इतना हंसो, कि लगे तुम शादीशुदा नहीं हो..(वीरेंद्र)/1-580

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-510-ये जो चल रहीं हैं आंधियां

ये जो चल रहीं हैं आंधियां और बिजलियाँ,

ये मौसम नहीं, ये हैं कुदरत की तल्खियाँ. ..(वीरेंद्र)/1-510


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 10 August 2014

3-67-रिश्ते बहुत नाज़ुक कहे जाते

रिश्ते बहुत नाज़ुक कहे जाते हैं,
बड़े कोमल भावुक समझे जाते हैं,

बहुत ही संभालना पड़ता है इनको,
मामूली सी ठसक से चटख जाते हैं,

मौसमी हवाओं से बचाना पड़ता है,
बेचारे जल्दी ही बीमार पड़ जाते हैं,

सहारे लाजिम हैं चलते रहने को,
लड़खडाने से ये गिर भी जाते हैं,

गर्माहट के तलबगार होते हैं रिश्ते,
वर्ना जिंदा होके भी सर्द पड़ जाते हैं,

शीशे की माफिक टूट जाते हैं रिश्ते,
जुड़के भी इनमे कुछ ऐब रह जाते हैं. ...(वीरेंद्र)/3-67 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

3-66-मैंने खाई थी कसम


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मैंने खाई थी कसम शायरी न करने की,
आज आपने मेरी यह कसम तुड़वाई है,

हटाकर रुख से ये हसींन जुल्फें अपनी,
मुझसे आपने एक और ग़ज़ल लिखवाई है.

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3-65-बलात्कार को महज़ गलती


बलात्कार को महज़ गलती मानने वालों,
घर संभालो कहीं ये गलती सबसे न हो जाय,

बड़े बड़े सूरमा ज़मींदोस  हो गए जहाँ में,
ज़हनियत बदल डालो कहीं देर न हो जाय,

औरत सह रही है ज़िल्लत कुछ और दिन,
वो दिन भी दूर नहीं जब वो फूलन हो जाय,

ठीक कहा तुमने गुनाहगारों को फांसी मत दो,
अच्छा हो अँधा भिखारी और अंगभंग हो जाय...(वीरेंद्र)/3-65 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

3-64-नादान हैं ये हवाएं,


नादाँ हैं ये हवाएं, उड़ा देती हैं मेरा दामन तेरी ही जानिब,

उन्हें कौन समझाए, तू तो अब मुझसे दामन छुड़ाने लगा है,


मुहब्बत की राहों में मेरा पहला कदम तूने ही रखवाया था,

मंजिल के पास आते आते, क्यों तेरा ही मन घबराने लगा है,


ऐ वादियों, ऐ नजारों, अब नहीं तुम्हारी गवाही की ज़रुरत,

मेरा महबूब ही अब मुझे मिलने से पैहम कतराने लगा है. ..(वीरेंद्र)/3-64 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

3-63-वादे लोग नए नए करने

वादे लोग नए नए करने लगे हैं,
ज़ख्म माझी के, उभरने लगे हैं,

कहने को तो लोग जुड़े कारवां में,
हम तो मगर तनहा होने लगे हैं,

खिजा आई भी नहीं अभी तो,
फिर ये पत्ते क्यों झड़ने लगे हैं,

खौफ आँधियों का खाया इतना,
चराग भी जलने से डरने लगे हैं,

बेजान से हो गए परिंदे कफस में,
रिहा होक भी कैद में रहने लगे हैं,

रुके थे पथराई आँखों में जो आंसू,
अब नहीं रुकते, वो बहने लगे हैं.....(वीरेंद्र)/3-६३ 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-232-नालायक संतानों से बेहतर

नालायक संतानों से बेहतर तो एक बेजान छड़ी है,
समय पर  सहारा बन कर हो जाती सदैव खड़ी है,
संभाल लेती है उन उपेक्षित लडखडाते माँ-बाप को,
रिश्तेनाते बहुत हैं जिनके पर किसको क्या पड़ी है...(वीरेंद्र)/2-232 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-231-कोमल कलि के बिना फूल

कोमल कलि के बिना फूल खिल नहीं सकता,
प्रेम की भावना बिन दिल मिल नहीं सकता,
जबतक लिखा न हो दो आत्माओं का मिलन,
कोई शख्स किसी को यूँहीं मिल नहीं सकता. ..(वीरेंद्र)/2-231

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-225A-गरीब को खाद्य-सुरक्षा नहीं

गरीब को खाद्य-सुरक्षा नहीं खाना दे दो,
उसे शिक्षा का अधिकार नहीं शिक्षा दे दो.
या तो गरीब को भी तुम आरक्षण दे दो,
या फिर उसे इच्छा-मृत्यु-अधिकार दे दो. ...(वीरेंद्र)/2-225A

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी)  

2-229-और कितनी देर लगेगी नारी


और कितनी देर लगेगी नारी-विरुद्ध अपराध रुकवाने में,
और कितनी देर है सरकारों के लंबी नींद से जाग जाने में,
ना भूलो यदि भड़क उठी आग जनता के दिलों में कभी,
इससे भी ज्यादा देर लगेगी तुम्हें उस आग को बुझाने में . ..(वीरेंद्र)/2-229

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-227-प्रकृति बता यह तेरा भेदभाव


प्रकृति तूही बता यह तेरा भेदभाव है या है कोई अजूबा,
इंसान कहीं तो खा खा कर मरे ,और कहीं-कहीं भूखा,
इंसान ने तोड़ी तेरी संतुलित व्यवस्था शायद इसीलिए,
दण्डित तूने किया, कहीं दी बाढ़ और कहीं-कहीं सूखा......(वीरेंद्र )/2-227 

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-226-तुम पुकार कर तो देखो


तुम पुकार के तो देखो दिलबर, मै दौड़ा चला आऊँगा,
खुशियाँ ही खुशियाँ मै दामन में, भरता चला जाऊंगा,
बड़े-बड़े झूंटे वायदे करना, मेरी आदत में नहीं प्रिये,
मै "अच्छे दिन" नहीं जो आते आते भी नहीं आऊँगा. ...(वीरेंद्र)/2-२२६ 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-224-सावन साजन दोनों एक से


सावन साजन दोनों एक से,
दोनों गरजे, दोनों ही बरसे,
दोनों गायब हो जाते प्रायः,
दोनों के दर्शन को हम तरसे. ..(वीरेंद्र)/2-224 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-223-निराशाएं लिए अपने मन में,


निराशाएं लिए अपने मन में,
व्यथाएं दबाए हुए अंतर्मन में,
मै व्यक्त न कर पाई स्वयं को,
प्रश्न रहे अनेक मेरे चिंतन में. ...(वीरेंद्र)/2-223

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-222-तुम्हीं से पाई मैंने हसीन ज़िन्दगी

तुम्ही से पाई मैंने हसींन ज़िन्दगी,
तुम न होते तो ये सौगात ना होती,

जीवन में मनचली हवा न चलती, 
और ये चुलबुली बरसात ना होती,

सर्दियां आतीं आके चली भी जातीं,
मन लुभावनी वो गर्माहट ना होती,

गर्मियों की सुनसान दुपहरिया में,
छत पे चुपचाप मुलाक़ात ना होती,

बढ़ कर यहाँ तक न आते हम तुम,
गर सफ़र की वो शुरुवात ना होती,

तुम्ही से पाई मैंने हसींन ज़िन्दगी,
तुम न होते तो ये सौगात ना होती. ...(वीरेंद्र)/2-222 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


2-221-बार बार मोदी सरकार से

बार-बार मोदी सरकार से क्यों पूछते हो,
"अच्छे दिन कब आने वाले हैं",

मान क्यों नहीं लेते यही हैं अच्छे दिन,
आगे तो और भी बुरे दिन आने वाले हैं...)वीरेंद्र)/2-221 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-220-लाल गुलाब तोड़ डाला

लाल गुलाब तोड़ डाला,

मेरा उपहार तोड़ डाला,

तोड़फोड़ की आदत में,

मेरा दिल भी तोड़ डाला,

फिरभी शुक्र है उसका,

भरोसा नहीं तो डाला. ...(वीरेंद्र)/2-220 


रचना: वीरेंद्र  सिन्हा ("अजनबी")

2-215-आशा बनकर स्फुटित हो

आशा बनकर स्फुटित हो गया हूँ मै, निराशाओं के वातावरण में,
खिलूँगा मै, मेह्कूंगा मै, संभव है आ जाय परिवर्तन पर्यावरण में,
अकेला ही सही, चिराग भी देता है, कुछ तो चुनौती तिमिर को,
जबतक दिनकर नहीं आ जाते, पौ फटने पर धरती के प्रांगण में...(वीरेंद्र)/2-215A

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-182A-काश मेरा दिल अनब्रेकेबल होता

काश मेरा दिल अनब्रेकेबल होता,
दाग धुल जाते गर वाशेबल होता,

प्यार में झटसे यूं न पिंघलता ये,
काश, ये भी मिक्रोवेवेबल होता,

निकाल के रख दिया करता इसे,
कमबख्त गर ये डीटेचेबल होता,

रोते हुए से हंसने लगता ये भी,
अच्छा होता जो स्विचेबल होता,

ट्रांसप्लांट करवा लेता बीमार को,
थोडा सा अगर अफोर्डेबल होता,

पत्थर के मिलने लगे हैं अब तो,
बेच देता दिल यदि सेलेबल होता. ...(वीरेंद्र)/2-182A

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-147A-उन्मुक्त चल पड़ी हैं आंधियां

उन्मुक्त चल पड़ी हैं आंधियां तेज़, 

चहुँ ओर बढ़ता कामुकता का वेग,

हो रहे स्वछन्द मै और तुम सभी,

सिसकते समाज में व्याप्त है उद्वेग,


वस्त्र महीन या वस्त्रविहीन हो गए,

अश्लील व् नशे में तल्लीन हो गए,

अपराध कर रहे रिश्ते नाते भूल, 

संवेदना खुकर भावनाहीन हो गए,


न होगी प्रलय, ना होगा अवतार,

हमें ही रोकनी पड़ेगी ये रफ़्तार,

स्वयं लगा लो अंकुश, स्वयं पर,

कहीं ऐसा न हो, हो जाय नरसंहार. ...(वीरेंद्र)/2-147A


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


Saturday, 9 August 2014

0-401-मुझे माफ़ कर दो मेरे


मुझे माफ़ कर दो मेरे जज्बातों,

मैंने तुम्हे हरदम ही रुलाया है,

तुम्हारी कदर ही नहीं की मैंने,

संग-दिलों पर तुम्हे लुटाया है. ..(वीरेंद्र)/0-401


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-243-मेरे मस्तक पर किसी


मेरे मस्तक पर किसी ने, चिंता का भाव नहीं देखा,

आवरण तो देखा, किसी ने मन का घाव नहीं देखा,

समस्त लकीरों का जमघट है मेरी हथेली में, मगर,

मेरे हाथ में किसीने भाग्य-रेखा का अभाव नहीं देखा...(वीरेंद्र)/2-243


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 8 August 2014

1-512-मेरी तन्हाई में भीड़ न


मेरी तन्हाईयों में भीड़ न लगा अपनी यादों की, ख्यालों की,

मिलना है तो मिल हकीकतन, मुझे दरकार नहीं ख्वाबों की...(वीरेंद्र)/1-512


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-511-महरूम रह जाता मै


महरूम रह जाता मै चन्द तल्ख़ हकीकतों से,

बहुत कुछ इल्म पाया है मैंने तेरी नफरतों से. ..(वीरेंद्र)/1-511


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-354-भूल जाने की उसे, मुझमे


भूल जाने की उसे, मुझमे कुछ और कूबत पैदा कर दे,

या फिर ऐ खुदा उसकी नफरतों में और इजाफा कर दे..(वीरेंद्र)/1-354


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-513-मेरी आँखें क्यों ढूंढती रहीं


मेरी आँखें क्यों ढूंढती रहीं वो बात तुझमे,

तू तो पत्थर था, नहीं थे जज़्बात तुझमे..(वीरेंद्र)/1-513


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-502-सवाल-ए-वस्ल अब हम


सवाल-ए वस्ल अब हम न करेंगे तुझसे कभी 

अब हमने तुझको ही जो दिल में बसा लिया है....(वीरेंद्र )/1-502


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-509-मिट जाएँ आरजुएं मेरी


मिट जाएं आरजूएं, पर इतना अरमान तो रहे,

वो आएं न आएं, उनके आने का इमकान तो रहे...(वीरेंद्र)/1-509


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-355- दर्द अभी ज़रूर है पर

अभी भी दर्द ज़रूर हैं, मगर अब कोई गम न रहा, 

भर जायेंगे ज़ख्म, अपनों का अब मरहम न रहा...(वीरेंद्र)/1-355


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-508-आज पढ़ लीं आँखें


आज पढ़ लीं आँखें भी मैंने उस बेवफा की,

ख़त पढ़ पढके जिसके मै धोखा खा रहा था,..(वीरेंद्र)/1-508


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-507-चोट का दर्द हमें पता है

चोट का दर्द हमें पता है, हमने चोट ता-उम्र खाई है,

दर्द देने वाले को मगर यह बात अब समझ आई है...(वीरेंद्र)/1-507


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-506-ना होंगे वो नाराज़, कह

ना होंगे वो नाराज़,  कह दूं मै अपनी बात जो आज,

मौका अच्छा है, ख़ामोशी अख्तियारे बैठे हैं वो आज. ..(वीरेंद्र)/1-506


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-504-तेरी दुनियां से बहुत दूर मै

तेरी दुनिया से बहुत दूर मै निकल आया हूँ,

बहुत देर लगा दी तूने,  मुझे आवाज़ देने में...(वीरेंद्र)/1-504


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-505-कौन बुलाता है खुद ग़मों

कौन बुलाता है खुद ग़मों को, पर हम बुला रहे हैं,

जिद्दी चराग हैं हम, आँधियों में भी जले जा रहे हैं. ..(वीरेंद्र)/1-505


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-503-शोर मचा रखा था तूने

शोर मचा रखा था तूने, 'मुझे भूल जा, 'मुझे भूल जा',

ले, मै तो भूल गया तुझे, अब तू मुझे भूल कर दिखा. ..(वीरेंद्र)/1-503


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-433-मुझे नहीं पता, मेरे

मुझे नहीं पता, मेरे ग़मों की ये कैसी आदत है,

चिपट जाते हैं मुझ से, मुझे तनहा देख कर,

बेचारी तन्हाई भी मेरी लाचार हो जाती है,

सताते हैं ये गम मुझे कुछ इस तराह घेर कर...(वीरेंद्र)/0-433


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-432-आँखें हैं बंद फिरभी आंसू

आँखें हैं बंद फिरभी आंसू बह रहे हैं,

मेरी जुबां का काम, आंसू कर रहे हैं,

बड़ा रोका मैंने, इन्हें यूं न ज़ाया हो,

फिर भी यह, दर्द अपना कह रहे हैं. ...(वीरेंद्र)/0-432

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-176-मै खुद को ही सुनाता हूँ

मै खुद को ही सुनाता हूँ अनकहे दर्द अपने,

न जाने क्यूं लोग उसे शायरी समझ लेते हैं,

मै बहुत छुपाता हूँ, दर्द को खामोश रहकर,

ना जाने कैसे, लोग मेरे चेहरे से पढ़ लेते हैं. ...(वीरेंद्र)/0-176


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 7 August 2014

1-254-तू महफूज़ है बेवफा

तू महफूज़ है बेवफा, बेफिक्री से गुज़र जा,

इन राहों में खतरा तो  सिर्फ वफ़ा वालों को है...(वीरेंद्र)/1-254


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-253-आइना झूंट बोलता नहीं,


आइना झूंट बोलता नहीं, ये बात मेरा दिल मानता नहीं,

'उसी' की सूरत दिखाता है, मेरी सूरत तो ये पहचानता नहीं...(वीरेंद्र)/1-253


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-345-वक्त ने जीने का सलीका

वक्त ने मुझे जीने का सलीका सिखा दिया,

कौन है अपना कौन पराया, ये बता दिया,

हर एक चेहरा जानता पहचानता था मुझे,

खुदा जाने क्यों तुमने अजनबी बना दिया. ..(वीरेंद्र)/0-345


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-251-अपने दिल में तेरा अरमान लेकर


अपने दिल में तेरा अरमान लेकर,

मुहब्बत का अपनी, पैगाम लेकर,

शोलों के ऊपर से गुज़र जाएँगे हम,

लबों पर तेरा नाम सरेआम लेकर. ..(वीरेंद्र)/0-251


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-398-सरकारों का काम है

सरकारों का काम है उमीदें जगाए रखना,

जनता का कर्त्तव्य है उमीदें लगाए रखना,

वायदे इतने महत्वपूर्ण नहीं होते, जितना,

ज़रूरी है वायदों पर भरोसा बनाए रखना. ....(वीरेंद्र)/0-398


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-397-या तो महंगाई घटा दो

या तो महंगाई ही घटा दो,

या फिर कमाई ही बढ़ा दो,

और कुछ न कर सको तो,

इनकम टेक्स ही घटा दो. ...(वीरेंद्र)/0-397



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 6 August 2014

0-113-वक्त की बात है कभी कोई

वक्त की बात है कभी कोई तो कभी कोई प्यारा लगता है,
आज प्यारा है दोस्त, तो कल दुश्मन ही प्यारा लगता है,
रिश्ते और नाते बदलते रहते हैं अहमियत अपनी अक्सर,
कभी इंसान गिरा हुआ, कभी भगवान् से प्यारा लगता है...(वीरेंद्र)/0-113 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-321-दरिया आ आकर गिरते ही

दरिया आ आकर गिरते ही रहेंगे समुंदर में,

उसे फर्क नहीं, कुछ बूँदें अगर कम हो जाएँ,

बेहिसाब दोस्त आते ही रहेंगे आपके पास,

मलाल कैसा, अगर भीड़ से हम कम हो जाएं ...(वीरेंद्र)/0-321


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-396-तुझको बहुत है नफरत मुझसे,

तुझको बहुत है, नफरत मुझसे,

मुझे भी बहुत है, नफरत तुझसे,

बड़े ही खुशनसीब हैं हम 'जानू',

इतने गुण  मिले हैं किस्मत से...(वीरेंद्र)/0-396


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-431-सूरज छिप नहीं जाता

सूरज छिप नहीं जाता जब तलक, रात नहीं होती,
इश्क न हो जबतक शायरी की शुरुवात नहीं होती,
बेवफाई तो खैर एकबार सहन हो जाती है, इश्क में,
कमबख्त ये बेरुखी मगर, कभी बर्दाश्त नहीं होती ..(वीरेंद्र)/0-431

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-413-तू मेरे ज़ख्मों को यूं तो न

तू मेरे ज़ख्मों को यूं तो, न हवा दे,

जुर्म क्या है मेरा, यह तो बता दे,

दोस्ती की गर्दन पे न रख खंजर,

या तो हटा ले इसे या फिर चला दे....(वीरेंद्र)/0-413


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 5 August 2014

1-501-आइना बार बार देखते रहे

आइना बार बार देखते रहे, न जाने किस उम्मीद में,

आइना झूंट नहीं बोलता, ये तो हमने सोचा ही नहीं...(वीरेंद्र)/1-501


वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-500-मुब्तला था मै उसके ख्यालों

मुब्तला था मै उसके हसीं ख्यालों में, और नींद लग गई,

तरसता था एक ख्वाब को और ख्वाबों की भीड़ लग गई,..(वीरेंद्र)/1-500


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-499-हम अपने दर्द तुझे

हम अपने दर्द तुझे बतलाने को तरस जाते हैं,

हमसे अच्छे ये बादल हैं जो बस बरस जाते हैं,..(वीरेंद्र)/1-499


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-498-मुझे इल्ज्ज़म न दे मैंने

मुझे इल्ज़ाम न दे, मैंने कुरेदा है तेरे दर्द को,

तेरी खामोशियाँ क्या कम हैं दर्द बताने को. ..(वीरेंद्र)/1-498


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-497 नफरत भी न बढ़ा इतनी


नफरत भी न बढ़ा इतनी, कि मुहब्बत में बदल जाए.

अदावत भी न कर इतनी, कि सबको पता चल जाए, ..(वीरेंद्र)/1-497


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-496-सिर्फ खुशियाँ ही खुशियाँ बाँट लीं

सिर्फ खुशियाँ ही खुशियाँ बाँट लीं "अपनों" से हमने ,

बांटने से दर्द भी हो जाते  हैं कम, सोचा नहीं ये हमने ..(वीरेंद्र)/1-496


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-495-खुदकशी के और भी तरीके

खुदकशी के और भी रास्ते हैं इश्क के सिवा,

"आग के दरिया" में डूबने की ज़रुरत है क्या..(वीरेंद्र)/1-495

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")/1-495

1-044-टूट चुकी हैं जब सारी उमीदें

टूट चुकी हैं जब सारी उमीदें, आओ अब कुछ रस्म निभा दें,

खो जाएं भीड़ में हम, एक दूसरे को फिर से अजनबी बना दें. ..(वीरेंद्र )/1-044


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-251-बहुत दिनों से क्यों मुझे

बहुत दिनों से क्यों मुझे कोई दर्द मिला नहीं,

ऐसा भी नहीं कि मुझे कोई अपना मिला नहीं....(वीरेंद्र)/1-251


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-412-अब तो वक्त-ऐ-आखिरी आने

अब तो वक्त-ए-आखिरी मेरा आने को है,

भीड़ लोगों की कुछ देर में लग जाने को है,

खिज़ाओं में पूरी ज़िन्दगी गुज़ार दी मैंने,

अब क्यूं बताते हो मुझे, बहार आने को है..(वीरेंद्र)/0-412


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-374-दागे-जफा को अश्कों से

दागे-जफा को, अश्कों से धोना पड़ता है,

पराया भी कभी अपनों से होना पड़ता है,

ता-उम्र खुशियों का भ्रम पाले हुए थे हम,

सोचा नहीं, आंसुओं से भी रोना पड़ता है,...(वीरेंद्र)/0-374


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-112-ये क्या कम है के बच्चोँ

ये क्या कम है के बच्चों ने रखे हैं रिश्ते आज भी जोड़के,

ये बात और है माँ-बाप को रखा है एक बिल्डिंग छोड़के,

बूढी माँ फूंक रही है चूल्हा, आज भी डुगलाते  हाथों से,

पाल दिया जिसने कुनबा दिन रात कमर अपनी तोड़के. ...(वीरेंद्र)/0-112


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-111-ज़िन्दगी में लोग आते हैं

ज़िन्दगी में लोग आते हैं, और चले जाते हैं,

कुछ पल खुशगवार, कुछ दुश्वार हो जाते हैं,

ख़त्म हो जाती है ज़िन्दगी भी खेल के जैसी,

तमाशबीन इसमें आते हैं, और चले जाते हैं. ..(वीरेंद्र)/0-111


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-395-मेरे बुरे दिन तो ख़त्म

मेरे बुरे दिन तो ख़त्म हो गए,

पर अच्छे दिन कब शुरू होंगे,

घड़े फोड़ कर रख दिए हैं मैंने,

जाने मेघ मेहरबान कब होंगे. ...(वीरेंद्र)/0-395


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 4 August 2014

1-575-मत आजमा मेरा जज्बा

मत आजमा मेरा जज्बा, इम्तिहाने-इश्क में जाँ देने का,
यूं तो ता-उम्र तुझसे हारा हूँ, इस बार कहीं जीत न जाऊं...(वीरेंद्र)/1-575

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-574-कांधा न मिला रोने को,


कांधा न मिला रोने को, कोना दीवारों का ढूंढता रहा,

दीवारों से टकरा कर, दीवारों में ही मै सिमटता रहा...(वीरेंद्र)/1-574

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-494-कहाँ से ले आएं चेहरे पर

कहाँ से ले आएं अपने चेहरे पर मुस्कुराहट हम,

सारे शहर की मुस्कुराहटें तो आप चुराए बैठे हैं...(वीरेंद्र)/1-494


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-493-जबसे तेरी जुस्तजू में

जबसे तेरी जुस्तजू में, हद से गुज़रने लगा,

और भी ज्यादा तनहाइयों में मै डूबने लगा...(वीरेंद्र)/1-493


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-492-मै भी पकड़ लेता जाती हुई

मै भी पकड़ लेता जाती हुई खुशियों को,
मगर खुशियों के कोई दामन नहीं होता. ...(वीरेंद्र)/1-492

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-491-मैंने कर लीं थीं

मैंने कर लीं थीं खुशियाँ मुट्ठी में बंद,
रेत की मानिंद फिरभी वो बह निकलीं ...(वीरेंद्र)/1-491

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-490-सभी सलैयतें थीं हम में

सभी सलाईतें थीं हम में, बेरुखी का एक हुनर न था,

वो सीख लिया तुमसे, उसके बगैर इश्क में गुज़र न था...(वीरेंद्र)/1-490


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-573-हर बार रिश्तों में

हर बार रिश्तों में और भी मिठास आई है,
जब भी बाद रूठने के तू मेरे पास आई है..(वीरेंद्र)/1-573

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 3 August 2014

1-250-ज़मीर को साथ रक्खूं

ज़मीर को साथ रक्खूं तो, चलूँ कैसे वक्त के साथ, 

इस दौर में बा-वफ़ा रहूँ तो, रहूँ मै किसके साथ...(वीरेंद्र)/1-250


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-344-शनासाई में आप खुश न थे

शनासाई में आप कुछ खुश न थे मुझसे,

अच्छा है मुझे 'अजनबी' बनाया आपने,

चाहत पर  कुछ भी अख्तियार नहीं था मेरा,

अच्छा है तिशनगी को न बढ़ाया आपने. ..(वीरेंद्र)/0-344


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-249-"रात आती है तो परछाईं

रात आती है तो परछाईं चली जाती है,

तुम आती हो तो तन्हाई चली जाती है,

जब जब चाहा तुम्हे ख्वाबों में देखना,

क्या पता मेरी नींद कहाँ चली जाती है...(वीरेंद्र)/0-249


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-248-"आगए तुम ज़िन्दगी में

आगए तुम ज़िन्दगी में, तो ख्वाब की क्या ज़रुरत है,

चांदनी मिल रही तुमसे, तो चाँद की क्या ज़रुरत है,

झूंटी तारीफ़ करना मेरी कतई आदत नहीं ऐ हमदम,

कह रहा  हूँ मै बस वही, जो मुझे लग रहा हकीकत है....(वीरेंद्र)/0-248


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-149-दुनियां इतनी मतलबी क्यों

दुनियां इतनी मतलबी क्यों है,

जान कर भी, अजनबी क्यों है,

पी गया हूँ कितने घूँट ग़मों के,

फिर, इतनी तिशनगी क्यों है...(वीरेंद्र)/0-149


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-247-"ना मै तेरी यादों में आया

ना मै तेरी यादों में आया, ना ख्वाबों में आया,
तेरे प्यार में, ये दिल भी कहाँ सुकून में आया,
मै करता रहा इंतज़ार, सवालों के जवाब का,
पर वो न तेरे लब पे आया न निगाहों में आया. ..(वीरेंद्र)/0-247

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")