Thursday, 17 April 2014

0-109-"महल वालों का महल देखो


महल वालों का महल देखो, तो बड़ा आलीशान लगता है,

दिलों में झांको तो दिल एक आरास्ता शमशान लगता है,

एहसासात और ख़ुलूस की कोई जगह मखसूस नहीं होती,

न जाने क्यों प्यार भी उनका बस एक एहसान लगता है..(वीरेंद्र)/0109 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 15 April 2014

1-569-फासले भी हो गए और

फासले भी हो गए और फैiसले भी जिंदगियों के,

दिल मगर फिर भी बेइमान क्यों हुआ जाता है...(वीरेंद्र)/1-569


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Saturday, 12 April 2014

1-482-" रोज़ नज़र आता है

रोज़ नज़र आता है जो वो तो बस चाँद होता है,

मुद्दत बाद जो दिखाई दे वो ईद का चाँद  होता है...(वीरेंद्र)/1-482



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-017-"चेहरे पर आपके जो ज़ुल्फ़

चेहरे पर आपके जो ज़ुल्फ़ बिखर आई है,

ज़हन में मेरे फिर एक ग़ज़ल उभर आई है...(वीरेंद्र)/1-017



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-434-"झूंटी मुहब्बत की परवाज़

झूंटी मुहब्बत की परवाज़ से थक गया था मै भी,
अच्छा किया तूने, जो मेरे तमाम पंख क़तर डाले. ..(वीरेंद्र)/1-434

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 8 April 2014

1-043-"अजनबियों की भीड़ में घुट

अजनबियों की भीड़ में घुट गया था दम मेरा,

किस्मत से अब मयस्सर हुई हैं ये तन्हाइयां. ...(वीरेंद्र)/1-043


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 6 April 2014

0-428-"ना टप टप आवाज़, न

ना टप-टप आवाज़, न दीखे पानी कहीं,

क्या कभी ऐसी भी होती है बारिश कहीं,

आजाती है जब याद उस मंज़र की,मुझे,

आंसू नहीं गिरते, जज्ब हो जाते हैं वहीँ..(वीरेंद्र)/0-428


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-353-"आज मेरे मन में जाने क्या

आज मेरे मन में जाने क्या चल रहा है,

उदास दिल रह रह कर क्यूं जल रहा है,

उमीदों के सब चराग बुझा कर बैठी थी,

फिर कोने में एक दीया क्यूँ जल रहा है. ...(वीरेंद्र)/0-353


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-218-"दोनों बड़े प्यारे लग रहे हैं,

दोनों बड़े प्यारे लग रहे हैं,

बहुत ही न्यारे लग रहे हैं,

गुलाब की पंखुड़ियों जैसे,

होठ गुलाबी ये लग रहे हैं,

मात्र उपस्थिति से आपकी,

पेड़-पोधे, फूल खिल रहे हैं,

प्रतीक्षा में, पिंजरे के पंछी,

उड़ जाने को, मचल रहे हैं,

ले कर तुम्हारा ही संकेत,

ये सब नज़ारे बदल रहें हैं,...

यूं न बैठो तुम गुलशन में,

हवाओं के रुख बदल रहे हैं. ....(वीरेंद्र)/2-218


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-326-"सोचा था इस महीने से

सोचा था इस महीने से 'छोड़' देंगे,

स्वास्थ्य की ओर कुछ ध्यान देंगे,

चुनावी-उत्सव अभी आने को है,

प्रत्याशी अब हमें छोड़ने कहाँ देंगे. ..(वीरेंद्र)/0-326



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-372-"टूटे हुए आइनों में भी,

टूटे हुए आइनों में भी, चमक रह जाती है,

बेवफा में भी थोड़ी सी चाहत रह जाती है,

आँख से आंसू बहने बंद भी हो जाएँ अगर,

आँख में नमी, दिल में कसक रह जाती है, ...(वीरेंद्र)/0-372


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Saturday, 5 April 2014

2-217-"सागर की सीमा, पर्वत की

सागर की सीमा, पर्वत की सीमा,

संसार में प्रत्येक वस्तु की सीमा,

किन्तु शायद एक अपवाद भी है,

नहीं है प्रेम की मेरे कोई भी सीमा ...(वीरेंद्र)/२-२१७ 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-216-"लगता है मुझको आकाश कला

लगता है मुझको आकाश काला, यह नीला तो नहीं है,

लटका है जो टुकड़ा आकाश में, वह चन्द्रमा तो नहीं है,

तुम यहाँ नहीं प्रिये, तो कुछ भी लुभाता नहीं दिल को,

दुनियां कहती है स्वर्ग इसे पर मुझे दीखता तो नहीं है.....(वीरेंद्र)/२-२१६ 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


2-214-"काश दिलों के भी आम चुनाव

काश दिलों के भी आम चुनाव हो जाया करते,

झूंटे वादों के भी हिसाब किताब हो जाया करते,


गए पांच साल में कितनी भी चोटें मिला करतीं,

ऐन वक्त पे जज्बातों के गड्ढे भर जाया करते,


अफ़सोस, अपना इतना नसीब कहाँ है "वीरेंद्र",

हम तो दिलों के चुनाव में यूंही हार जाया करते,


हमारे दिल की तो ज़मानत भी ज़ब्त हो जाती,

और लल्लू पंजू दिल ही बस जीत जाया करते.....(वीरेंद्र)/२-२१४ 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-25A-"मेरा दिन तुझसे,

मेरा दिन तुझसे,

मेरी रात तुझसे,

तुझे कैसे खो दूं,

मेरा साथ तुझसे,

तुझे कैसे भुलाऊँ,

मेरा ख्वाब तुझसे,

तुम ही मेरा साज़,

इसमें आवाज़ तुझसे,...(वीरेंद्र)/2-25A 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-256-"अश्रुओं को तुम ना रोको

अश्रुओं को तुम ना रोको,

ये ग़मों की निशानियाँ हैं,

इन्हें बहने देना ही अच्छा,

ये बीत चुकी कहानियां हैं....(वीरेंद्र)/2-256


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-193-"जो नेता कल तक घोर

जो नेता कल तक घोर सांप्रदायिक थे,

आज सेक्यूलर खुद को कहने लगते हैं


बदल लेते हैं रातों रात विचार-धारा,

जब चुनावी टिकिट कटने लगते हैं.


कम्यूनल  बन जाते हैं सेक्यूलर,

पार्टी के टिकिट जब बंटने लगते हैं.


अभद्र गालियाँ मुंह में वही पुरानी,

केवल खाने वाले बदलने लगते हैं,


भ्रष्टाचार मिटाने आते हैं जोश से,

भ्रष्टाचार स्वयं वो करने लगते हैं,


दंगों की आज भर्त्सना करने वाले,

कल उन्हीं की वकालत करने लगते हैं


कल तक जो थे तथा कथित सेक्यूलर,

बदल पाला धार्मिक उत्पात मचाने लगते हैं, ...(वीरेंद्र)/२-१९३ 


रचना: वीरेंद्र  सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 1 April 2014

0-411-"आजिज़ ज़िन्दगी से मै आ रहा

आज़िज़, ज़िन्दगी से मै आ रहा हूँ,

प्यार में धोखे पे धोखे मै खा रहा हूँ,

आज मै वो गुनाह करना चाहता हूँ,

सज़ा जिसकी पहले से मै पा रहा हूँ...(वीरेंद्र)/0-411


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")