Saturday, 29 March 2014

0-305-"नज़दीक हुआ जा रहा हूँ,

नज़दीक हुआ जा रहा हूँ मै हकीकत के,

ख्वाबों में और जीने को मन नहीं करता,

आ जाना चाहता हूँ,  अब मै साहिल पे,

गहराई में और जाने को मन नहीं करता. ....(वीरेंद्र)/0-305


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-451-"मैंने कर दिया अपनी चाहतों

मैंने कर दिया अपनी चाहतों को दफ़न,

अब तू भी तो मुझे ज़रा भूल कर दिखा ..(वीरेंद्र)/1-451


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-427-"क्यों पूछते हो हमसे जुदाई

क्यों पूछते हो हमसे जुदाई का आलम,

हमने तुम्हे न रुलाने की कसम खाई है..(वीरेंद्र)/1-427


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 26 March 2014

1-567-जन्नत के नहीं थे वो ख्वाब

जन्नत के नहीं थे वो ख्वाब जो देखे थे मैंने,
पूरे नहीं हुए तो न सही, मुझे मलाल भी क्यों हो..(वीरेंद्र)/1-567

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी")

1-463-अब क्यों नहीं आतीं

अब क्यों नहीं आतीं हवाएं तेरी महक लेकर,
क्या इन हवाओं का रुख कुदरत मोड़ रही है...(वीरेंद्र)/1-463

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-462-":उमीदों के चराग क्यों

उम्मीदों के चराग क्यों जले जा रहे हैं,
क्या उनके आने के इम्कान बढ़ते जा रहे हैं...(वीरेंद्र)/1-462

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


1-445- तू आ जाय तो बात और है


तू आ जाय तो बात और है, मगर मुझे इंतज़ार नहीं है.
अपनी किस्मत पे मुझे विसाले-यार का एतबार नहीं है..(वीरेंद्र)/1-445

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-563-शर्मिंदा हूँ मेरे जज़्बात मेरे


शर्मिंदा हूँ मेरे जज़्बात मेरे एहसासात, मैंने तुम्हे बहुत रुलाया है,

तुम तो बेहद नाज़ुक थे फिर भी मैंने तुम्हे पत्थरों से टकराया है..(वीरेंद्र)/1-563


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-442-मेरे महबूब मुझे तनहा

मेरे महबूब मुझे तन्हा न कर आज की रात,
अकेले ख्वाब देखने की मेरी आदत नहीं है..(वीरेंद्र)/1-442

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-431-"बहर में रह कर भी

बहर में रह कर भी हमेशा मै तिश्नगा रहा,
यही है हकीकत, मुझे कोई गिला ना रहा...(वीरेंद्र)1-431

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-430-सुपर्दे ख़ाक किया उन्होंने

सुपुर्दे ख़ाक किया उन्होंने जब से दिल हमारा,
फूँक-फूँक के हम रखने लगे हैं हर कदम हमारा ...(वीरेंद्र)/1-430

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


0-146-"जब भी ज़िन्दगी में मेरी

जब भी ज़िन्दगी में मेरी, कोई ख़ुशी आई है,

फ़ौरन ही कीमत उसकी, मैंने बड़ी चुकाई है,

छुपाकर रक्खे थे दिल के दर्द मैंने अभी तक,

ज़ाहिर किये जबसे, जान पे बन मेरी आई है...(वीरेन्द्र)/0-146


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-246-"इस दुनिया से मुंह मोड़

इस दुनियां से मुंह मोड़ सकता हूँ,

जन्नत की मन्नत छोड़ सकता हूँ,

जुड़ गया है जो मुझसे तेरा रिश्ता,

उसको मै भला कैसे तोड़ सकता हूँ...(वीरेंद्र)/0-246


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-447-क्यों न अब 'वफ़ा' पर ही

क्यों न अब 'वफ़ा' पर ही लिखना शुरू कर दूं,

उनको बेवफा हुए तो अब ज़माना गुज़र गया.


अरमानों को अब क्यों न हवा दे दूं "वीरेंद्र",

उनको घोटे हुए भी तो अब अरसा गुज़र गया..(वीरेंद्र)/0-447



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-476-"बेवफाई पर उसकी, आज खुद

बेवफाई पर उसकी खुद ही खामोश हो गया दिल,

वरना कब से शोर मचा रक्खा था उसके नाम का..(वीरेंद्र)/1-476


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-010-"कुछ दिन से मैंने कुछ नया

कुछ दिन से मैंने कुछ नया लिक्खा नहीं है,

कई दिन से तूने भी तो कोई दर्द नया दिया नहीं है...(वीरेंद्र)/1-010

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Saturday, 22 March 2014

2-248-"इंसान को तब ही समझ

इंसान को तब ही समझ में जीवन का सार आता है,

जब वह ज़माने से तो जीत, और खुद से हार जाता है..(वीरेंद्र)/2-248


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-481-"आज कल आप यह कैसी

आज कल आप यह कैसी बेरुखी दिखाते हैं,

नाराजगी हमसे, पर हमारे दिल को जलाते हैं...(वीरेंद्र)/1-481


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-486-"मौत ने हमें फिर भी

मौत ने हमें फिर भी किनारे पर ला दिया,

वर्ना ज़िंदगी तूने तो हमें डुबा ही दिया था...(वीरेंद्र)/1-486


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-450-प्यार और वफ़ा जब जब

प्यार और वफ़ा जब जब ज़िन्दगी से जाने लगते हैं,

जिद और अहंकार दिलो-दिमाग पर छाने लगते हैं,

हमेशा हम मशगूल हो जाते हैं इलज़ामात लगाने में, 

इंसानों की लड़ाई में, दोनों मासूम सजा पाने लगते हैं..(वीरेंद्र)/0-450



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-480-"और कब तक करता रहूँ

और कब तक करता रहूँ मै इंतज़ार तेरे लिए,

ज़माने से कबतक बचाके रक्खूं प्यार तेरे लिए...(वीरेंद्र)/1-480


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-479-"शुक्र है आपके सिर्फ ख्वाबों

शुक्र है हम आपके सिर्फ ख्वाबों में बेअख्तियार हुए,

क्या हुआ होता अगर हकीकत में बे-लगाम हो जाते..(वीरेंद्र)/1-479


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-449-ये ज़ुल्म ठहरा फ़क्त इम्तिहा

ये ज़ुल्म ठहरा फ़क्त इम्तहां के नाम पर,

इम्तहाँ की भी तो एक इन्तहा होती है।



क्यूँ रखे है 'वीरेंद्र' अब कोई भी आरज़ू,

बीमार की तबियत और परेशाँ होती है। ..(वीरेंद्र)/0-449



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 21 March 2014

0-077-"रात के अँधेरे में जुगनुओं

रात के अँधेरे में, जुगनुओं से झिलमिलाता आँगन,

सूरज की रौशनी में, फूलों से खिलखिलाता आँगन,

बुरी नज़र वालों, मैंने भला क्या बिगाड़ा था तुम्हारा,

क्यों छीन लिया तुमने मुझसे मेरी हसरतों का आँगन....(वीरेंद्र)/0-077


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-247-"मै उतर जाऊं, थोड़ी

मै उतर जाऊं, थोड़ी जगह तो कर ले दिल में,

करके भीड़ कम, थोड़ी तन्हाई तो कर ले दिल में..(वीरेंद्र)/1-247


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-341- दिल से तुम्हे निकाल दूं

दिल से तुम्हे निकाल दूं मगर खाली दिल का मै क्या करूँ,

तुम नहीं मेरे दिल में ,तो इन धडकनों का भी मै क्या करूँ,

याद आता है हर वो हसीं लम्हा, जब तुम मेरे हमसफ़र थे,

तुमने सफ़र ख़त्म कर दिया, उसकी यादों का मै क्या करूँ,...(वीरेंद्र)/0-341


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-108-"सच है हर इंसान बदल

सच है, हर इंसान बदल जाता है,

जब उसे कोई और मिल जाता है,

अँधेरा क्यों ना चला आए भला,

जब शाम को सूरज ढल जाता है..(वीरेंद्र)/0-108


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

Thursday, 20 March 2014

2-286-सीमाओं ने मुझको भ्रमित



सीमाओं ने मुझको भ्रमित कर दिया, 

परिभाषाओं में ही सीमित कर दिया,

मै उड़ान भर चुका था आकाश की ओर,

पर किसी ने पंखों को सीमित कर दिया...(वीरेंद्र)/2-286




रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-285-बचपन तो अब वापस

बचपन तो अब वापस मुझको कहाँ मिलेगा, 

क्यों न उसे याद करके ही बस खुश हो जाऊं,

जीवन की भागा दौड़ी से वक्त कहाँ मिलेगा,

क्यों न कुछ पल मीठी कल्पनाओँ में खो जाऊं..(वीरेंद्र)/2-285




रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-478-"निकाल भी फेंको अब

निकाल भी फेंको अब, मेरी यादों को दिल से,

क्यों रखते हो बोझ, फालतू बातों का दिल पे...(वीरेंद्र)/1-478 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

1-477-"मुख़्तसर ही सही, पर

 मुख़्तसर ही सही, पर बहुत हसींन थे वो लम्हे,

बेवफा होने से पहले, प्यार जब करते थे वो हमें...(वीरेंद्र)/1-477


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-475-"तुमसे बिछड़ कर ये ज़िन्दगी,

तुमसे बिछड़ कर यह ज़िन्दगी, ज़िन्दगी न रही,

कहने को है ज़िन्दगी, पर इसमें दिलकशी न रही..(वीरेंद्र)/1-475


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-474-"तुझे भुला तो दूं, तेरे चेहरे

तुझे भुला तो दूं, तेरे चेहरे को भुलाऊँ कैसे,
दिल में लिखा जो तेरा नाम मिटाऊँ कैसे...(वीरेंद्र)/1-474

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-284-यहाँ वहां चारों ओर


यहाँ वहां चारों ओर प्रगति दिखती है,

इन्सां को मंगल की तस्वीर दिखती है,

जंगल पहाड़ कंक्रीट के होते जा रहे हैं,

मिटटी तो बस गमलों में ही दिखती है..(वीरेंद्र)/2-284




रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-448-अँधेरे मेरी पहचान हैं,

अँधेरे मेरी पहचान हैं, उनमे खो नहीं जाऊँगा,

तन्हाई मेरा ठिकाना है,वहां मिल ही जाऊंगा,

मुझे मत तलाशना कभी रौशनी जलाकर तुम,
अँधेरा कर दोगी तो तुम्हे मै मिल ही जाऊंगा,..(वीरेंद्र)/0-448


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-246-"न तेरी बेवफाई का गम

न तेरी बेवफाई का गम, न तुझसे बिछड़ने का मलाल,

बस हर रोज़ मरा करता हूँ तुझे भूलने की जद्दोजहद में,..(वीरेंद्र)/1-246


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-245-"मुझे मालूम था तुम न

मुझे मालूम था तुम न दोगे पलट कर मुझे आवाज़,

मैंने खुद को तुम्हारी निगाहों से ओझल कर लिया..(वीरेंद्र)/1-245 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 19 March 2014

2-213-"क्या होगी ज़रुरत, इस बार

क्या होगी ज़रुरत, इस बार लट्ठमार होली की,

जब सारे साल है, भरमार लट्ठमार बोली की,

न फेंको रंगों-गुलाल, जब उछल रही कींचड,

पिचकारी से निकल रही है बौछार गोली की,

हुल्लियारों का हुडदंग मस्ती एक दिन की थी,

पर अब तो ,ये है दिनचर्या गुंडों की टोली की,

नीले पीले हरे नारंगी गुलाबी रंग होली के हैं,

लाल रंग हुई निशानी खुनी दंगों की होली की,

अब किधर रह गई ज़रुरत लट्ठमार होली की....(वीरेंद्र)/२-२१० 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-307 बुरा कोई धर्म नहीं

बुरा कोई धर्म नहीं होता,

धर्म के ठेकेदार बुरे होते हैं,

इंसान अधर्मी बन जाता है,

उसके जब विचार बुरे होते हैं....(वीरेंद्र)/२-307


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-209-"सीमाओं में बंधा, बंधनों में

सीमाओं में बंधा, बंधनों में जकड़ा,

तोलमोल द्वारा तराजुओं में तुला,

जड़वत पाषाण, पत्थर सा निष्प्राण,

संवादहीन शब्दहीन भावना विहीन,

एहसासों-दर्द से रिक्त, संवेदनहीन,

मानकों व् प्रतिबंधों का सिलसिला,

शब्द परिभाषित, शर्तें पूर्व निर्धारित,

जहाँ सबकुछ मापदंडों पर आधारित,

मुझे ऐसे प्यार का है उपहार मिला.....(वीरेंद्र)/२-२०९ 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-208-"सीमा में न बांधो

सीमा में न बांधो, मेरे निश्छल प्यार को,

परिभाषित न करो मेरे ह्रदय-उदगार को,

निष्पाप निर्बाध नैसर्गिक प्रेम है हमारा,

मिथ्या न मानो चाँद-चांदनी के प्यार को....(वीरेंद्र)/२-२०८ 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-207-"अजनबी सा, अनजान सा,

अजनबी सा, अनजान सा,

शरीफों में कुछ बदनाम सा,

भूखा सा, और प्यासा सा,

आंसूं नहीं पर रुआंसा सा,

सिसकता, दम तोड़ता सा,

फटे चिथड़ों को जोड़ता सा,

वक्त की मार खाया सा,

अपनों का सताया सा,

रस्ते में पड़ा ढेला सा,

बेवफाई के थपेड़े झेला सा,

बाहर से कुछ जुड़ा सा,

अन्दर से मगर टूटा सा,

मसले-कुचले हुए फूल सा,

फूल से निकाल फेंके शूल सा,

मेरा रिश्ता पड़ा रहा कोने में,

जैसे कोई अस्तित्व फ़िज़ूल सा. ...(वीरेंद्र)/२-२०७ 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 18 March 2014

2-204-"प्यार का मैंने, बस ख्वाब ही

प्यार का मैंने बस ख्वाब ही ख्वाब देखा,
सवाल ही सवाल किये, जवाब नहीं देखा,
शब्दों ने खो दिए अर्थ, भाव हो गए व्यर्थ,
मेरे हाथों में ही ना थी, कोई प्रेम की रेखा.....(वीरेंद्र)/२-२०४ 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-203-"मेरे दिल की बात न

मेरे दिल की बात, न समझी तुमने,

मेरे मासूम दिल को क्या समझोगे,

बहते हुए मेरे अश्क, न देखे तुमने,

मेरे जज़्बात को भला क्या समझोगे,

सामने रख दी मैंने दिल की किताब,

क्या पता तुम कभी खोलकर देखोगे ...(वीरेंद्र)/२-२०३ 



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


2-202-"शरद ऋतू आगमन

शरद ऋतू आगमन, और चिर-प्रतीक्षित अभिसार,
चंचल दामिनी का स्मरण कराता प्रेयसी का श्रृंगार,
स्पर्श से झंकृत होता तन, मन में होती एक झंकार,
अनदेखा अनसुना अलौकिक ये कैसा विद्युत् संचार ..(वीरेंद्र)/२-२०२ 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-201-"आज तक न आया उसे

आज तक न आया उसे मेरे प्यार पर यकीं,

उसका क्या कसूर, मेरे ही प्यार में रह गई कुछ कमी,..(वीरेंद्र)/२-२०१ 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-200-"मेरे सपनों की अप्सरा

मेरे सपनों की अप्सरा, आज आ गई हकीकत में,
अगाध प्रेम की तीव्र धारा बह निकली फुरसत में,
हुआ प्रणय निवेदन, बाहों का अनवरत आलिंगन,
अवांछित प्रकाश भागा, रौशनी मंद पड़ी दीपक में,....(वीरेंद्र)/२-२०० 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-199-"कुछ खुशियाँ दे जाओ,

कुछ खुशियाँ दे जाओ,

कुछ खुशियाँ ले जाओ,

रास्ते में काम आएँगी,

यादें ये साथ ले जाओ,....(वीरेंद्र)/२-१९९ 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-197-"उर में प्रवाहित भावनाओं पर

उर में प्रवाहित भावनाओं पर, बाँध मै कैसे बना दूं,

स्वप्रस्फुटित प्रेम-वेग पर, सीमा-रेखा कैसे बना दूं,

तुम्ही मेरी प्राण, तुम ही हो मेरी आत्मा अब प्रिये,

तुम्हे खो, ह्रदय में टीस बिछोह की मै कैसे लगा लूं,..(वीरेंद्र)/२-१९७ 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-158A-"जानते थे हमको, मानते

जानते थे हमको,
मानते थे हमको,
पढ़ते थे हमको,
सुनते थे हमको,
सोचते थे हमको,
समझते थे हमको,
कहाँ गए वो लोग,
अब दीखते नहीं हमको ....(वीरेंद्र/२-१५८A

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 16 March 2014

0-245-"ये कैसा अजीब सा प्यार

ये कैसा अजीब सा प्यार मुझसे जताते हो तुम,

मै आता हूँ जितना पास, दूर चले जाते हो तुम,

शिकायतें तुम्हारी, जितनी भी दूर करता हूँ मै,

नई शिकायतें उतनी ही लेके बैठ जाते हो तुम..(वीरेंद्र)/0-245


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



0-352-" महफूज़ किया था जिस चिराग

महफूज़ किया जिस चिरागे-मुहब्बत को मैंने,

अपने ही हाथों से तुमने उसको बुझा दिया,

जुदा होना नामुमकिन था ख्वाबों ख्यालों में,

पर हकीकत में उसे मुमकिन तुमने बना दिया. .(वीरेंद्र)/0-352



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-427-"बारिशों के बाद आज मौसम

बारिशों के बाद आज मौसम खुला-खुला सा है,

पानी ही पानी है, पर मौहोल भला-भला सा है,

हवाएं हैं मंद-मंद सी और सुहानी-सुहानी सी,

पत्ते-पत्ते का रूप बारिशों से धुला-धुला सा है...(वीरेंद्र)/0-427



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-078-"चाँद नहीं तो चांदनी भी

चाँद नहीं, तो चांदनी भी नहीं,

सूरज नहीं, तो रौशनी भी नहीं,

चाँद सूरज के बिन चलेगा काम,

मगर तू नहीं, तो कुछ भी नहीं...(वीरेंद्र)/0-078



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-426-"सुना है ख़ामोशी भी होती है

सुना है ख़ामोशी भी होती है एक जुबां, 

निगाहें भी कर देती हैं, सब कुछ बयाँ,

छिन गया हो जिससे नज़रे-करम भी,

कोई क्या समझेगा उसकी मजबूरियां....(वीरेंद्र)/0-426



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-145-"ऐसे रिश्ते भी किस काम के

ऐसे रिश्ते भी किस काम के, जो अधर में लटक रहे हैं,
किस मंजिल की तलाश में, हम यहाँ-वहां भटक रहे हैं,
मिलके हम काट क्यों नहीं देते उस बचीखुची डोर को,
पकडकर जिसे इतने बरस से, हम बेकार घिसट रहे हैं...(वीरेंद्र)/0-145

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-244-"कभी तुम आऐ कभी

कभी तुम आए कभी तुम्हारे ख्यालात आ गए,
प्यार की जिंदगी में कैसे कैसे लम्हात आ गए,
अभी तो तमाम दिलकश मौसम आके गए थे,
तुम हो कि फिर से संग लेकर बरसात आ गए....(वीरेंद्र)/0-244

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

3-39-"चाँद को निहार तो लूं


  1. चाँद को निहार तो लूं, मगर पा सकूं ये संभव तो नहीं,

    चांदनी बिखर भी जाए, मै समेट लूं, ये संभव तो नहीं,

    तुम्हारे-मेरे बीच की दीवार धुंधले कोहरे की हो जाय,

    और गिरने पर उसके मै तुम्हे पा सकूं ये संभव तो नहीं ..(वीरेंद्र)३-३९ 

  2. रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")