Saturday, 22 February 2014

2-196-"तुम किसी चाँद से बढ़कर


नहीं मुकाबला चाँद का तुमसे,

तुम किसी चाँद से बढ़कर हो,

चाँद तो दूर बसता है , मगर,

तुम मेरे ह्रदय में बसती हो,

चाँद दुनियां का चहेता होगा,

पर तुम तो बस मेरी प्रेयसी हो,

घटता बढ़ता है वजूद चाँद का,

अपरिवर्तित है अस्तित्व तुम्हारा,

चाँद देता होगा चांदनी जग को,

मेरा जीवन तो तुम रोशन करती हो...(वीरेंद्र)/२-१९६ 



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

2-195-"कुदरत के दस्तूर में दखल

कुदरत के दस्तूर में दखल करते ये लोग,
कलियों को कोख में कुचलते बेख़ौफ़ लोग,
मज़हब की आड़ में घूमते ये बेख़ौफ़ लोग,
रोक लें इनको,वो रहनुमा कहाँ हैं, कहाँ हैं,

अज्मतें अब लुटने लगी हैं सड़कों पर भी,
बहिन बेटी अब नहीं महफूज़ घरों में भी,
बिकते थे वोट, अब बिकती हैं सरकारें भी,
रोक ले इनको, वो रहनुमा कहाँ हैं, कहाँ हैं.....(वीरेंद्र)/२-१९५

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

2-194-"मुझे दृढ विश्वास था

मुझे दृढ विश्वास था, तू आएगी,

अपने साथ रौशनी ज़रूर लाएगी,

बुझाकर बैठा था मै चिराग सभी,

मुझे क्या पता था, तू ना आएगी....(वीरेंद्र)/२-१९४


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

2-193-"सत्तासीन पार्टी को हम ज़ालिम

सत्तासीन पार्टी को हम ज़ालिम भला कैसे कह दें,
हमें खुद ज़ुल्म सहने की आदत जो हो गई है,

कटे हुए हाथ को हम वोट भला क्यों न दे दें,
हमें अपने हाथ कटाने की आदत जो हो गई है,

सब्जी अनाज गैस की महंगाई का क्या रोना,
हमें प्याजहीन सब्जी की आदत जो हो गई है,

जन लोकपाल आदि की हमें अब क्या ज़रुरत,
हमें अब बड़े घोटालों की आदत जो हो गई है,

चाहे गर सरकार तो  अब भी लगा दे इमरजेंसी,
हमें अब आपात-काल की आदत जो हो गई है,

जीत ही जाने दो, ये चुनाव भी इन्हीं लोगों को, 
देश को भ्रष्टाचार झेलने की आदत जो हो गई है,

उदासीन हो गए हम शायद ,परिवर्तन नहीं चाहते,
हमें आजमाए को आजमाने की आदत जो हो गई है,

कौन रोकेगा भला चुनाव जीतने से उन लोगों को,
हमें मतदान ना करने की आदत जो हो गई है,  .....(वीरेंद्र)/२-१९३ 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')


1-557-ता-उम्र दीं बद-दुआएं

ता-उम्र दीं बद-दुआएं जिन्होंने वो अब रहम कुछ-कुछ खाने लगे हैं

वक्त-ऐ-आखिरी में हम भी अब ज़िन्दगी को कुछ-कुछ चाहने लगे हैं..(वीरेंद्र)/1-557
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

2-189-"छोटी सी बात पर तोड़ दिया

छोटी सी बात पर तोड़ दिया तुमने रिश्ता,

कोई बड़ी बात होती तो न जाने क्या  करते. ...(वीरेंद्र)/२-१८९ 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 19 February 2014

3-56-"मेरे ये नादाँ आंसू बेपेंदी

मेरे ये नादाँ आंसू बेपेंदी के लोटे हैं,

किसी के लिए भी ये लुढ़क जाते हैं,


पहचानते नहीं जज्बात को किसी के,

जिसने चाहा उसके लिए आ जाते हैं,


इन्हें पहचान नहीं है इंसानों की भी,

संग-दिलों के लिए भी निकल आते हैं,


मेरे दिल का गम दीखता नहीं इन्हें,

हर ऐरे-गेरे के लिए पिंघल जाते हैं,


मैंने हँसना चाहा जब-जब भूले से,

गालों पर ये निर्दयी बह जाते हैं,


ये मेरे नादाँ आंसू बेपेंदी के लोटे हैं,

किसी के लिए भी, ये लुढ़क जाते हैं...(वीरेंद्र)/३-५६


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

3-26-"जुल्फों की शानो-शौकत

जुल्फों की शानो-शौकत देखिये,
पड़ी हैं वहां, जहाँ सुकून है मिले,
गुलनार हो रहें हैं होंठ इतना,
कि वर्के-गुलाब भी शरमा जाए,
संगे-मर्मर सी तराशी हुई गर्दन,
जैसे एजाज़े-नूर देख लिया कोई,
कभी झुकती है, तो कभी उठती है,
नागुफ्ता-बेह है, निगाहें उसकी.......(वीरेंद्र)/३-२६ 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

3-21-"सभी कहते हैं, खंजर भोंका

सभी कहते हैं खंजर भोंका है, बेवफा ज़माने ने,

क्यूं भूलते हैं वो भी शामिल हैं बेवफा ज़माने में,



कब तलक कोसोगे तुम यूं ही, इस ज़माने को,

भूल गए, खुशियाँ भी लूटीं तुमने इस ज़माने में,



बेवफा कोई बेसबब बनता नहीं, हम ही बनाते हैं,

उठाता है खंजर कभी कभी अपनी जान बचाने में,



सितम, बेवफाई, बेरुखी की बातें क्यूं करते हैं वो,

जिनकी उम्र पूरी बीत गयी, बस ज़ुल्म ही ढहाने में.



ज़माने को आजमा कर क्या हुआ हासिल तुम्हे,

क्या जाता है अब ज़रा खुद को भी आजमाने में .....(वीरेंद्र)/३-२१ 



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

3-14-"एक तरफ जीस्त और पूरी

एक तरफ जीस्त और पूरी कायनात,

एक तरफ जन्नत, और आबे-हयात,

दूसरी तरफ, तेरे हसीं आगोश में बीते,

चंद मुख़्तसर से वो यादगार लम्हात,

मुमकिन है, खुद को भुला देना मगर,

मै कैसे भुला दूं, वो दिलकश मुलाकात....(वीरेंद्र)/3-14



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

3-13-"अजब दस्तूर दुनिया के

अजब दस्तूर दुनियां के समझ में आते नहीं,
हम अच्छे हों दिल के , पर बुरे बन जाते हैं,

वो लियाकत कहाँ से लाएं हम, जिससे,
दुश्मन भी लोगों के अच्छे बन जाते हैं,

दोस्त करे तारीफ तो कद्र नहीं करते लोग, 
दुश्मन करे तो झट मुतास्सिर हो जाते हैं,

निकालके रख दें जान भी हम अपने शेरों में,
फर्क नहीं, गैरों को दाद देते वो थक जाते हैं,

कहते हैं गुस्से में हम करते हैं शायरी अच्छी,
शायद इसीलिए अक्सर हमें वो तडपते हैं,

ह्क़मने भी तय कर लिया , शायरी करेंगे ही नहीं,
अब हम भी देखें कितने दिन वो रह पाते हैं............(वीरेंद्र)/३-१३

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

3-11-"दिल के हाथों इंसान बेहद

दिल के हाथों इंसान बेहद मजबूर रहता है,

इसलिए किसी ने इसे 'कमबख्त' ठीक ही कहा है,

अपनी मर्ज़ी से इंसान रो, सो और जाग नहीं सकता,

हर वक्त हर बाद को इससे ही पूछना पड़ता है,

कभी भी छोड़ देता है साथ, चल देता है अपनी राह,

जिद करता है, कुछ नहीं सुनता, ज्यादा कहो तो रो पड़ता है,

दिमाग तो खुदा ने इस कमबख्त को दिया ही नहीं,

फिर भी बहस ये दुनिया भर की करता है,

ये सिर्फ कमबख्त ही नहीं 'कमीना 'भी है,

जो देते हैं ज़ख्मो-गम इसे, ये वकालत उन्हीं की करता है...(वीरेंद्र)/३-११


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

3-9-"तुमसे ज़रा दूर रहो तो

तुमसे ज़रा दूर रहो तो मुसीबत,

करीब आजाओ तो भी मुसीबत,

तुम्हारी बात मानो तो मुसीबत,

अगर न मानो तो भी मुसीबत,


तुम, तुम न हुए ज़माना हो गए,

जिसके साथ चलो तो मुसीबत, 

अगर न चलो तो भी मुसीबत,

यार ये ज़िन्दगी है ही मुसीबत ..(वीरेंद्र)/3-9



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

0-445-"चेहरे ही क्या, जुबां


चेहरे ही क्या, जुबां भी बदल जाती है,
दिल के संग निगाह भी बदल जाती है,
वक्त भी खूब देता है शह कुछ लोगों को,
उनकी पूरी दुनियां ही बदल जाती है .....(वीरेंद्र)/0-445


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

3-45-"मेरे यार को ऐसा हुनर

मेरे यार को ऐसा हुनर आता है,

के मेरा क़त्ल करता है वो खुद,

इलज़ाम किसी और पे आता है,

फनाह होजाते हैं बेगुनाह ऐसे,

मेरा कलेजा मुंह को आता है,

आँखें हैं उसकी आला-ए-क़त्ल,

जिन्हें मै बरामद करवा नहीं सकता,

मकतूल हूँ, मेरी वही तो हैं दौलत,

मौत के बाद उन्हें मै गँवा नहीं सकता,

साथ देना चाहता हूँ इन्साफ का,

पर यार को भी अपने खोना नहीं सकता...(वीरेंद्र)/३-४५


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

3-51A-"आए थे जो अपने बनके

आए थे जो अपने बनके,

वह लोग कहाँ चले गए,

दोस्त तो बन न सके मेरे,

अजनबी बनकर चले गए,

कहते थे खुशियाँ भर देंगे,

दर्द और बढाकर चले गए...(वीरेंद्र)/३-५१आ


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

3-57-"मै कोई शै नहीं बस बुझी

मै कोई शै नहीं, बस बुझी राख हूँ,

मै पेड़ नहीं, उसकी झुकी शाख हूँ,


मेरे वजूद का है इस्तमाल इतना,

दीवार में लगी एक छोटी ताख हूँ,


यकीनन, मै यकीन नहीं किसीका,

हूँ तो बस महज़ एक इत्तेफाक हूँ,


चाहत करूँ  भी तो किसकी करूँ मै,

किसीका भी तो नहीं मै इन्तखाब हूँ.....(वीरेंद्र)/३-५७ 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

3-59-"यहाँ मकतूल ही नहीं मरा

यहाँ मकतूल ही नहीं मरा करते हैं,
कातिल भी यहाँ ज़रूर मरा करते हैं,

नेक इंसान मरता है बस एक ही दिन,
शैतान तो मगर हर रोज़ मरा करते हैं,

उनका जीना भी क्या जीना ज़माने में,
ज़मीर जिनके हर रोज़ बिका करते हैं,

मर मिटो तुम भी उन पर यकीनन,
जाँ कुर्बान जो तुम पर किया करते हैं,

लड़ना पड़ता है ,ज़ुल्मों के खिलाफ,
ज़ुल्मों-सितम रोने से नहीं रुका करते हैं,

हमने देखा है उन्हें खुदकशी करते हुए,
इंतकाम का रास्ता, जो चुना करते हैं,

ज़माने को बदल सकते हैं सिर्फ वही 'वीरेंद्र'
सही वक्त पे जो खुदको बदल लिया करते हैं...(वीरेंद्र)/३-५९ 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

3-61-"बेटियों पर ढहते ही जा रहें

बेटियों पर ढहते ही जा रहें हैं कहर बेहिसाब,
कुछ जन्म से पहले, तो कुछ जन्म के बाद,

हावी हैं बेख़ौफ़ इंसान-नुमा ज़ाग-ओ-ज़गन,
कब तक रहे कायम मेरा, क़ानून पे ऐतमाद,

मत करो रहम-ओ-करम की उम्मीद किसी से,
खुद ही निकलो घरों से, ख़त्म करो ये रूदाद,

खुदा तो करेगा ही जब करेगा इन्साफ, मगर 
तोड़ो होंसले हत्यारों के, न रह सकें वे आज़ाद,

ये हत्या ,अपराध नहीं सिर्फ नारी के खिलाफ,
कौम, माशरे और मुल्क के लिए हैं ये आज़ाब....(वीरेंद्र)/३-६१

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

Tuesday, 18 February 2014

1-271-"खुद तो रोई थी शबनम,

खुद तो रोई थी शबनम, कली को भी अपने संग रुला दिया,

टपका दिए आंसू कली पर, कहती है उसे गुलाब बना दिया...(वीरेंद्र)/1-271


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

Thursday, 13 February 2014

0-037-"नेमत है सेहत, मै इसको बर्बाद

नेमत है सेहत, कोई इसे बर्बाद करना नहीं चाहता,

पी लेता है शराब पर इसपे खर्च करना नहीं चाहता,

मिले मुफ्त की गर कहीं, तो मौत का भी गम नहीं,

भले आजाए मौत, मुफ्त की वो छोड़ना नहीं चाहता ..(वीरेंद्र)/0-037 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

1-457-"नदी की तरह बेबस


नदी की तरह बेबस खुद ही बह जाता हूँ,

मुहब्बत का उफान मै कहाँ सह पाता हूँ...(वीरेंद्र)/1-457



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

1-456-"शुक्र कीजिये अल्लाह का

शुक्र कीजिये उसका, किस्मत आपकी फिर भी भली है,

आग में जल जाते हैं बदन, आपकी सिर्फ ऊँगली जली है...(वीरेंद्र)/1-456



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

1-460-"दरिया क्यों बनूँ,तेरी कश्ती

दरिया क्यों बनूँ, तेरी कश्ती का पतवार क्यों न बन जाऊं,

रहूँ संग कश्ती के, दरिया बनके क्यों मै दूर निकल जाऊं..(वीरेंद्र)/1-460



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

1-244-"जो होता है जज्बाती

जो होता है जज्बाती, वो खुद से परेशान रहता है,

जो नहीं होता, उससे सारा ज़माना परेशान रहता है..(वीरेंद्र)/1-244



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

1-455-"ना आसमां पे ना रेत पे

न आसमां पर न रेत पर लिक्खो, नाम मेरा बह जायगा,

लिखना है तो अपने दिल पर लिक्खो, वहां रह जायगा..(वीरेंद्र)1-455


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

Wednesday, 12 February 2014

0-175-"मुझे मेरी ग़ज़ल का

मुझे मेरी ग़ज़ल का मौजू मिल जाय,
तेरी एक मुस्कराहट अगर मिल जाय,
मै समझूंगा अपनी शायरी मुकम्मल,
मेरे शेरों पे तेरी दाद अगर मिल जाय...(वीरेंद्र)/0-175

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')  

1-018-"एक दाद में तुम्हारा क्या

एक दाद में तुम्हारा क्या जाता
मुकद्दर कुछ हमारा भी खुल जाता..(वीरेंद्र)/1-018

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

1-562-मेरे होकर, तुम दूर भी रहो

मेरे होकर, तुम दूर भी रहो तो क्या कम है,

नज़दीक भी जो रहा, वो दूर चला जाता है..(वीरेंद्र)/1-562

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')


1-438-" मेरा मुंसिफ मेरी गुस्ताखियों ,

मेरा मुंसिफ मेरी गुस्ताखियों को नज़रंदाज़ किये जाता है, 
सज़ा पाने की उम्मीद में, गुनाह पे गुनाह मै किये जा रहा हूँ....(वीरेंद्र)/1-438

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

1-436-"तेरा शिकवा भी तेरी

तेरा शिकवा भी तेरी मुहब्बत से कम नहीं,

इसलिए, ना भी दूर हो, तो मुझे गम नहीं...(वीरेंद्र)/1-436



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

1-439-"आकाश में जाने क्या

आकाश में जाने क्या तब्दीली हुई,

सुबह होने में आज इतनी देरी हुई...(वीरेंद्र)/1-439



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

0-243-"तुम न आए मेरे साथ तो

तुम न आये मेरे साथ, तो ये राहें थम जायेंगी,

तुम छोड़ दोगे कभी हाथ,ये साँसें थम जायेंगी,

तुम्हारे होने से जारी हैं धडकनें इस दिल की,

तुम आते रहना, वरना ये धडकनें थम जायेंगी. ...(वीरेंद्र)/0-243


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')


0-424-"ज़माने से नहीं खुद से लड़ा

ज़माने से नहीं खुद से लड़ा हूँ,

ये न समझो तन्हाई में पड़ा हूँ,

हज़ारों चेहरे दीखते हैं सामने,

मै ऐसे शीश महल में खड़ा हूँ. ..(वीरेंद्र)/0-424

0-076-"तेरा साथ है तो मझधार भी

तेरा साथ है तो मझधार भी साहिल है,

टूटी कश्ती भी पार लगने के काबिल है,

ये ज़लज़ले ये तूफ़ान क्या बिगाड़ेंगे मेरा,

तू जो अब मेरी ज़िन्दगी में शामिल है. ..(वीरेंद्र)/0-076


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

0-410-"कश्ती पर हमारी इस तरह

कश्ती पर हमारी, इस तरह सवार हो लेते हैं लोग,

नहीं मिलता किनारा तो, किनारा कर लेते हैं लोग,

रह जाते हैं हम ही अकेले, ज़िन्दगी के सफ़र में,

मुस्तकबिल अपना और कोई नया ढूंढ लेते हैं लोग..(वीरेंद्र)/0-410


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

0-409-"आ ज़िन्दगी लौट ही आई

आ ज़िन्दगी लौट आई ना आखिर मेरे पास घूमफिर के,

बड़ी फुदकती, इठलाती गई थी उसकी हम सफ़र बनने को,

मैंने तो सजाया था, संवारा था, बड़े नाजों-अंदाज़ से तुझे,

तुझे ही बड़ा शौक चरमराया था क़दमों में उसके गिरने को..(वीरेंद्र)/0-409


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

3-72-जला जला के यहाँ वजूद

जला जलाके यहाँ वजूद मिटा दिए जाते हैं,

हमभी जिद्दी चराग हैं इम्तिहाँ दिए जाते हैं.



हम चरागों की किस्मत भी तो कोई देखे,

ज़रा सहर हुई नहीं कि बुझा दिए जाते हैं,



रात भर होती है इज्ज़त अफजाई हमारी,

सुबह हुई नहीं कि बस भुला दिए जाते हैं.



खौफ से कपकंपाती है रूह (लौ) हमारी,

फिरभी आँधियों में हम जला दिए जाते हैं,



मौसम को इल्म है हमारी कमजोरियों का,

फिर भी मिटाने को हमें हवा दिए जाते हैं,



नागुफ्ता ही रहने दो हमारे रंजो-गम को, 

कभी ईष्ट, कभी कब्र पर जला दिए जाते हैं,



'उम्मीदों के चराग' का नाम देकर 'वीरेंद्र'

कभी हम जलाऐ, कभी बुझा दिए जाते हैं,..(वीरेंद्र)/3-72 



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

0-423-"मै तेरी मंजिल नहीं, तू मेरी

मै तेरी मंजिल नहीं तू मेरी मंजिल नहीं,

तेरे और मेरे रस्ते उसने बनायें हैं जुदा,

फिर क्यों हैं हमराही हम, उन्हीं राहों में,

जाने ये कौन सा खेल, खेल रहा है खुदा...(वीरेंद्र)/0-423


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')
 

0-036-"किताब बंद रक्खी है दुनियां


दुनियाँ के लिए जो बंद है मेरी किताब,

वो आपके लिए कबसे खुली रक्खी है,

आपने पढने की ज़हमत नहीं फरमाई,

हर सफे पर बात आपकी  ही लिक्खी है...(वीरेंद्र)/0-36


रचना : वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

0-144-"वक्त से लड़ कर, मै खुश

वक्त से लड़ कर, मै खुश होता चला गया,

वक्त मगर अपना काम करता चला गया,

जज़्बात पर अपने मै कर ना सका काबू,

जज्बाती दरिया बन, मै बहता चला गया...(वीरेंद्र)/0-144


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

0-075-"मेरे कानों में कितनी आवाजें

मेरे कानों में कितनी आवाजें आ रहीं हैं,

बहती हवाएं सबकी आवाजें ला रहीं हैं,

बस उसकी ही आवाज़ सुनाई नहीं देती,

उसके शहर की हवाएं किधर जा रहीं हैं...(वीरेंद्र)/0-075

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

0-340-"खेल लो कुछ और वक्त

खेल लो कुछ और वक्त मेरे दिल से,

फिरतो दिल तुम्हारा भर ही जाना है,

मै भी अब क्यों करूँ परवाह इसकी,

कुछ वक्त में तो इसे टूट ही जाना है...(वीरेंद्र)/0-340


रचना : वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी') 

0-107-"दुष्टों की कुत्सित भावना को

दुष्टों की कुत्सित भावना को मत तुम हवा दो,

सांप, सांप ही रहेगा चाहे जितना दूध पिला दो,

मीठा नहीं डला दूध में, तो वो फींका ही रहेगा,

जितना मर्ज़ी आये, गिलास को तुम हिला दो...(वीरेंद्र)/0-107


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

0-143-"कौनसा बदला लेते हैं

कौनसा बदला लेते हैं प्रेम के शब्द बोलके, 
भर देते हैं दिलों में, गहरी नफरतें घोलके,
बहुत भोले बने रहते हैं तथाकथित अपने,
दे देते हैं अपनों को विष भी अमृत बोलके...(वीरेंद्र)/0-143

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

1-566-उनकी आँखें दे देती हैं

उनकी आँखें दे देती हैं झूंटी तसल्ली हमें,
खुश्क करके कुछ इस तरह अपने अश्कों को..(वीरेंद्र)/1-566

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

1-473-" खुदा तेरी अदालत में

खुदा तेरी अदालत में कभी कभी ये क्या होता है 
मकतूल ही, क़त्ल का चश्मदीद गवाह ढूंढता है..(वीरेंद्र)/1-473 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

1-472-"फनाह करने में तूने तो

फनाह करने में, तूने तो न रक्खी कमी कोई ए ज़िन्दगी,
पर देख मै सलामत हूँ, ये न पूछना मुझे बचाता कौन है...(वीरेंद्र)/1-472

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

1-471-"खुश किस्मत हैं हम

खुशकिस्मत हैं हम, खुद चली आती है तन्हाई,
वरना जाने कितने ग़मज़दा इसको तरस जाते हैं...(वीरेंद्र)/1-471

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')

1-565-आज मै रह लूँगा अंधेरों me

आज मै रह लूँगा अंधेरों में ही, तुम्हारे बिना,

अपने नूर से तुम इस जहाँ को रोशन कर दो...(वीरेंद्र)/1-565


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी').

1-470-"कभी मुहब्बतों के कभी नफरतों के

कभी मुहब्बतों के कभी नफरतों के ज़ुल्म ये दिल सहता गया,
क्यूं करता है खुद से बगावत, मुझसे मेरा ये दिल कहता गया ..(वीरेंद्र)/1-470

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-568-ये कैसी हलचल बज़्म में

ये कैसी हलचल बज़्म में, अजब सा नूर आया है,
हो न हो आज यहाँ बे-नकाब मेरा महबूब आया है. ..(वीरेंद्र)/1-568

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी"  )

1-469-"इतना मुतमईन न हो 'वीरेंद्र'

इतना मुतमईन न हो 'वीरेंद्र' इश्क में हस्ती बर्बाद करके,
ये वो इल्म है जिसमे रहते हैं और भी बड़े इम्तिहान बाकी...(वीरेंद्र)/1-469

रचना :  वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-467-"भूलने को तुझे जितना भी

भूलने को तुझे जितना भी दिल मज़बूत करता हूँ,
घूमफिर के उतना ही तुझे करीब महसूस करता हूँ..(वीरेंद्र)/1-467

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

1-466-"तुझसे मिलने के जुनूं

तुझसे मिलने के जुनूं में जब मैंने खो दिया वजूद ही कहीं,
आंधी-तूफ़ान और बिगड़े मौसम का तकाजा कुछ भी नहीं...(वीरेंद्र)/1-466

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-465-"तुम्हारा बस चलता तो तुम

तुम्हारा बस चलता तो तुम भुला ही देते हमें,
ये तो हमीं थे जो अपनी याद दिलाते रहे तुम्हे..(वीरेंद्र)/1-465

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-468-"अच्छा था गर पत्थर के

अच्छा था गर पत्थर के दिल हुआ करते. 
ना उन्हें तोड़ता कोई, ना वो टूटा करते..(वीरेंद्र)/1-468

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

Tuesday, 11 February 2014

3-62-" जहाँ में गर सब संगदिल इंसान

ना शेर होते, और ना कलाम होते,
जहां में गर सभी संगदिल इंसान होते,

दिलो में जज़्बात कभी उठते नहीं,
दर्द-ए-दिल भी क्यों बयान होते,

तारीफ-ए-हुस्न में, देने को मिसालें,
चाँद-सितारे और न ये आसमान होते,

बेवफाई बेरुखी से निजात मिल जाती,
मुहब्बतों के न इतने इम्तिहान होते,

क्यूं होते शिकवे-गिले ये शिकायतें,
जब सभी अजनबी, सभी अंजान होते,

पत्थर-दिल  चोट सह लिया करते,
खामखाँ मासूम दिल न लहूलुहान होते,

बुतों की बस्ती में भी मचता कत्ले-आम,
वहां भी 'वीरेंद्र' अगर बस गए इंसान होते... (वीरेंद्र)/(c)-3-62

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")