Tuesday, 21 January 2014

1-464-"उम्र मुफलिसी में गुजरी

उम्र मुफलिसी में गुजरी, जुबां पे सिर्फ खुदा का नाम आया,
दुआएं तो मिली बहुत, न मददगार आया, न पुर्सां-हाल आया..(वीरेंद्र)/1-464

रचना:वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

3-71-बहुत हिमायत करते थे जो

बहुत हिमायत करते थे जो शनासाई की,
खुद अजनबी बन गए हमें बेगाना बता कर,

हमने जलाया था जो चराग रौशनी के लिए,
बुझ गया वो खुदको चराग उमीदों का बता कर,

मालूम न था दिल-दिल में भी फर्क होता है,
मेरा दिल लौटा दिया उसने खिलौना बता कर,

लख्त लख्त अपने दिल का इकठ्ठा कर रहे हैं,
लिया था जो उसने अपना आइना बता कर,

दबी जुबां हमने बताया था गमे-दिल अपना,
बड़े पछताए बेदर्दों को हाल अपना बता कर...(वीरेंद्र)/3-71

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-461-"हमने आपकी ज़ुल्फ़ खुली

अपनी घनेरी जुल्फों को यूं खुला न छोडो,
रात के धोखे में हमें कहीं नींद न आ जाए..(वीरेंद्र)/1-461

रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

1-459-"सच्चे प्यार की होती कोई

सच्चे प्यार की होती कोई मंजिल नहीं,
होती है जिसकी मंजिल, वो प्यार नहीं..(वीरेंद्र)/1-459 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

1-564-मै भी संवर गया होता



मै भी संवर गया होता गर ज़माने को पहले जान लिया होता,

इतने तूफाँ न आये होते गर वक्त का तकाजा मान लिया होता..(वीरेंद्र)/1-564


रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

Saturday, 18 January 2014

1-458-"मेरी ज़िन्दगी खुशियों के

मेरी ज़िन्दगी खुशियों के इस दौर से न गुज़रती,

तू मुझसे न झगडती तो मुहब्बत इतनी न बढती. ..(वीरेंद्र)/1-458

रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

1-080-"कैसे जी लेते हैं लोग

कैसे जी लेते हैं लोग पूरी ज़िन्दगी बिन यार के,

यहाँ तो दूसरी सांस भी आने का नाम नहीं लेती. ..(वीरेंद्र)/1-080



रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

1-449-"अपने ही हाथों अपनी मुहब्बत

अपने ही हाथों अपनी मुहब्बत को तुमने ऐसा मिटाया,
कर न सका जो काम ज़माना, तुमने खुद ही कर दिखाया..(वीरेंद्र)/1-449

रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

1-454-"मुराद पूरी करने का

मुराद पूरी करने का तेरा अंदाज़ निराला है, खुदा,
मैंने तो मांगी थी मौत, तूने कर दी मुहब्बत अता. ..(वीरेंद्र)/1-454 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)



1-453-"किसी की दुआओं में ना असर

किसी की दुआओं में ना असर पैदा हुआ अब तक,

ज़िन्दगी में कितने नए साल गुज़रते चले जाते हैं...(वीरेंद्र)/1-453

रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

1-452-"मुझको न दो तुम दुआएं

मुझको न दो तुम दुआएं नए साल की,
बेअसर पड़ी हैं दुआएं पिछले साल की..(वीरेंद्र)/1-452

रचना : वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी) 

1-450-"कुछ देर और थमी रहो

कुछ देर और थमी रहो मेरी बेसब्र साँसों,
अब चंद घड़ियाँ ही बाकी हैं उसके आने में...(वीरेंद्र)/1-450

रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

1-448-"कहर सर्दी का मुझपर

कहर सर्दी का मुझ पर कुछ इस तरह बढ़ता ही गया,
जैसे दूर तुम होते गए, दर्जा-ए-हरारत घटता ही गया..(वीरेंद्र)/1-448

रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी) 

Friday, 17 January 2014

2-275-प्रेम की कोई सीमा तो न थी

प्रेम की कोई सीमा तो न थी किन्तु सीमा में तुमने बाँध दिया,

तूम्हारी सीमा मानने में, अपनी सीमा को भी मैंने लाँघ दिया.

तुम भला क्यों लेती रहती हो मेरे इतने कठिन इम्तिहान प्रिये,

मैने तो स्वयं ही तुम्हारे समस्त बंधनों को सहर्ष मान लिया...(वीरेंद्र)/2-275


रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

1-447-"ग़मों के निकलने का

ग़मों के निकलने का आँखों के सिवा कोई रस्ता न मिला,

पोंछ सकते जिससे हम आंसू, ऐसा कोई दुपट्टा न मिला...(वीरेंद्र)/1-447

रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

1-446-"आजकल तुम आकाश में

आजकल तुम आकाश में दिखाई क्यों नहीं देते,

क्या आसमान की तरफ कोई काम नहीं निकलता,..(वीरेंद्र)/1-446


रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

1-444-"पत्थर को दिल क्यों

पत्थर को क्यों लगा रहा है दिल, ऐ बुत-तराश,

सकून से रहने दे, इसे तड़पना क्यूँ सिखा रहा है..(वीरेंद्र)/1-444


रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

1-443-"इंतज़ार किया उनका, न दिन देखा

इंतज़ार किया उनका, न दिन देखा न रात,

उफ्फ तौबा उनकी जानलेवा मसरूफीयात...(वीरेंद्र)/1-443



रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

1-437-"कितनी हसीं शिकायत है

कितनी हसीन शिकायत है आपकी,
दिल करता है दूर ही ना करूँ इसको...(वीरेंद्र)/1-437

रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

1-435-"ये इज़हार है, दलील नहीं

ये इज़हारे-प्यार है, दलील नहीं,
मै आपका दोस्त हूँ वकील नहीं...(वीरेंद्र)/1-435

रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

1-433-"न लहराओ काली जुल्फों

न लहराओ काली जुल्फों को तुम इस तराह,
बड़ी मुश्किल से तो अब जाकर सहर हुई है..(वीरेंद्र)/1-433

रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

1-440-"काश यादों के भी जुबां हुआ

काश यादों के भी जुबां हुआ करती,
कुछ तो सन्नाटा वो तोड़ दिया करतीं...(वीरेंद्र)/1-440

रचना:वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

1-429-"खेल लो कुछ और वक्त

खेल लो कुछ और वक्त मेरे दिल से,
फिर तो दिल तुम्हारा भर ही जाना है..(वीरेंद्र)/1-429

रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी) 

1-428-"झेल जाता है दर्द भरे

झेल जाता है दर्द भरे तूफानों को मेरा दिल,
ये कमज़ोर रिश्ता नहीं जो पल में टूट जाय...(वीरेंद्र)/1-428

रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

1-042-"किसी ने अजनबी तो किसी

किसी ने अजनबी, तो किसी ने गुनाहगार बनाया,
जब चाहा कुचलकर दिल को, फूल से खार बनाया...(वीरेंद्र)/1-042

रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

0-440-"अजब अदा से आज वो

अजब अदा से आज वो मुझसे शरमा रहे हैं,
बरसों बाद शायद, वस्ल के दिन आ रहें हैं,
देखने लगे हैं अब कनखियों से, इस तराह,
शायद उन्हें मनाने के हमारे दिन आ रहे हैं...(वीरेंद्र)/0-440 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)


1-561-ज़मीन की किसी गर्त में


ज़मीन की किसी गर्त में वो डूबे मिले,

जिन्हें आसमां की ऊंचाइयों में हम ढूंढते फिरे..(वीरेंद्र)/1-561



रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

2-276-क्या समझें क्या आपको



क्या समझें, क्या आपको समझाएँ,

लुप्त हो चुकीं, हम सब की भावनाएँ..(वीरेंद्र)/2-276



रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

1-242-"क्यूं अटकी पड़ी है आखरी

क्यूं अटकी पड़ी है आखरी सांस तू, जा तू भी छूट जा,
दुनिया रूठी है मुझ से, ए ज़िन्दगी जा तू भी रूठ जा..(वीरेंद्र)/1-242

रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

1-241-"ना कोई हमदर्द, ना कोई

ना कोई हमदर्द, ना कोई पुरसाँ-हाल चाहिए था,
बहते अश्क पोंछने को हमें एक रूमाल चाहिए था..(वीरेंद्र)/1-241

रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

0-106-"यह माना कि लोग

यह माना लोग बदल जाते हैं,
उनके चेहरे भी बदल जाते हैं,
गीत वही, गीतों के शब्द वही,
पर उनके सुर क्यूं बदल जाते हैं. .(वीरेंद्र)/0-106

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी)

0-371-"मुझको न दे इतनी ऊंचाई

मुझको ना दे इतनी ऊंचाई,
कि तुझको न देख मै पाऊँ,
इतनी ना देना शोहरत मुझे,
कि दूर तुझसे होता मै जाऊं...(वीरेंद्र)/0-371

रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी)

0-304-"तुम्हारे बिना ये ज़िन्दगी

तुम्हारे बिना ये ज़िन्दगी बस सरकती गयी,
आंसुओं की बदली आ आ कर बरसती गयी.
जबजब इन्तेहा हो गयी तुम्हे याद करने की,
ज़ालिम यह तन्हाई मुसलसल बढती गयी....(वीरेंद्र)/0-304

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  (अजनबी)

0-242-"खामोशियों में मैंने वक्त

खामोशियों में मैंने वक्त गुज़ारा था,
तन्हाइयों में मैंने तुम्हे पुकारा था,
मै दिल की बात और किससे कहता,
आखिर तूही तो मेरा एक सहारा था. ..(वीरेंद्र)/0-242

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी "

0-142-"कुछ सफ़र ऐसे भी हैं

कुछ सफ़र ऐसे भी हैं जिनकी कोई मंजिल नहीं,
रिश्ते भी कुछ ऐसे हैं जिनका कोई हासिल नहीं, 
ख़त्म हो जाते हैं ये सफ़र, ये रिश्ते, बीच में ही,
ये वो बहते दरिया हैं जिनका कोई साहिल नहीं ..(वीरेंद्र)/0-142

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी ")

0-408-"ज़िन्दगी बड़ी खुश्क हुई जा

ज़िन्दगी बड़ी खुश्क हुई जा रही है,
हर तरफ,जैसे गमी सी छा रही है,
यह कैसा नया साल है लग गया,
गए साल की बड़ी याद आ रही है...(वीरेंद्र)/0-408

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 16 January 2014

0-105-"पाप करके भी इंसान

पाप करके भी इंसान बेशर्म बना फिरता है,
औरों को बहुत धर्म-उपदेश दिया करता है,
धर्म-कर्म से दूर दूर का सम्बन्ध नहीं कोई,
खुदको ही धर्म का ठेकेदार समझा करता है ..(वीरेंद्र)/0-105

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-303-"तुम्ही बता दो, कैसे करूँ

तुम्ही बता दो, कैसे करूँ तुम्हे याद,
तुम्हे आवाज़ देके बुला नहीं सकता,
पाबंदियां कितनी ज़माने की मुझपे,
नाम लेके रुसवाई दिला नहीं सकता, ...(वीरेंद्र)/0-303

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")