Friday, 12 December 2014

3-74 हकीकतों को अभी मंज़ूर

हकीकतों को अभी मंज़ूर कर लीजिये,

ख्वाब पूरे होते होते तो उमर हो जायगी,


दुआएं मज़लूम की हासिल कर लीजिये,

खुदा की इनायत भी आप पर हो जायगी,


कुछ देर तो अंधेरों से मुकाबला कर लीजिये,

यकीनन कुछ ही देर में सहर हो जायगी,


नफरतों की चिंगारी को अभी बुझा लीजिये,

बाद में तो ये जलता हुआ शहर हो जायगी,


नेकी की इब्तिदा तो करके देख लीजिये,

इंशाअल्लाह फैल कर ये लहर हो जायगी।..(वीरेंद्र)/3-74



रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

3-73 कभी सुबह कभी शाम

कभी सुबह कभी शाम रंगीन होती है,,

सपनों की यह दुनियां हसींन होती है,.,

उड़ लें हम आसमान में चाहे जितना,

रहने के लिए तो सिर्फ ज़मीन होती है,

पत्थर पर भी आ जाती है नींद सुहानी,

इंसा की जिंदगी गर मुतमईन होती है

खिलाएं एक दिन किसी भूखे को रोटी,

फिर देखें दिल को कैसी तस्कीन होती है,.(वीरेंद्र)/3-73


रचना: वीरेंद्र  सिन्हा  "अजनबी"

1-592 मुफलिसी में गिले-शिकवे


मुफ़लिसी में  गिले-शिकवे न कर 'अपनों' की नफरतों के,

तरक्की कर इस कदर, मुहब्बत करने लगें 'अपने' भी तुझसे..(वीरेंद्र)/1-592


रचना: वीरेन्द सिन्हा "अजनबी"

1-591 आखिरी सांस भी हमने


आखिरी सांस भी हमने रोक कर रख ली है

तेरे आने तक जीने की ज़िद जो कर ली है।..(वीरेंद्र)/1-591


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-590 करके मेरे लिए दरवाज़ा

मेरे लिए दरवाज़ा बंद कर चैन से न वो सोया होगा,
यकीनन दरवाज़े के पीछे खड़ा बहुत देर वो रोया होगा।.(वीरेंद्र)/1-590
रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-468 तलबगार हूँ जिसका


तलबगार हूँ जिसका उसी के आने की आस नहीं है,

इतनी भीड़ में बस मेरा ही एक शख्स ख़ास नहीं है,

सहरा सा हो गया है मंज़र इस जशन का अब तो,

सूखा है गला मेरा, फिर भी पानी की प्यास नहीं है..(वीरेंद्र/0468



रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" 

0-467 तुम्हारी मुहब्बत का


तुम्हारी मुहब्बत का जवाब तो देते हैं,

चाहे भले ही भगवान् पत्थर के होते हैं,

उन इंसानों से मगर उम्मीद न करना, 

जिनके दिल बने हुए पत्थर के होते हैं।. (वीरेंद्र)/0-467


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-294 सूर्योदय हुआ,

सूर्योदय हुआ,
अन्धकार हटा।
ओस की बूँदें,
हुईं चमकीली,
पत्तियां धुलीं,
कलियाँ खिलीं,
कैसी मनोरम,
प्रकृति की छटा।

नारंगी से नीला,
बनता आकाश,
नदी झरनों की,
कलकल सुनते,
शांत बैठे पक्षी,
पल में उड़ेंगे,
जाने कौन दिशा।

आ गए दिनकर,
थोड़े और ऊपर,
चलने लगी हैं,
हवाएं सर-सर
सर्द हुए सरोवर,
छाने लगी घटा।

आओ बचा लें,
ईश्वर प्रदत्त,
इस द्रश्य को,
इस प्रकृति को,
करें प्रकृति से,
कुछ और निकटता।

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी") 2-294

Wednesday, 10 December 2014

2-291 तोड़ दिए हैं सारे रिश्ते

तोड़ दिए हैं सारे रिश्ते तो इनकी बची डोर भी तोड़ क्यों नहीं देते,
क्यों थामे हो टूटी डोर को अभी तक, इसे भी छोड़ क्यों नहीं देते,
अब भी हमारे बीच क्यों संचारित हो रहीं हैं कुछ शेष ह्रदय-तरंगे,
क्या इनपे तुम्हारा वश नहीं, इनका मार्ग तुम मोड़ क्यों नहीं देते..(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")/2-291

0-466 जी करता है अपने

जी करता है अपने जज़्बात की हड्डियाँ तोड़ दूं,
एहसासात की अपने एक बार गर्दन मरोड़ दूं,
अब तक वफ़ा और जफा का फर्क ये न समझे,
क्यूँ न इन्हें नफरतों के जंगल में जाके छोड़ दूं..(वीरेंद्र)/0-466

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-465 ज़िन्दगी वीरान रास्तों में से

ज़िन्दगी वीरान रास्तों में से गुज़रती रही,
लगातार तेरे मेरे बीच की दूरी बढती रही,
कहने को तो एक राह के हमसफ़र थे हम,
मगर हमारे बीच एक लकीर भी चलती रही..(वीरेंद्र)/0465

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-464 तुम ही किया करतीं थीं

तुम ही किया करतीं थीं नफरत मुझसे, 
अब तो मै भी कुछ कुछ करने लगा हूँ,
इतनी मिलती जुलती हैं आदतें हमारी,
कोई गुल खिल न जाए मै डरने लगा हूँ..(वीरेंद्र)/0-464

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-463 बड़े बे-अदब हो जाते हैं

बड़े बे-अदब हो जाते हैं तहज़ीब सिखाने वाले,
चिल्लाते बहुत हैं अम्न और अमान लाने वाले,
किस किस की नसीहत पर अमल करे इंसान,
खुद नाखुदा होगए खुदा का नाम सिखाने वाले..(वीरेंद्र)/0-463

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-462 छोडो भी तस्करा-ऐ-बेवफाई

छोड़ो भी तस्करा-ऐ-बेवफाई अब बहुत हो गया,
खामोश हो चुका है वो इतना, कि बुत हो गया,
रौशन कर दी थी जिसने ज़िन्दगी किसी की,
खुद उसी की ज़िन्दगी में अँधेरा गुप हो गया..(वीरेंद्र)/0462

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-461 बड़ा जिंदादिल ताज़ा तरीन

बड़ा जिंदादिल, ताज़ा-तरीन था मेरा दिल,
बड़े नाजों-अंदाज़ से पला था मेरा दिल,
चंद दिनों के इश्क में क्या हालत कर दी,
लौटाया भी उसने तो किस हाल में मेरा दिल..(वीरेंद्र)/0-461

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-460 मैंने समझा था मिल गए तुम

मैंने समझा था मिल गए तुम मुझे उम्र भर के लिए,
देख लिए कई ख्वाब मैंने ज़िन्दगी की सहर के लिए,
पर ये तो एक पड़ाव था जिसे मंज़िल मै समझ बैठा,
अभी तो कई मोड़ आने बाकी थे पूरे सफ़र के लिए..(वीरेंद्र)/0-460  

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-459 फिर से कुरेदने का क्या

फिर से कुरेदने का क्या फायदा इन्हें,
मैंने तो दफना दिए थे जज़्बात सभी,
अजनबी बनके खुद को भुला दिया था,
मै समझा था तुम न दोगे आवाज़ कभी..(वीरेंद्र)/0-459

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-458 वो मुहब्बत ही क्या

वो मुहब्बत ही क्या जिसका इकरार नहीं,
वो मरासिम ही क्या जिसपर एतबार नहीं,
इश्क में रूहानी तस्करे तो सभी करते हैं,
रूह से मगर किसी को कोई सरोकार नहीं..(वीरेंद्र)/0-458 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-457 आज हर शख्स ग़मों में आज

आज हर शख्स ग़मों में मुब्तला सुबह शाम रहता है,
लबों पर उसके गिले शिकवों का कयाम रहता है,
हर हाल में बेज़ार रहने की आदत हो गई है उसकी,
गर ज़माने से नहीं, तो खुद से ही परेशान रहता है..(वीरेंद्र)/0-457

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-589 पी तो जाता हूँ मै दर्द

पी तो जाता हूँ मै दर्द, पर मुझसे किसी को सुनाये नहीं जाते,
भूल जाता हूँ ज़ख्म मगर उनके निशाँ मुझसे भुलाए नहीं जाते. .(वीरेंद्र)/1-589

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-588 चेहरे पर आपके इस कदर

चेहरे पर आपके इस कदर ख़ुशी देखकर, मुझे ये यकीन होता है,
ज़िन्दादिलों को उड़ने के वास्ते ज़मीं-आसमां में फर्क नहीं होता है.

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")/1-588

1-587 जाने क्यों अब वो ही कहते

जाने क्यों अब वो ही कहतें हैं अपना मुझे,
खुद ही जिन्होंने "अजनबी" बनाया था मुझे. ..(वीरेंद्र)/1-587

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-586 बाद में देना इल्जाम

बाद में देना मुझे इल्जाम दिल तोड़ने का, संगदिल,
पहले ज़रा अपने पत्थर दिल को आइना तो कर ले..(वीरेंद्र)/1-586

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-585 अब हकीकत में ही तुम मुझसे

अब हकीकत में ही तुम मुझसे मिला करो,
ख्वाबों में तो तुम हद ही पार कर जाते हो...(वीरेंद्र)/1-585

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-584 आज़िज़ आ गया था मै

आज़िज़ आ गया था मै ज़माने से,
सकूं मिला तेरे अजनबी बनाने से. ..(वीरेंद्र)/1-584

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 17 November 2014

0-456-तेरे प्यार की ये यादें

तेरे प्यार की ये यादें, यादें नहीं सजाएं हैं,
मैंने समझा था बहारें, मगर ये खिजाएँ हैं,
इन्होने बुझा कर रख दिए वो सब चिराग,
अंधेरों से निकलने को जो मैंने जलाएं हैं...(वीरेंद्र)/0-456

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-455-ज़रूरी नहीं, हंसी होटों पर

ज़रूरी नहीं, हंसी होटों पर ही नज़र आए,
आँखों में भी अक्सर ये दिखाई दे जाती है,
ज़रूरी नहीं, बात जुबां से ही बताई जाए,
आँखों के इशारे से भी बताई ये जाती है..(वीरेंद्र)/0-455

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


0-454-झूंटी तारीफ से खुश

झूंटी तारीफ़ से खुश हो जाते हैं,
मुगालते का शिकार हो जाते हैं,
छोड़ देते हैं आइना देखना हम,
खुद दुनियां से बेज़ार हो जाते हैं..(वीरेंद्र)/0-454

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-453-दिल की धड़कन जो सुना

दिल की धड़कन जो सुना दी उन्हें आज हमने, तो कहने लगे,
ये तो कभी धड़कता नहीं था, इसने धड़कना कब सीख लिया,
खुद ही ने फ़ेंक दिया है हमेको मुहब्बत के समुन्दर में "वीरेंद्र",
और हम ही से वो पूछते हैं कि हमने तैरना कब सीख लिया....(वीरेंद्र)/0453

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-452-कसमे, वादे, नाते भले हों

कसमे, वादे, नाते भले हों सब झूंटे,
फिर भी सबको लगते हैं बड़े अच्छे,
वक्ती तसल्ली मिल जाती है इनसे,
आगे क्या होगा,अभी से कौन सोचे..(वीरेंद्र)/0-452 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


0-451-भूला है मुझे तो एहसान

भूला है मुझे तो एहसान इतना कर, 
मेरा हाल गैरों से कभी पूछा ना कर,
जाने भी दे अगर मिलता नहीं दिल,
मेरे बारे में अब इतना सोचा ना कर..(वीरेंद्र)/0-451

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-290-मैंने आँगन में जो खिलाए


मैंने आँगन में जो खिलाए थे फूल तेरे वास्ते,

कल खुद मैंने ही उन्हें मुरझाने को कह दिया,

यूं तो कर दिया था उम्मीदों का दरवाज़ा बंद

आज न जाने क्यों थोडा सा खुला रख दिया।..(वीरेंद्र)/2-290



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-289-सुनो, आज एक बात पूछनी


सुनो, आज एक बात पूछनी थी,

दिल की मुझे तसल्ली करनी थी,

ये जो आंसू तुमने दिए थे मुझको, 

तुम गंभीर थे या दिल्लगी करनी थी..(वीरेंद्र)/2-289




रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-288-थोड़ी देर को मुझसे मिलने आज


थोड़ी देर को मुझसे मिलने आज मेरा बचपन चला आया,

बहुत दिनों से बिछुड़े थे, मिलकर मेरा दिल भी भर आया,

मैंने जो सुना डालीं उसे विरह उपरांत की व्यथाएं अपनी,

वो हंस कर बोला तू ही उतावला था मैं तुझे न रोक पाया...(वीरेंद्र)/2-288



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-277-यूं तो मुस्कराहट आपने निसंदेह

यूं तो मुस्कराहट आपने निसंदेह छुपाई है,
पर बंद होटों पर वो फिर भी उभर आई है..(वीरेंद्र)/2-277

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-583-अजीब ज़हनियत है "वीरेंद्र"

अजीब ज़हनियत है "वीरेंद्र" तेरे ख्यालात की भी,
बेवफाई पर भी तेरे शेर मुहब्बत से लबरेज़ होते हैं,..(वीरेंद्र)/1-583

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-582-इंतहा मासूमियत की तो कोई

इंतहा मासूमियत की तो कोई देखे उनकी,
डुबो दिया हमको, साहिल पे लाने के लिए..(वीरेंद्र)/1-582

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 7 September 2014

0-114-तूभी गरज ले, तूभी बरस


तूभी गरज ले, तूभी बरस ले, ऐ आसमान मुझ पर,

तमाम दुनियां भी तो गरजती, बरसती है मुझ पर,

आसमान से बिजली बरसाने में तूही कमी क्यूं करे,

ज़माने ने भी ज़मीं से बिजलियाँ गिराई हैं मुझ पर...(वीरेंद्र)/0-114


रचना:  © वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



Friday, 5 September 2014

1-533-मान जाता है दिल छोटी

मान जाता है दिल कभी छोटी सी बात से,
और कभी नहीं मानता बड़ी सी सौगात से...(वीरेंद्र)/1-533 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 4 September 2014

1-046-बड़ा मशकूर हूँ आपका

बड़ा मशकूर हूँ आपका, जो आप मुझे शायरी का काम दे गए,

दूर करके मेरी गलतफहमियां मुझे "अजनबी"का नाम दे गए.



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")/1-046



2-239-बच्चे, बजुर्गों के प्यार से

बच्चे, बजुर्गों के प्यार से वंचित होते जा रहे हैं,
क्यूंकि परिवार धीरे-धीरे सोक्ष्म होते जा रहे हैं,
जो रहते थे साथ-साथ घर आँगन में कभी, वो
अब वृद्धाश्रम में या फ्रेमों में सिमटते जा रहे हैं...(वीरेंद्र)/2-239

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-244-जीवन में अंतर्द्वंद बहुत हैं


जीवन में अंतर्द्वंद बहुत हैं,

मन के दायरे तंग बहुत हैं,

कल्पना में भी संभव नहीं,

मुझ पर प्रतिबंध बहुत हैं।


मै उड़ना चाहूं आकाश में,

मेरे होंसले बुलंद बहुत हैं,

कुछ न मांगूं प्रकृति से मै,

मेरे लिए बस पंख बहुत हैं।



प्रेम-निधि में वृद्धि देदे प्रभु,

धन के सुपात्र रंक बहुत हैं,

बस तेरे रंग में रंग जाऊं मै,

वैसे तो जहां में रंग बहुत हैं।



बस तुझसे नाता न छूटे प्रभु,

संसार में तो सम्बन्ध बहुत हैं,

सदमार्ग पर अग्रसर कर मुझे,

यूंतो जीने के यहाँ ढंग बहुत हैं।(वीरेंद्र)/2-244



रचना: ©वीरेंद्र सिन्हा  ("अजनबी")

Wednesday, 3 September 2014

0-035-"जाते हुए भी तुम्हारी याद

जाते हुए भी तुम्हारी याद साथ थी,
आते हुए भी तुम्हारी याद साथ थी,
मै न भूल पाया तुम्हे एक पल को,
ना जाने तुम में ऐसी क्या बात थी. ...(वीरेंद्र)/0-035

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 31 August 2014

1-062-गम तो है बहुत मुझको

गम तो बहुत है मुझको कि अब तू दोस्त ना रहा,
पर हैराँ हूँ सोचके, अबतक कैसे मेरा दोस्त बना रहा...(वीरेंद्र)/1-062

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 26 August 2014

0-018-मुफलिसी में खोटे सिक्के


मुफलिसी में खोटे सिक्के भी काम आ जाते हैं,

सूखे शजर भी लिपटके रोने के काम आ जाते हैं,

ज़िन्दगी की असलियत को समझ ऐ "अजनबी"

ग़मी में अपनों के संग बेगाने भी काम आ जाते हैं...(वीरेंद्र)/0-018



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")                    

2-211-"कोई इंसान भगवान् हो


कोई इंसान भगवान् हो नहीं सकता

जो है भगवान् वो इंसान हो नहीं सकता. ..(वीरेंद्र)/2-२११ 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


1-577-रोटी कपडे के बाद, मजलूम

रोटी कपडे के बाद, मजलूम की आँख एक छत को तरसती है,
क्योंकि, उसकी झोंपड़ी पर बरसात बिन रोक टोक बरसती है..(वीरेंद्र)/1-577

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



1-525-खँडहर हो जाएगी हसीं दुनिया


खँडहर हो जाएगी हसीं दुनियां, अगर बेटी नहीं है,

रिश्ते-नाते बनेंगे कैसे, दुनियां में अगर बेटी नहीं है...(वीरेंद्र)/1-525 



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-517-तेरे तसव्वुर से महक

तेरे तसव्वुर से महक जाती हैं यादें,

वर्ना तनहाइयों में होती गुज़र नहीं है...(वीरेंद्र)/1-517


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 25 August 2014

0-017-ये माना कि कुछ कुछ बातें


ये माना कि कुछ कुछ बातें आपका हक़ नहीं होतीं,

यह दलील भी ठीक है कि अपेक्षाएं ठीक नहीं होतीं,

पर हम सभी तो हैं इंसान एहसास जज़्बात से भरे,

वक्त कभी तेरा कभी मेरा, उपेक्षाएं ठीक नहीं होतीं....(वीरेंद्र)/0-०१७ 




रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-016-मै नहीं जानता तूने मुझसे


मै नहीं जानता तूने मुझसे मुहब्बत की है, या नहीं है,

मै नहीं जानता मैंने जो लिखा वो शायरी है या नहीं है,

हर लफ्ज़ निकला है दिल की गहराई से तेरे ही लिए,

मै नहीं जानता तूने मुझसे मुहब्बत की है, या नहीं है...(वीरेंद्र)/0-०१६ 




रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-524-करोगे क्या चारों तरफ


करोगे क्या चारों तरफ सन्नाटेदार रेगिस्तान का,

कुछ तो जगाह मखसूस रक्खो बेटियों के लिए भी ...(वीरेंद्र)/1-524




रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-578-आलिम लफ्फाजी नहीं करता

आलिम लफ्फाजी नहीं करता, लफ़्ज़ों को तोलकर बोलता है,
उसे पता है सच अगर खामोश भी है तो सर चढ़कर बोलता है..(वीरेंद्र)/1-578

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-581-हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी

हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी जो नेक ज़िन्दगी हमने जी ली है,
डाका तो नहीं डाला मैखानेवालों, बस तौबा ही तो हमने कर ली है...(वीरेंद्र)/1-581

(एक प्रसिद्ध ग़ज़ल की तर्ज़ पर)
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 24 August 2014

0-015-कुछ ऐसे भी सवाल हैं, जो


कुछ ऐसे भी सवाल हैं, जो पूछे नहीं जाते,

कुछ जवाब भी ऐसे हैं, जो दिए नहीं जाते,

सवाल को सवाल ही रहने दो पूछने वालों,

पूछ लिए तो अक्सर जवाब सहे नहीं जाते...(वीरेंद्र)/0-015  


.© रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-011-खुदा ने बनाईं दुनियां, तो

खुदा ने बनाई दुनियाँ, तो कौन सा बड़ा काम कर दिया,
लोग भी तो हर रोज़ अपनी दुनिया एक नई बना लेते हैं, 
उसने लिक्खीं हैं किस्मतें, तो कौन सा अजूबा कर दिया,
लोग भी तो, अक्सर खुद ही अपनी किस्मतें बना लेते हैं. ....(वीरेंद्र)/0-०११ 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी) 

0-012-हमें ना मारा है उनकी


हमें ना मारा है उनकी नफरतों ने,

ना ही मारा है उनकी फितरतों ने,

बेवफाई का उन्हें क्यूं इलज़ाम दें,

हमें मारा उनकी मसरूफियतों ने. .. (वीरेंद्र)/0-०१२ 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")/0493

0-013-ज़िन्दगी फिर से हसीं


ज़िंदगी फिर से हसीन बना दी हमने,

अपने बीच की दीवार गिरा दी हमने,

समुंदर से गहरे रिश्ते अब ना टूटेंगे,

गलतफहमियां तमाम बहा दी हमने. ...(वीरेंद्र)/0-013

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  ("अजनबी")

0-014-कुछ कसर न रखी बाक़ी


कुछ कसर न रखी बाकी, दिल हमारा जलाने को,

किसने कहा था तुम्हे बारिश में यूं भीग जाने को,

खुद तो इतना कंप कपा रहे हो ठण्ड से तुम मगर, 

कोई कमी न रखी तुमने हमारी आग सुलगाने को. ...(वीरेंद्र)/0-0१४ 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 20 August 2014

0-009-मै जानता नहीं था जो,

मै जानता नहीं था जो, वो सिखाया ज़माने ने मुझे,

मै था अपरिपक्व, परिपक्व बनाया ज़माने ने मुझे,

अक्सर चेहरे निकले नकली, जब भी मुखौटा हटा,

मै था आशावादी, निराशावादी बनाया ज़माने ने मुझे....(वीरेंद्र)/0-009


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-008- आरजू थी, शाम ढले तुम


आरज़ू थी, शाम ढले तुम आते,
ज़ुल्फ़ की खुशबू में हमें सुलाते,
ना तुम आये, ना नींद ही आई,
क्या करते, गर हम मर न जाते...(वीरेंद्र)/0-008

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-100-ऊँचाई न चढो इतनी

ऊंचाई न चढो इतनी कि सांस फूले और पैर फिसल जाय,

गहराइयों में न उतरो इतनी, घुटकर दम ही निकल जाय,

चंद लम्हों की ख़ुशी की जद्दो-जहद में मत डूबो इतना कि,

देखते-देखते,  ज़िन्दगी का असल मकसद ही बदल जाय....(वीरेंद्र)/0-100


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 17 August 2014

1-516-हम मुस्कुराना भी चाहें

हम मुस्कुराना भी चाहें तो, मुस्कुराएँ  कैसे,
शहर भर की मुस्कुराहटें तो आप लिए बैठे हैं...(वीरेंद्र)/1-516

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-523-मै हूँ ज़िन्दगी

मै हूँ ज़िन्दगी, मुझे लोग उलझन के नाम से भी जानते हैं,
मै कितनी भी सुलझ जाऊं, लोग मुझे उलझन ही मानते हैं, ..(वीरेंद्र)/1-523

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-515-सूरज की रौशनी को बादल


सूरज की रौशनी को बादल छीन लेते होंगे,

हमारी मुस्कुराह्टों को छीन कर तो कोई दिखाए ...(वीरेंद्र)/1-515




रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-514-दूरियां बढती चली गईं

"दूरियां" बढती चली गईं "नजदीकियों" की चाह में,

फूलों की जगह कांटे बिछते गए हसरतों की राह में,...(वीरेंद्र)/1-514



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-007-काटते हैं बड़े जोर से


काटते हैं बड़े जोर से, पर उनके दांत नहीं होते,

चुभते हैं तीर की तरह, पर वो बाण नहीं होते,

कटु 'शब्द' कर देते हैं ज़ख्म बहुत गहरे गहरे,

मचा देते हैं वे कत्लेआम, पर तलवार नहीं होते. ..(वीरेंद्र)/0-007


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-006-दुनिया को धोखा देने की बात

दुनियां को धोखा देने की बात तो समझ आती है,

पर खुद को धोखा देने की बात समझ नहीं आई,

कैसे भूल जाता है इंसान, औरों की तकलीफ को,

क्या उस पर ता-उम्र कोई भी तकलीफ नहीं आई, ..(वीरेंद्र)/0-006



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-005-तेरे आने की आस, अब


तेरे आने की आस, अब भी दिल से जाती नहीं,

बहुत किया ईलाज, सुर्खी आँखों से जाती नहीं.

फिर से हरे हो जाते हैं, तमाम ज़ख्म जुदाई के,

बहुत दबाता हूँ इन्हें पर यादें दिल से जाती नहीं.,,(वीरेंद्र)/0-005 


रचना: वीरेंद्र "अजनबी"


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0-004-पसीने-पसीने जो आप

पसीने-पसीने जो आप नहाए हुए हैं,
क्या बात है, जिससे घबराये हुए हैं,
हमने तो खुद ही निगाह नीची कर ली,
फिर भी क्यों आप तिलमिलाए हुए हैं...(वीरेंद्र)/0-004

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-003-रिश्ते कोई महंगी शय नहीं


रिश्ते कोई महंगी शय नहीं, यहाँ-वहां रोज़ बिकते हैं,

इसके बाज़ार हर जगह, हर शहर में रोज़ लगते हैं,

क्या ज़रुरत इन्हें संवारने की, बढाने की, बनाने की,

पायदारी भी क्या देखनी इनकी, ये रोज़ टूटते बिगड़ते हैं....(वीरेंद्र)/0-003


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-002-खुदा गर मुझे तू जज़्बात न


खुदा अगर मुझे तू जज़्बात न देता, तो तेरा क्या बिगड़ जाता, 

तुझे पता था तेरी इस सौगात के बिन भी यहाँ काम चल जाता,

गर तूने भर दी होती अहमियत इनकी हर इंसान के दिमाग में,

मेरे जैसे कई दिल रोने से बच जाते तो, तेरा क्या बिगड़ जाता...(वीरेंद्र)/0-००२ 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-001-क्यों करे किसी को खुद

क्यों करे किसीको खुद से याद कोई,

क्यों करे गुफ्तगू का आगाज़ कोई,

जब मालूम हो कि रह नहीं सकता,

दो दिन से ज्यादा बिन करे बात कोई. ..(वीरेंद्र )/०-001


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Saturday, 16 August 2014

2-236-सखियों जैसी प्रिय, सुंदर


सखियों जैसी प्रिय, सुंदर हरी-भरी पहाड़ियों के बीच,जाऊं मै,

पर्वतों की प्राकृतिक ममतामयी गोद में  जाकर सो जाऊं मै, 


रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियों में रम कर उनसे श्रृंगार करवाऊं, 

फूलों की भिन्न सुगंधों को पहचानने में बस व्यस्त हो जाऊं मै,


सर्पाकार में इठलाती ये पग-डंडियाँ उनके आने का संकेत देतीं,

चिरैय्या, कोयल की आवाजों के मतलब का अनुमान लगाऊं मै,


घिर-घिर आए जब बदरा और चले जब शीतल पवन यहाँ वहां,

भेजकर कोई पवन-संदेसा अपने पिया को, परदेस से बुलाऊँ मै,


तंग आ गई हूँ मै, उदासी में रहते-रहते, विरह में जलते-जलते,

यूंही न जाने दूँगी ऋतू को, इस बार तो सावन सफल बनाऊँ मै ..(वीरेंद्र)/2-236 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-235-आजादी का मतलब क्या,


आज़ादी का मतलब क्या, उस से पूछो,

ज़िन्दगी गुलामी की, जिसने देखी है,

जज्बा देशभक्ति का क्या है, उससे पूछो 

ज़िन्दगी जिसने, देश के नाम कर दी है ...(वीरेंद्र)/2-२३५


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-233-जीवन की जिन राहों में

जीवन की जिन राहों में, तेरा साथ नहीं,
जिस आँगन में तेरी कोई, पदचाप नहीं,
उनमे अँधेरे भी रहें तो मुझे क्या फर्क,
उजियारों की उनमे, अब मुझे चाह नहीं. ..(वीरेंद्र)/2-233 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-234-लगता आकाश "काला" मुझे

"रंग"

लगता आकाश "काला" मुझे, यह "नीला" नहीं है,
चन्द्रमा लगता बुझा-बुझा सा, चमकीला नहीं है,
प्रिय बिन मेरे,सावन भी बड़ा रूखा लगे है मुझको,
धरती बदरंगी लग रही, वातावरण रंगीला नहीं है..(वीरेंद्र)/2-234 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

Thursday, 14 August 2014

2-92-एक-एक आतंकी का

एक-एक आतंकी का सफाया कर दिया जाय,

किसी भी शहीद की शहादत बेकार ना जाय,

बहुत दिन हो गए अमन-अमन, करते-करते,

चलो जवानों अब कुछ शिकार विकार हो जाय...(वीरेंद्र)/2-92 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 13 August 2014

2-219-कुपात्रों के लिए भावनाएं


कुपात्रों के लिए भावनाएं ,संवेदनाएं नष्ट न कीजिये,
खुदगर्जों को कभी आजमाने का आप कष्ट न कीजिये...(वीरेंद्र)/2-219 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-205-ये माना, प्यार बिन आकर्षण

ये माना, प्यार बिन आकर्षण नहीं होता,
मगर हर प्यार मात्र आकर्षण नहीं होता,
सच्चे मन में प्यार स्वयं ही झलकता है,
उस पर कोई भी बाह्य आवरण नहीं होता...(वीरेंद्र)/2-205

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 12 August 2014

1-093-खुदा तो मुझमे और काफिर में

खुदा तो मुझमे और काफिर में भी है, सिर्फ मस्जिद में ही नहीं,

वल्लाह मेरी शराब नोशी से इंसा को तकलीफ है खुदा को नहीं...(वीरेंद्र)/1-093



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 11 August 2014

1-580-आने न दो आंसूं, ऐसे दिखो

आने न दो आंसूं, ऐसे दिखो जैसे ग़मज़दा नहीं हो,

हंसो तो इतना हंसो, कि लगे तुम शादीशुदा नहीं हो..(वीरेंद्र)/1-580

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-510-ये जो चल रहीं हैं आंधियां

ये जो चल रहीं हैं आंधियां और बिजलियाँ,

ये मौसम नहीं, ये हैं कुदरत की तल्खियाँ. ..(वीरेंद्र)/1-510


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 10 August 2014

3-67-रिश्ते बहुत नाज़ुक कहे जाते

रिश्ते बहुत नाज़ुक कहे जाते हैं,
बड़े कोमल भावुक समझे जाते हैं,

बहुत ही संभालना पड़ता है इनको,
मामूली सी ठसक से चटख जाते हैं,

मौसमी हवाओं से बचाना पड़ता है,
बेचारे जल्दी ही बीमार पड़ जाते हैं,

सहारे लाजिम हैं चलते रहने को,
लड़खडाने से ये गिर भी जाते हैं,

गर्माहट के तलबगार होते हैं रिश्ते,
वर्ना जिंदा होके भी सर्द पड़ जाते हैं,

शीशे की माफिक टूट जाते हैं रिश्ते,
जुड़के भी इनमे कुछ ऐब रह जाते हैं. ...(वीरेंद्र)/3-67 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

3-66-मैंने खाई थी कसम


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मैंने खाई थी कसम शायरी न करने की,
आज आपने मेरी यह कसम तुड़वाई है,

हटाकर रुख से ये हसींन जुल्फें अपनी,
मुझसे आपने एक और ग़ज़ल लिखवाई है.

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3-65-बलात्कार को महज़ गलती


बलात्कार को महज़ गलती मानने वालों,
घर संभालो कहीं ये गलती सबसे न हो जाय,

बड़े बड़े सूरमा ज़मींदोस  हो गए जहाँ में,
ज़हनियत बदल डालो कहीं देर न हो जाय,

औरत सह रही है ज़िल्लत कुछ और दिन,
वो दिन भी दूर नहीं जब वो फूलन हो जाय,

ठीक कहा तुमने गुनाहगारों को फांसी मत दो,
अच्छा हो अँधा भिखारी और अंगभंग हो जाय...(वीरेंद्र)/3-65 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

3-64-नादान हैं ये हवाएं,


नादाँ हैं ये हवाएं, उड़ा देती हैं मेरा दामन तेरी ही जानिब,

उन्हें कौन समझाए, तू तो अब मुझसे दामन छुड़ाने लगा है,


मुहब्बत की राहों में मेरा पहला कदम तूने ही रखवाया था,

मंजिल के पास आते आते, क्यों तेरा ही मन घबराने लगा है,


ऐ वादियों, ऐ नजारों, अब नहीं तुम्हारी गवाही की ज़रुरत,

मेरा महबूब ही अब मुझे मिलने से पैहम कतराने लगा है. ..(वीरेंद्र)/3-64 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

3-63-वादे लोग नए नए करने

वादे लोग नए नए करने लगे हैं,
ज़ख्म माझी के, उभरने लगे हैं,

कहने को तो लोग जुड़े कारवां में,
हम तो मगर तनहा होने लगे हैं,

खिजा आई भी नहीं अभी तो,
फिर ये पत्ते क्यों झड़ने लगे हैं,

खौफ आँधियों का खाया इतना,
चराग भी जलने से डरने लगे हैं,

बेजान से हो गए परिंदे कफस में,
रिहा होक भी कैद में रहने लगे हैं,

रुके थे पथराई आँखों में जो आंसू,
अब नहीं रुकते, वो बहने लगे हैं.....(वीरेंद्र)/3-६३ 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-232-नालायक संतानों से बेहतर

नालायक संतानों से बेहतर तो एक बेजान छड़ी है,
समय पर  सहारा बन कर हो जाती सदैव खड़ी है,
संभाल लेती है उन उपेक्षित लडखडाते माँ-बाप को,
रिश्तेनाते बहुत हैं जिनके पर किसको क्या पड़ी है...(वीरेंद्र)/2-232 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-231-कोमल कलि के बिना फूल

कोमल कलि के बिना फूल खिल नहीं सकता,
प्रेम की भावना बिन दिल मिल नहीं सकता,
जबतक लिखा न हो दो आत्माओं का मिलन,
कोई शख्स किसी को यूँहीं मिल नहीं सकता. ..(वीरेंद्र)/2-231

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-225A-गरीब को खाद्य-सुरक्षा नहीं

गरीब को खाद्य-सुरक्षा नहीं खाना दे दो,
उसे शिक्षा का अधिकार नहीं शिक्षा दे दो.
या तो गरीब को भी तुम आरक्षण दे दो,
या फिर उसे इच्छा-मृत्यु-अधिकार दे दो. ...(वीरेंद्र)/2-225A

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी)  

2-229-और कितनी देर लगेगी नारी


और कितनी देर लगेगी नारी-विरुद्ध अपराध रुकवाने में,
और कितनी देर है सरकारों के लंबी नींद से जाग जाने में,
ना भूलो यदि भड़क उठी आग जनता के दिलों में कभी,
इससे भी ज्यादा देर लगेगी तुम्हें उस आग को बुझाने में . ..(वीरेंद्र)/2-229

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-227-प्रकृति बता यह तेरा भेदभाव


प्रकृति तूही बता यह तेरा भेदभाव है या है कोई अजूबा,
इंसान कहीं तो खा खा कर मरे ,और कहीं-कहीं भूखा,
इंसान ने तोड़ी तेरी संतुलित व्यवस्था शायद इसीलिए,
दण्डित तूने किया, कहीं दी बाढ़ और कहीं-कहीं सूखा......(वीरेंद्र )/2-227 

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-226-तुम पुकार कर तो देखो


तुम पुकार के तो देखो दिलबर, मै दौड़ा चला आऊँगा,
खुशियाँ ही खुशियाँ मै दामन में, भरता चला जाऊंगा,
बड़े-बड़े झूंटे वायदे करना, मेरी आदत में नहीं प्रिये,
मै "अच्छे दिन" नहीं जो आते आते भी नहीं आऊँगा. ...(वीरेंद्र)/2-२२६ 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-224-सावन साजन दोनों एक से


सावन साजन दोनों एक से,
दोनों गरजे, दोनों ही बरसे,
दोनों गायब हो जाते प्रायः,
दोनों के दर्शन को हम तरसे. ..(वीरेंद्र)/2-224 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")