Saturday, 21 December 2013

1-353-"ज़िन्दगी में मेरी जब भी

ज़िन्दगी में मेरी जब भी ख़ुशी आई है,

कीमत मैंने उसकी बहुत बड़ी चुकाई है..(वीरेंद्र)/1-353


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-446-"दोज़ख भी जन्नत


दोज़ख भी जन्नत में बदल जाती है, 

इंसान की सोच अगर बदल जाती है,

कुछ नहीं है इस दुनियां में मुस्तकिल,

यहाँ दुश्मनी भी दोस्ती में बदल जाती है..(वीरेंद्र)/0-446


रचना :  वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-237-"ज़रा सी बात पर तोड़ दिया

ज़रा सी बात पर तुमने तोड़ दिया रिश्ता,

कोई बड़ी बात होती तो न जाने क्या करते,...(वीरेंद्र)/1-237


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-236-"तुझसे नहीं कोई अदावत

तुझसे नहीं कोई अदावत, पर ये भी वाजे है,

तुझे नहीं रह गई अब कोई मुहब्बत मुझसे..(वीरेंद्र)/1-236

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

1-352-"तुम न आना मेरी कब्र पर

तुम न आना मेरी कब्र पर मेरे मर जाने के बाद,
मै फ़रिश्ता नहीं जो लौट आऊँ चले जाने के बाद...(वीरेंद्र)/1-352

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-235-"तुमसे नहीं शिकवा कि

तुमसे नहीं शिकवा कि क्यों कतै-ताल्लुक कर दिया,
शिकायत है तो बस इतनी, इतनी जल्दी क्यों कर दिया..(वीरेंद्र)/1-235

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-240-"याद में खोकर जिसकी

याद में खोकर जिसकी, वक्त गुज़ार लेता था मै,
ज़ालिम ने पाबन्दी लगा दी है याद करने पर भी उसे.(वीरेंद्र)/1-240

रचना:  वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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0-079-"बर्फीली हवाओं के कुफ्र में

बर्फीली हवाओं के कुफ्र में, खून जमाती ठंड में,
हद-ए-निगाह तक छाये घने कोहरे की धुंध में,
मै भी कहाँ जिद ले बैठा रिश्तों की गर्माहट की,
बदले मौसम को अनदेखा करके अपनी धुंद में. ..(वीरेंद्र)/0-079

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

0-407-"मेरे ख्याल बड़े खोखले

मेरे ख्याल बड़े खोखले निकले,
अंदाज़ मेरे सारे गलत निकले,
सोचा नहीं था जिन्हें ख्वाब में,
जाने क्यों वही बड़े गैर निकले. ..(वीरेंद्र)/0-407

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-437-"मुझे तो ज़रा भी नहीं जीने

मुझे तो ज़रा भी नहीं जीने देतीं चंद पाबंदियां,
जाने कैसे जी लेते हैं लोग पूरी पूरी जिंदगियां,
नाराजगियां तो  झेल सकता है कोई, ख़ुशी से,
पर दुश्वार है झेलना लम्बी लम्बी खामोशियाँ. ...(वीरेंद्र)/0-437

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-302-"लूट लोगे तुम हमें

लूट लोगे तुम हमें ऐसे मुस्कुराकर,
ललचाओगे हमें यूं मोती दिखाकर,
बाँधोगे बंधन में यूं ज़ुल्फ़ लहराकर,
बता दो ज़ुल्म ये रुकेगा कहाँ जाकर,..(वीरेंद्र)/0-302

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-104-"पत्थर भी पिंघल जाते हैं

पत्थर भी पिंघल जाते हैं लावा बन कर,
अहंकारी लोग मगर नहीं पिंघला करते,
तूफ़ान भी अपना रास्ता बदल लेते हैं,
कुछ लोग मगर, कुछ नहीं बदला करते,...(वीरेंद्र)/0-104

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-394-"हर शय पर हुस्न छाया

हर शय पे हुस्न छाया है, किस पर नहीं है,
किसीको उसपे अकड़ने की ज़रुरत नहीं है,
जिसके पास है किसी के प्यार की दौलत,
उसको किसी और शय की ज़रुरत नहीं है. ..(वीरेंद्र)/0-394

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-301-"प्यार अजब तरीके से वो

प्यार अजब तरीके से वो करते हैं,
बात बात में दूरी हमसे वो करते हैं,
जुर्म तो करते हैं हम जिंदगी में पर 
प्रायश्चित हर एक बार वो करते हैं....(वीरेंद्र)/0-301

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-103-"हर कोई है इंसान उसकी

हर कोई है इंसान, उसकी कुछ ज़रूरतें हैं,
जहां में मुहब्बतें हैं कम, ज्यादा नफरतें हैं,
कितना भी दौड़े इंसान अपनेपन के पीछे,
मिलता नहीं कुछ, मिलती बस अदावतें हैं. ...(वीरेंद्र)/0-103

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-233-"हमारी तो मुहब्बतों की

हमारी तो मुहब्बतों की भी कोई कद्र नहीं होती,
लोग रकीबों की नफरतें भी संभाल के रख लेते हैं..(वीरेंद्र)/1-233

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-232-"आज मुझे याद आ गया

आज मुझे याद आ गया बेवफा कोई,
आँखों में वही प्यार फिर छलका गया कोई. ..(वीरेंद्र)/1-232

राचन: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-024-"अरसे बाद मेरी कलम से

अरसे बाद मेरी कलम से जो ये ग़ज़ल निकल आई है,
ज़रूर उस बेवफा को आज, मेरी कुछ तो याद आई है...(वीरेंद्र)/1-024

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-560-"अंधेरों से निकलना जिनकी


अंधेरों से निकलना जिनकी किस्मत में ना हो,

उन्हें अंधेरों में खुश रहने के सिवा चारा क्या है..(वीरेंद्र)/1-560

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

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1-027-"मत सुना उन्हें दर्द भरी

मत सुना उन्हें दर्द भरी शायरी "वीरेंद्र",
पत्थरों का शायरी से क्या लेना देना...(वीरेंद्र)/1-027

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-426-"अब रूठना बंद भी करो तुम

अब रूठना बंद भी करो तुम,
ज़िन्दगी बहुत है हमसे रूठने के लिए...(वीरेंद्र)/1-426

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-441-"तन्हाई भी मुझसे नाराज़ है

तन्हाई भी मुझसे नाराज़ है आज,
मैंने तोडा है उसे, तेरा तसव्वुर करके,..(वीरेंद्र)/1-441

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-350-"तुम ना आना मेरी कब्र पर

तुम ना आना मेरी कब्र पर पशेमा होकर,
मै गिले शिकवे अपने साथ दफन कर लूँगा..(वीरेंद्र)/1-350

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

3-70-"ज़मीर-ओ-जज़्बात से जुदाई

ज़मीर-ओ-जज्बात से जुदाई मै सह नहीं सकता,

क्या करूँ, उन दोनों के बगैर मै रह नहीं सकता,

मै अब वो दरिया बन चुका हूँ, ऐ मेरे हमसफ़र,

तेरी शह के बगैर रवानी में, मै बह नहीं सकता.

न जाने किस बेरहम ने छीन लिया उन्हें मुझसे,                                                               

दिल की तकलीफ किसी से मै कह नहीं सकता,..(वीरेंद्र)/3-70



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-009-"चंद रोज़ और रूठे रहो

चंद रोज़ और रूठे रहो तुम हमसे,
चंद ग़ज़लें ज़हन में और उभर आने दो...(वीरेंद्र)/1-009

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-425-"खुद को छुपा लिया मेरी

खुद को छुपा लिया मेरी नज़रों से तुमने,
मेरी नज़रों की ख़ुशी भला क्यों छीनते हो..(वीरेंद्र)/1-425

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-424-"उसे क्या अंदाजा, मेरी जद्दो-

उसे क्या अंदाजा मेरी जद्दोजहद का, उसे पाने के लिए,
दरिया से सहरा बन गया मै, कतरा कतरा खाली होकर...(वीरेंद्र)/1-424

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-559-"बड़े दिल वाले हैं हमारे

बड़े दिल वाले हैं हमारे फिक्रमंद ये ज़माने के लोग,
खुद देखें, न देखें पर हमें आइना दिखा देते हैं लोग...(वीरेंद्र)/1-559

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-273-"मुझे दो ज्ञान, जीवन सुखी

मुझे दो ज्ञान,
जीवन सुखी बनाने का,
फूल चढाने तुम्हारे मंदिर जाऊं,
अथवा दान-पुन्य सेवा करूँ भगवान्..(वीरेंद्र)/2-273

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-231-"दूर जाकर भी देख लिया

दूर जाकर भी देख लिया, पाईं ना कोई तब्दीलियाँ,
गलत सुना था, दूरियां भी बढ़ा देती हैं नजदीकियां...(वीरेंद्र)/1-231

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-349-"मुंह उठा कर चले आते हैं

मुंह उठा कर चले आते हैं दर्द, कहाँ कहाँ से,
जाने क्यों इन्हें कोई दूसरा दिल नहीं मिलता...(वीरेंद्र)/1-349

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-080-"जब जब भीतर झाँकने लगीं

जब जब भीतर झाँकने लगीं कुछ खुशियाँ,
आँधियों ने बंद कर डालीं सब खिड़कियाँ,
तुम आये थे मेरे उजड़े चमन को महकाने,
पर तुम्ही पर छा गईं मौसम की तल्खियां..(वीरेंद्र)/0-080

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-241-"अपनी नर्म जुल्फों को तुम

अपनी नर्म जुल्फों को तुम लहराने दो,
गालों को अपने, इन्हें तुम सहलाने दो,
रुख हवाओं का मेरी तरफ है, जानेमन,
मेरे दिल का चमन भी इन्हें महकाने दो. ...(वीरेंद्र)/0-241

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-082-"दुश्वारियों से रूबरू हूँ,

दुश्वारियों से रूबरू हूँ, तूफानों से घिरा हूँ,
उम्मीद नहीं कोई, मंजिल के मिलने की,
करूँ तो क्या करूँ मै, दरिया बन गया हूँ,
और आदत बन चुकी मुझे, बस बहने की...(वीरेंद्र)/0-082

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-251-"मै विशाल सागर,प्यार और

मै सागर विशाल, प्यार और मुहब्बत का,
मेरे भावुक ह्रदय में, भरी अपार कोमलता,
मेरी चंद बूँदें घटने से, घट नहीं जाता मै,
यदि संवर सके बिखरा अस्तित्व किसी का...(वीरेंद्र)/2-251

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-081-"तू ना करे महसूस मेरी

तू ना करे महसूस कभी मेरी कमी, तो ना कर,

मगर मुझे तेरी कमी हर वक्त खलती रहती है,

साथ गुज़ारा वक्त, तू ना करे याद तो ना कर,

मगर, मुझे तो हर लम्हे-घडी की याद रहती है....(वीरेंद्र)/0-081


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 20 December 2013

1-239-"वजूद मिटा कर, घुटने

वजूद मिटा कर, घुटने क्यों टेक देते हैं वो लोग,
खुदको जिन्हें आज़ाद तबियत कहते देखते हैं लोग...(वीरेंद्र)/1-239

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-238-"दिल को आइना बना लेने

दिल को आइना बना लेने से क्या हासिल,
जब चेहरा बदल जाये, तस्वीर हो जाय धुंधली...(वीरेंद्र)/1-238

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-040-"हर शय फिर से हसीं होगी

हर शय फिर से हसींन होगी , जब होंगे हम फिर से अजनबी,
गिले,शिकवे,जुदाई सब ही से आज़ाद होगी फिर से ज़िन्दगी. ..(वीरेंद्र)/1-040

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-039-"उनसे हकीकत में मिलकर भी

उनसे हकीकत में मिलकर भी हमें कुछ न मिला,
काश कोई हमें फिर से ख्वाबों में अजनबी बना दे ..(वीरेंद्र)/1-039

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

1-432-"तेरी आँखों की सिफत को

तेरी आँखों की सिफत को क्या कहें,
क़त्ल भी करती हैं और मुहब्बत भी...(वीरेंद्र)/1-432

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-272-" मै जब होता हूँ

मै जब होता हूँ परेशान,

कर लेता हूँ यह ध्यान,

मुझसे ज्यादा दुखी हैं,

लाखों करोड़ों इन्सान..(वीरेंद्र)/2-272 


रचना:  वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-271-"'अजनबी' जब लगने लगे

'अजनबी' जब लगने लगे अपना सा,
अपरिचित हो जाए चिरपरिचित सा,
अन्जाना हो जाए जाना पहचाना सा,
यहीं से प्रारम्भ  एक प्रेम-फ़साना सा..(वीरेंद्र)/2-271

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-245-"तन्हाई को मधुर क्षण तुम

तन्हाई को मधुर क्षण तुम कहते हो,
अपने ही साए के संग तुम रहते हो,
ख़ामोशी का दामन तुम छोड़ते नहीं,
हाथों में  हाथ भी तुम मेरा रखते हो. ..(वीरेंद्र)/2-245

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-393-"ये दिल है इकलखुरा

ये दिल है इकलखुरा, मुझसे अलग चलता है,
उसी एक बेवफा के पीछे पीछे बस चलता है,
मेरी चाहत मेरे अरमान की परवाह नहीं इसे,
कमबख्त, उसी को पाने के लिए मचलता है..(वीरेंद्र)/0-393

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-241-" खिले होठों के बीच

खिले होठों के बीच कभी होते मोती हैं छिपे,
बंद होठों में कभी मंद-मंद मुस्कान है दिखे,
क्यों तुम इतना डरते हो सर्दी के मौसम से,
तुम खुद ऊष्मा,ऊर्जा, तुम्हे ठंड क्यूं है लगे..(वीरेंद्र)/2-241

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-240-"गुलाब की दो पंखुड़ियों में

गुलाब की दो पंखुड़ियों में मोती छुपाए बैठे हैं,
झील सी आँखों पर, तीर कमान लगाये बैठे हैं,
जाने क्यों देर कर रहें हैं, हम पर वार करने में,
हम तो कभी से उनके निशाने पर आए बैठे हैं,. ..(वीरेंद्र)/0-240

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-339-"बहुत बोलने लगा था दिल

बहुत बोलने लगा था दिल, मैंने बेजुबान कर दिया,
बेलगाम हो गया था यह, मैंने बा-लगाम कर दिया,
कर न सकेगा बेकार गिले-शिकवे अब ये किसी से,
क़त्ल करके इसकी आरजुएं, बे-अरमान कर दिया...(वीरेंद्र)/0-339

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-392-तेरे आतिशी बदन की अगर

तेरे आतिशी बदन की अगर पकड़ मिल जाये,
इस बढती सर्दी की सारी अकड़ निकल जाये,
बेजान पत्थर से भी निकल पड़ती हैं चिंगारी,
उसको अगर दूसरे पत्थर की रगड़ मिल जाये....(वीरेंद्र)/0-392

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")